श्री कृष्ण चालीसा
By पारंपरिक (अज्ञात रचयिता)19वीं–20वीं शताब्दीखड़ी बोली–व्रज मिश्रित
मूल पाठ
दोहा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
चौपाई
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुमति-सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर नाग नथैया। कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवै पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव-नयन विशाला। मोर मुकुट वैजयन्ती-माला॥
कुण्डल श्रवण पीत पट आछे। कटि किंकिणि काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहै। छबि लखि सुर नर मुनि-मन मोहै॥
मस्तक तिलक अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बाँसुरी वाले॥
करि पय पान पूतनहिं तार्यो। अका-बका कागासुर मार्यो॥
मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला। भै शीतल लखि तेहि नन्दलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहुँ बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यशुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख महँ चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मँगायो॥
नाथि कालिय नदी से काढ़ा। कीन्हो ग्वाल कृष्ण मिल बाढ़ा॥
कंस के भेजे जे मुनि आये। ऋषि-शिशु पुनि गोकुल मुख पाये॥
मात-पिता की बंदि छुड़ाई। उग्रसेन कह राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लाये। मातु देवकी शोक मिटाये॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षटदश सहस कुमारी॥
दे भीमहिं तृणचीर सहारा। जरासंध राक्षस कह मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
दीन सुदामा के दुख टारे। तंदुल तीन मूठि मुख डारे॥
प्रेम भक्ति के अति वशकारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके। लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाये। भक्तन हृदय सुधा बरसाये॥
मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी। शालिग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत-निन्दा करि तत्काला। जीवन-मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरंतहिं वसन बने नँदलाला। बढ़े चीर भै अरि-मुख काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हाई। डूबत भँवर बचायो आई॥
विप्र सुदामा के तुम मीता। ऐसी प्रभुता सब जग जीता॥
द्वारिकाधीश माधव सोई। नित्य लीलाधर श्याम वही होई॥
भक्तन हित अवतार लियो जब। प्रकट लीलाधर भयो वहु तब॥
पाठ करै यह चालीसा। होय सिद्ध साधे जगदीशा॥
यह बानी जो नित प्रति गावै। मीरा प्रभु के दर्शन पावै॥
दोहा
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
भव-सागर तिरि जाय नर, सिद्धि सकल नर पारि॥
अर्थ
कृष्ण चालीसा भगवान कृष्ण के बाल-रूप, गोप-रूप और लीला-रूप — तीनों को एक साथ स्मरण करता है। चालीस चौपाइयों में रचयिता ने जन्म से लेकर महाभारत तक भगवान की समस्त मुख्य लीलाओं को संक्षेप में पिरो दिया है।
आरंभिक दोहे भगवान के स्वरूप का चित्रण करते हैं — हाथ में बाँसुरी, नीले मेघ-समान श्याम वर्ण, अधर बिम्बफल-से अरुण, नयन कमल-समान, पीताम्बर पहने हुए, मनमोहन मदन-छवि वाले कृष्णचन्द्र महाराज की जय हो।
आरंभिक चौपाइयाँ (1–6) भगवान के बाल्य-रूप का स्मरण करती हैं। यदुवंश के नन्दन, जगत्-वन्दनीय, वसुदेव-देवकी के पुत्र, यशोदा-नन्द के दुलारे, भक्तों के नेत्रों के तारे — इन सब रूपों में भगवान को नमन है। नटों में श्रेष्ठ, कालिय नाग के मद को चूर करने वाले, धेनु चराने वाले — कृष्ण कन्हैया का यह स्वरूप व्रजवासी हृदय से अंकित है।
चौपाई 7–10 भगवान के सौन्दर्य का वर्णन करती हैं — गोल कपोल, अरुण चिबुक, मृदु मुस्कान, बड़े-बड़े कमल नयन, मोर मुकुट, वैजयन्ती माला, कानों में कुण्डल, पीताम्बर, कमर पर किंकिणी, नीले कमल जैसा सुन्दर शरीर — यह छवि देव, मनुष्य और मुनि सबके मन को मोह लेती है।
