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दुर्गा चालीसा

By देवीदास (पारंपरिक श्रेय)19वीं शताब्दीहिंदी (खड़ी बोली)

12 min readLast reviewed April 28, 2026

मूल पाठ

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्न्पूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हारे गुण गावे। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती का तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरा रुप नरसिंह को अम्बा। प्रकट भई फाड़ कर खम्बा॥

रक्षा कर प्रहलाद बचायो। हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दया सिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्ही भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी धूमावती माता। भुवनेश्वरी बगला सुखदाता॥
श्री भैरव तारा जग तारणि। छिन्नभाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोहे भवानी। लांगुर बीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥

सोहे अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ संतन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें। रिपू मुरख मौही डरपावे॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥

जब लगि जिऊं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

अर्थ

दुर्गा चालीसा देवी जगदम्बा को समर्पित 40-चौपाई स्तोत्र है। यह चालीसा उन सब रूपों की वंदना है जो एक ही आदि-शक्ति के विभिन्न प्रकाशन हैं — अन्नपूर्णा, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी, काली, और दस-महाविद्या के अष्ट देवियाँ। यह चालीसा देवी-माहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण) के प्रमुख प्रसंगों — महिषासुर वध, शुम्भ-निशुम्भ संहार, रक्तबीज वध — को संक्षेप में समाहित करती है।

आरंभिक चौपाई — मूल वंदना

“नमो नमो दुर्गे, सुख देने वाली; नमो नमो अम्बे, दुःख हरने वाली। आपकी ज्योति निरंकार (निराकार) है — तीनों लोकों में उसकी उज्ज्वलता फैली हुई है।” निरंकार शब्द महत्वपूर्ण है — देवी न तो रूप तक सीमित हैं, न रूपहीन हैं; वह रूप-अरूप दोनों से परे हैं।

चौपाई 2 — रूप-वर्णन

“मस्तक पर शशि (चंद्रमा) सुशोभित है, मुख महाविशाल है; नेत्र लाल हैं, भृकुटि विकराल। माता का रूप अत्यंत सुहावना है — दर्शन करते ही जन को अति सुख प्राप्त होता है।” चंद्र = शीतलता और सौंदर्य; लाल नेत्र = क्रोध और शक्ति; विकराल भृकुटि = असुरों के लिए भय। एक ही चौपाई में सौम्य और रौद्र दोनों रूप।

चौपाई 3 — अन्नपूर्णा रूप

“आपने संसार को शक्ति लेकर बनाया; पालन के लिए अन्न और धन दिए। अन्नपूर्णा बनकर जगत का पालन किया — आप ही आदि-सुन्दरी बाला (मूल युवती) हैं।” यहाँ देवी को सृष्टिकर्त्री और पालनकर्त्री — अन्नपूर्णा — के रूप में पहचाना गया है।

चौपाई 4 — गौरी और प्रलय-नाशिनी

“प्रलय-काल में सब का नाश करने वाली; आप ही गौरी, शिव-शंकर की प्यारी। शिव-योगी आपके गुण गाते हैं; ब्रह्मा और विष्णु आपका नित्य ध्यान करते हैं।” सृष्टि-स्थिति-संहार तीनों कार्य देवी ही करती हैं — और त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-शिव) उनके आगे ध्यानस्थ हैं।

चौपाई 5 — सरस्वती और नरसिंह की माता

“सरस्वती का रूप धारण कर ऋषि-मुनियों को सुबुद्धि दी और उद्धार किया। नरसिंह की अम्बा (माता) के रूप में आप ही प्रकट हुईं — खम्बे को फाड़कर।” यहाँ देवी को विद्या की देवी सरस्वती और नरसिंह की माता दोनों रूपों में पहचाना गया है।

चौपाई 6 — प्रहलाद की रक्षा

“प्रहलाद की रक्षा करके बचाया; हिरण्यकशिपु को स्वर्ग भेज दिया (वध किया)। लक्ष्मी का रूप धारण कर जगत में आईं — श्री नारायण के अंग में समाई हुईं।” यहाँ नरसिंह-अवतार की पूरी कथा — और लक्ष्मी रूप — दोनों देवी से जोड़े गए हैं।

चौपाई 7 — क्षीरसागर और हिंगलाज

“क्षीरसागर में विलास करती हैं; दया-सागर बनकर मन की आशा पूरी कीजिए। हिंगलाज (शक्ति-पीठ) में आप ही भवानी हैं; आपकी अमित महिमा वर्णन से परे है।”

चौपाई 8 — दस-महाविद्या

“मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगलामुखी, श्री भैरवी, तारा — और छिन्नमस्तिका, जो भव-दुःख का निवारण करती हैं।” यह चौपाई दस-महाविद्या (दस बड़ी विद्याएँ) की वंदना है। दस-महाविद्या तंत्र-परंपरा की दस देवियाँ हैं — काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी (षोडशी), भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, और कमला।