चौपाई 11–18 भगवान की प्रमुख बाल-लीलाओं का सार प्रस्तुत करती हैं। पूतना का स्तनपान कर उसे तार देना, अघासुर–बकासुर–शकटासुर का संहार, मधुवन की दावाग्नि से ग्वाल-गायों की रक्षा, इन्द्र के क्रोध से ब्रज की रक्षा हेतु गोवर्धन को कनिष्ठा अंगुली पर सात दिन तक धारण करना, माता यशोदा को अपने मुख में चौदह लोक का दर्शन कराना, कंस के भेजे राक्षसों का वध, और कालिय नाग का दमन।
चौपाई 19–24 द्वारिका-काल की लीलाओं को छूती हैं — कंस-वध, माता-पिता को बन्दीगृह से मुक्त कराना, उग्रसेन को राज दिलाना, धरती में डूबे देवकी के छह पुत्रों को वापस लाना, भौमासुर तथा मुरासुर का संहार और सोलह सहस्र कन्याओं का उद्धार, जरासंध-वध में भीम की सहायता, और बकासुर आदि असुरों का नाश — सब भक्तों के कष्ट-निवारण के लिए।
चौपाई 25–28 भक्तवत्सलता का दर्शन हैं। निर्धन सुदामा के तीन मुट्ठी तंदुल को प्रेम से ग्रहण कर उन्हें अकल्पनीय वैभव दे देना, अर्जुन का सारथ्य करना, और गीता के ज्ञान से सम्पूर्ण भक्त-समाज के हृदय में अमृत बरसाना — ये कृष्ण की दीन-हितैषी प्रभुता के अद्वितीय उदाहरण हैं।
चौपाई 29–35 उत्तरकालीन भक्तों पर कृपा का स्मरण कराती हैं। मीराबाई के विष-पात्र को अमृत बना देना, भेजे गए साँप को शालिग्राम-शिला बना देना, ब्रह्मा के मद का माया-दर्शन से शमन करना, शत निन्दा के बावजूद शिशुपाल को अंत में मुक्ति देना, और द्रौपदी की लाज की रक्षा हेतु अनन्त वस्त्र प्रदान करना — कृष्ण ने सिद्ध किया कि वे केवल अपने युग के नहीं, हर युग के अनाथों के नाथ हैं।
अन्तिम चौपाइयाँ (36–40) भगवान की द्वारिकाधीश-रूप में प्रतिष्ठा का स्मरण कर पाठ-फल का संकल्प करती हैं। जो भक्त इस चालीसा का पाठ हृदय में धारण कर नित्य करता है, उसे ईश्वर-दर्शन और सिद्धि की प्राप्ति होती है।
अन्तिम दोहा पाठ-फल को संक्षेप में कहता है — जो इस चालीसा का पाठ हृदय में धरकर करता है, वह संसार-सागर को पार करता है और समस्त सिद्धियाँ प्राप्त करता है।
इतिहास
कृष्ण चालीसा की रचना का काल 19वीं–20वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है। यह उन परवर्ती भक्ति-रचनाओं में से है जो हनुमान चालीसा (तुलसीदास, 16वीं शताब्दी) और शिव चालीसा (अयोध्यादास, 19वीं शताब्दी) की लोकप्रियता के बाद रची गयीं। तुलसी, सूर, मीरा और रसखान जैसे मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों के विशाल काव्य-भण्डार के रहते इस चालीसा का स्वरूप उन्हीं से प्रेरित और उनकी संक्षिप्त भक्ति-सार के रूप में देखा जा सकता है।
रचयिता का नाम निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। मुद्रित संस्करणों में अक्सर “अज्ञात” या “पारंपरिक” लिखा जाता है। कुछ संस्करणों में अंतिम चौपाइयों में “मीरा प्रभु के दर्शन पावै” जैसे संदर्भ हैं जो इसे मीराबाई की भक्ति-धारा से जोड़ते हैं — पर यह संकेत मात्र है, मीरा द्वारा रचित होने का प्रमाण नहीं।
भाषा अधिकांशतः खड़ी बोली है, जिसमें व्रज भाषा के पुट हैं — “लखि”, “बनवारी”, “नँदलाला”, “मूसर”, “तेहि” जैसे शब्द-रूप व्रज परम्परा के हैं। यह उस संक्रांति-काल को प्रतिबिम्बित करता है जब आधुनिक हिन्दी ने आकार लेना शुरू किया था पर लोकगीतों की भाषा अब भी व्रज-अवधी थी।
संस्करण-भेद महत्वपूर्ण हैं। कई मुद्रित संस्करणों में चौपाइयों के क्रम में मामूली अन्तर मिलते हैं; कहीं कुछ चौपाइयाँ छूट गयी हैं, कहीं कुछ जोड़ी गयी हैं। हमने यहाँ सबसे अधिक प्रचलित रूप प्रस्तुत किया है, परन्तु आपके परिवार-परम्परा या क्षेत्र में थोड़ा भिन्न पाठ हो सकता है।
कृष्ण-कथा का स्रोत चौपाइयों में स्पष्ट दिखाई देता है — श्रीमद्भागवत महापुराण (विशेषतः दशम स्कन्ध), विष्णु पुराण और महाभारत। पूतना-वध, गोवर्धन-धारण, कालिय-दमन, कंस-वध, सुदामा-कथा, द्रौपदी-लज्जा-रक्षा — ये सभी प्रसंग भागवत और महाभारत से सीधे लिए गए हैं और भक्ति परम्परा में सहस्राब्दियों से अनुगाये गये हैं।
पाठ विधि
कृष्ण चालीसा के पाठ की कोई एक अनिवार्य विधि नहीं है। निम्नलिखित परम्परागत मार्गदर्शन है, जिसे श्रद्धा और सुविधा के अनुसार अपनाया जा सकता है।