चौपाई 9 — सिंह-वाहिनी, खड्ग-धारिणी

“केहरी (सिंह) पर सवार भवानी सुशोभित हैं; लांगुर (हनुमान) वीर अग्र-दूत के रूप में चलते हैं। हाथ में खप्पर और खड्ग सुशोभित हैं — जिसे देखकर काल भी डरकर भागता है।”

चौपाई 10 — त्रिशूल और नगरकोट

“अस्त्र-शस्त्र और त्रिशूल सुशोभित — जिनसे शत्रुओं के हृदय में पीड़ा उठती है। नगरकोट में आप विराजमान हैं; तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।” नगरकोट = ज्वाला-देवी का प्रसिद्ध शक्ति-पीठ (हिमाचल प्रदेश का काँगड़ा)।

चौपाई 11 — असुर-वध (1)

“शुम्भ-निशुम्भ दानवों को आपने मारा; रक्तबीज को (असंख्य) शंख-नाद से संहार किया। महिषासुर अति अभिमानी राजा था — जिसके पाप के भार से धरती व्यथित हो उठी थी।”

चौपाई 12 — काली रूप, संहार

“कराल काली का रूप धारण किया — और सेना सहित उसका संहार कर दिया। जब-जब संतों पर संकट आया, हे माता, आपने सहायता दी।”

चौपाई 13 — तीनों लोक

“अमरपुरी (देवलोक) और बासव-लोक (इंद्र-पुरी) — आपकी महिमा से सब अशोक (शोक-रहित) हैं। ज्वाला (ज्वाला-मुखी) में आपकी ज्योति है; नर-नारी सदा आपकी पूजा करते हैं।”

चौपाई 14 — भक्ति का फल

“प्रेम-भक्ति से जो आपका यश गाते हैं — दुःख और दारिद्र्य उनके निकट नहीं आते। जो जन मन लगाकर आपका ध्यान करता है, उसका जन्म-मरण (बंधन) छूट जाता है।”

चौपाई 15 — योग और शक्ति

“योगी, सुर, मुनि पुकारकर कहते हैं — आपकी शक्ति के बिना योग संभव नहीं। शंकर आचार्य ने तप किया — काम और क्रोध को जीत लिया।” शंकर आचार्य = आदि शंकराचार्य।

चौपाई 16 — शंकराचार्य की कथा

“शंकर ने निशिदिन (दिन-रात) शिव का ध्यान धरा — किसी काल में आपका स्मरण नहीं किया। शक्ति-रूप का मर्म नहीं समझा; जब शक्ति चली गई, तब मन ने पछताया।” यह कथा सौंदर्य-लहरी के पीछे की पारंपरिक कथा है — जहाँ शंकराचार्य ने पहले देवी की उपेक्षा की, और बाद में उन्हीं को परम-तत्त्व के रूप में स्वीकार कर सौंदर्य-लहरी की रचना की।

चौपाई 17 — शरणागति

“शरणागत होकर आपकी कीर्ति बखानी — ‘जय जय जय जगदम्ब भवानी।’ आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं — शक्ति लौटा दी, विलंब नहीं किया।”

चौपाई 18–19 — कवि की प्रार्थना

“हे माता, मुझ पर कष्ट का अति घेराव है — आपके बिना कौन मेरे दुःख हरेगा? आशा-तृष्णा अत्यंत सताती हैं; मूर्ख रिपु मुझे डराते हैं। शत्रुओं का नाश कीजिए महारानी — एकचित्त होकर आपका स्मरण करता हूँ।”

चौपाई 20 — समर्पण

“हे दयालु माता, कृपा कीजिए — ऋद्धि-सिद्धि देकर निहाल कर दीजिए। जब तक जीवित रहूँ, आपकी दया का फल पाऊँ; आपका यश सदा सुनाता रहूँ।”

अंतिम चौपाई — फल-श्रुति और भणिता

“दुर्गा चालीसा जो कोई गाएगा, सब सुख भोगकर परम-पद प्राप्त करेगा। देवीदास (कवि) ने आपकी निज-शरण जानी है — कृपा कीजिए, हे जगदम्ब भवानी।”

इतिहास

दुर्गा चालीसा की रचना पारंपरिक रूप से देवीदास से जोड़ी जाती है — अंतिम चौपाई में “देवीदास शरण निज जानी” से उनके नाम की पहचान होती है। यह भणिता (कवि का हस्ताक्षर) मध्यकालीन भक्ति-काव्य की सामान्य परंपरा है। हालाँकि “देवीदास” नामक कई कवि हुए हैं, और इस विशेष कवि की पहचान विवादास्पद है — कुछ विद्वान इसे 19वीं शताब्दी का मानते हैं।

रचना की भाषा खड़ी बोली है, जो हनुमान चालीसा की अवधी से भिन्न है — यह 19वीं शताब्दी या उसके बाद की रचना का प्रबल संकेत है।

चालीसा की संरचना अन्य चालीसाओं से थोड़ी भिन्न है — इसमें आरंभिक दोहा नहीं है (कुछ संस्करणों में जोड़ा गया है)। यह सीधे “नमो नमो दुर्गे” से प्रारंभ होती है।

विशेष बात — दुर्गा चालीसा में देवी-माहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण के 700-श्लोक का दुर्गा-स्तोत्र) के सभी प्रमुख प्रसंग संक्षेप में आ जाते हैं —

  • महिषासुर-वध (चौपाई 11)
  • शुम्भ-निशुम्भ-संहार (चौपाई 11)
  • रक्तबीज-वध (चौपाई 11)
  • काली-रूप का प्रकटन (चौपाई 12)
  • नरसिंह-अवतार से देवी का सम्बंध (चौपाई 5–6)
  • दस-महाविद्या की वंदना (चौपाई 8)
  • आदि-शंकराचार्य का सौंदर्य-लहरी प्रसंग (चौपाई 15–17)

इस प्रकार यह चालीसा एकल हिंदी कविता में सम्पूर्ण शाक्त-धारा को संकलित करती है — पुराण, तंत्र (दस-महाविद्या), और वेदांत (आदि-शक्ति) — तीनों परंपराओं का संगम।

पाठ विधि

दुर्गा चालीसा के पाठ की पारंपरिक विधि —

  • विशेष काल: नवरात्रि (चैत्र और शारदीय) के नौ दिन — अनिवार्य; दुर्गाष्टमी और विजयादशमी — विशेष; मंगलवार और शुक्रवार — साप्ताहिक।
  • शुभ समय: ब्रह्म-मुहूर्त (4–6 बजे प्रातः) या सायंकाल आरती के साथ
  • आसन: स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर लाल); लाल या कुश का आसन। पूर्व या उत्तर मुख। पीठ सीधी।
  • सामग्री: देवी की प्रतिमा या चित्र; लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल और गुलाब); सिंदूर; चंदन; अक्षत; लाल चुनरी; नारियल; फल; मिठाई (विशेषकर हलवा, पूड़ी, चना — कन्या-पूजन के लिए); घी का दीपक; कुमकुम; नारियल
  • पूर्व मंत्र: पाठ से पूर्व “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” (नवार्ण मंत्र) का 21 या 108 बार जप।
  • पाठ की संख्या: नित्य एक पाठ। नवरात्रि में नौ दिन एक-एक पाठ; अष्टमी पर 9, 21, या 108 बार
  • दुर्गा-सप्तशती के साथ: नवरात्रि में चालीसा से पूर्व या बाद दुर्गा सप्तशती (देवी-माहात्म्य) के पाठ की परंपरा है।
  • समापन: अम्बे गौरी आरती; कन्या-पूजन (अष्टमी या नवमी पर — 9 कन्याओं को भोजन-वस्त्र दान); “जय माता दी” के घोष से समापन।

जाति, लिंग, आयु — कोई बंधन नहीं। आदि-शक्ति की उपासना सब के लिए खुली है। बंगाल और महाराष्ट्र में महिलाएँ अनुष्ठान का नेतृत्व करती हैं।

महत्व

दुर्गा चालीसा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है —

आदि-शक्ति का सिद्धांत — चालीसा में देवी को एक साथ अन्नपूर्णा, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी, और काली के रूप में पहचाना गया है। चौपाई 5–6 — “रूप सरस्वती का तुम धारा… लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं” — यह आदि-शक्ति-सिद्धांत की स्पष्ट घोषणा है: सब देवियाँ एक ही मूल-शक्ति के रूप हैं।

दस-महाविद्या का संग्रह — चौपाई 8 में दस-महाविद्या में से कई का उल्लेख है — मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगलामुखी, भैरवी, तारा, छिन्नमस्ता। यह तंत्र-परंपरा को मुख्यधारा की भक्ति में लाने का प्रयास है।

देवी-माहात्म्य का संग्रह — चालीसा में महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज, काली-रूप का प्रकटन — सब प्रमुख प्रसंग आ जाते हैं। यह चालीसा देवी-माहात्म्य का संक्षिप्त संस्करण है।

सिंह-वाहन का प्रतीक — देवी का सिंह-वाहन शक्ति, साहस, और निर्भयता का प्रतीक है। सबसे शक्तिशाली पशु को वाहन चुनकर देवी संदेश देती हैं — भक्त को भी जीवन के संग्राम में निर्भय और सशक्त रहना चाहिए

सौम्य-रौद्र दोनों रूप — चालीसा देवी का सौम्य रूप (शशि-ललाट, अन्नपूर्णा, गौरी) और रौद्र रूप (विकराल भृकुटि, खप्पर-खड्ग-धारी, काली) — एक साथ प्रस्तुत करती है। अम्बा (पालन करने वाली माता) और चण्डी (संहार करने वाली) — एक ही हैं।

आदि शंकराचार्य का प्रसंग — चौपाई 15–17 में सौंदर्य-लहरी की पारंपरिक कथा है — शंकराचार्य ने पहले देवी की उपेक्षा की, शक्ति खो दी, बाद में शरणागत हुए, और शक्ति लौट आई। यह कथा अद्वैत-वेदांत और शक्ति-सिद्धांत के संगम का प्रतीक है — ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं।

नवरात्रि का हृदय — नवरात्रि के नौ दिन देवी के नौ रूपों को समर्पित हैं — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। इन सब का सार इस एक चालीसा में निहित है।

सब के लिए खुली उपासना — अंतिम चौपाई — “दुर्गा चालीसा जो कोई गावै, सब सुख भोग परमपद पावै” — कोई शर्त नहीं। नर-नारी, बाल-वृद्ध, यति-गृहस्थ — सब माता के सामने समान।

सामान्य प्रश्न

दुर्गा चालीसा के रचयिता कौन हैं?

पारंपरिक रूप से इसकी रचना देवीदास से जोड़ी जाती है — अंतिम चौपाई में “देवीदास शरण निज जानी” से उनके नाम की पहचान होती है। हालाँकि देवीदास नामक कई मध्यकालीन कवि हुए हैं — किस विशेष देवीदास की यह रचना है, यह विवादास्पद है। अधिकांश विद्वान इसे 19वीं शताब्दी की रचना मानते हैं।

दुर्गा चालीसा का पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

नवरात्रि के नौ दिन (चैत्र और शारदीय दोनों) — अनिवार्य। दुर्गाष्टमी और विजयादशमी — विशेष। मंगलवार और शुक्रवार — देवी के साप्ताहिक दिन। दैनिक पाठ के लिए ब्रह्म-मुहूर्त (4–6 बजे प्रातः) श्रेष्ठ है।

दुर्गा चालीसा में किन-किन असुरों के वध का वर्णन है?

चालीसा में चार प्रमुख असुर-वध आए हैं — महिषासुर (भैंसा-असुर), शुम्भ-निशुम्भ (दो भाई), और रक्तबीज (जिसके रक्त की हर बूँद से नया असुर पैदा होता था)। ये सब देवी-माहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण) के प्रसंग हैं।

“दस-महाविद्या” क्या हैं?

दस-महाविद्या = दस बड़ी विद्याएँ — तंत्र-परंपरा की दस देवियाँ। पारंपरिक सूची — काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी (षोडशी), भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, और कमला। चालीसा की चौपाई 8 में इनमें से कई का उल्लेख है।

“खप्पर” क्या है?

खप्पर = कपाल का बना पात्र। देवी अपने काली-रूप में रक्त-पान के लिए खप्पर धारण करती हैं। यह उग्र-शक्ति और अधर्म के अंत का प्रतीक है।

“नगरकोट” से क्या अभिप्राय है?

नगरकोट = हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा का प्रसिद्ध ज्वाला-देवी शक्ति-पीठ। यह 51 शक्ति-पीठों में से एक है — जहाँ सती की जीभ गिरी थी; यहाँ की ज्वाला निरंतर प्रज्वलित रहती है।

“नवार्ण मंत्र” क्या है?

नवार्ण मंत्र = “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” — दुर्गा का प्रमुख मंत्र। नौ अक्षरों का — इसी कारण नव-अर्ण (नौ-अक्षर)। पाठ से पूर्व 21 या 108 बार जप का विधान है।

क्या दुर्गा चालीसा केवल नवरात्रि में पढ़नी चाहिए?

नहीं — किसी भी देवी-पूजा में, मंगलवार-शुक्रवार को, और दैनिक पाठ में भी पढ़ी जा सकती है। नवरात्रि और दुर्गाष्टमी पर इसकी विशेष महिमा है, परंतु यह सर्वकाल का स्तोत्र है।

“ऋद्धि-सिद्धि” का क्या अर्थ है?

ऋद्धि = समृद्धि (भौतिक धन-संपदा); सिद्धि = सफलता (कार्य-पूर्ति)। चालीसा की अंतिम प्रार्थना में देवी से ऋद्धि-सिद्धि का वर माँगा गया है — अर्थात जीवन में पूर्णता की प्रार्थना।