समय। सर्वाधिक अनुकूल समय ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4–6 बजे) है, परन्तु सायं संध्या-काल भी उत्तम है। बुधवार को कृष्ण-दिवस माना जाता है, अतः साप्ताहिक संकल्प में बुधवार का चयन करते हैं। जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) पर पाठ का विशेष महत्व है।
दिशा। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
आसन। स्वच्छ कुश, ऊन या सूती आसन पर बैठें। नंगी भूमि पर पाठ करना उपयुक्त नहीं माना जाता।
सामग्री। भगवान कृष्ण की प्रतिमा या चित्र, घी का दीपक, धूप, ताज़े फूल (विशेषतः वैजयन्ती या तुलसी-दल), जल का कलश, और भोग के लिए मक्खन-मिश्री या दूध। तुलसी-पत्र कृष्ण-पूजा का अनिवार्य अंग है।
संकल्प। पाठ से पूर्व मन ही मन संकल्प करें — आज मैं अमुक प्रयोजन से (या निःस्वार्थ कृष्ण-स्मरण के लिए) श्री कृष्ण चालीसा का पाठ करूँगा/करूँगी।
विधि। आरंभ में दीप-धूप प्रज्वलित कर तुलसी-पत्र भगवान को अर्पित करें। प्रथम दोहे का धीरे-धीरे, स्पष्ट उच्चारण से पाठ करें। फिर चालीस चौपाइयाँ क्रमशः पढ़ें — प्रत्येक चौपाई के बीच क्षणिक विश्राम लें। अन्त में अंतिम दोहे का पाठ कर “जय श्री कृष्ण” का तीन बार उच्चारण करें।
अवधि। एक पाठ में लगभग 7–10 मिनट लगते हैं। संख्या-संकल्प में 1, 7, 11, 21, 51 या 108 बार के पाठ की परम्परा है।
प्रसाद। पाठ के बाद भगवान को अर्पित मक्खन-मिश्री, दूध या तुलसी-जल को प्रसाद रूप में स्वयं ग्रहण कर परिजनों में बाँटें।
महत्व
आध्यात्मिक महत्व। कृष्ण चालीसा का पाठ विशेषतः हृदय की मलिनता, अहंकार और राग-द्वेष को क्षीण करने वाला माना जाता है। चालीस चौपाइयाँ कृष्ण के विभिन्न रूपों — बालक, सखा, गुरु, परब्रह्म — का स्मरण कराती हैं, जिससे साधक के भीतर भक्ति-भाव का विकास होता है।
मानसिक संतुलन। बाँसुरी की मधुरता, मुस्कान की मोहिनी, और लीलाओं की विविधता का स्मरण मन को शान्ति देता है। चिन्ता, अवसाद और भय के समय इस चालीसा का पाठ अनेक भक्तों के लिए सम्बल बना है।
पारिवारिक एकता। कृष्ण को पारिवारिक संबंधों — पुत्र, सखा, पति, रथचालक, गुरु — सभी रूपों में स्मरण किया जाता है। पारिवारिक कलह या तनाव में कृष्ण-चालीसा-पाठ की परम्परा पारिवारिक प्रेम को पुनर्जागृत करती है।
बाल-रक्षा। बच्चों की दीर्घायु और रोग-निवारण के लिए माताएँ बालक के सिरहाने इस चालीसा का पाठ करती हैं। पूतना-वध, अघासुर-संहार आदि बाल-कृष्ण की लीलाएँ बच्चों को बुरे प्रभावों से बचाने का प्रतीक मानी जाती हैं।
विद्या और कला। कृष्ण मुरली के देवता हैं — संगीत, नृत्य और काव्य के अधिष्ठाता। कलाकार, संगीतकार और छात्र अपनी साधना से पूर्व कृष्ण-स्मरण की परम्परा को मानते हैं।
अध्यात्म का सार। भगवद्गीता में कृष्ण ने कर्म, ज्ञान और भक्ति — तीनों मार्ग बताए हैं। चालीसा-पाठ इन तीनों मार्गों के साधक को कृष्ण-स्मरण में एकत्रित करता है — यह स्मरण ही गीता के “मामेकं शरणं व्रज” का सार है।
सामान्य प्रश्न
कृष्ण चालीसा के रचयिता कौन हैं?
कृष्ण चालीसा के रचयिता का नाम निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। मुद्रित संस्करणों में सामान्यतः “पारंपरिक” या “अज्ञात” लिखा जाता है। यह 19वीं–20वीं शताब्दी की रचना मानी जाती है, जो हनुमान चालीसा और शिव चालीसा की लोकप्रियता के बाद उसी पद-संरचना में रची गयी।
कृष्ण चालीसा का पाठ कब और कितनी बार करना चाहिए?
सर्वाधिक उपयुक्त समय ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4–6 बजे) है। बुधवार और जन्माष्टमी पर विशेष महत्व है। संख्या में 1, 7, 11, 21, 51 या 108 — कोई भी संकल्प आपकी सुविधा और श्रद्धा पर निर्भर है। नित्य एक पाठ भी पर्याप्त है।
क्या स्त्रियाँ मासिक धर्म के समय कृष्ण चालीसा पढ़ सकती हैं?
यह व्यक्तिगत श्रद्धा और परिवार की परम्परा का विषय है। शास्त्रीय मत में मानसिक पाठ या मन ही मन स्मरण को किसी भी अवस्था में निषिद्ध नहीं माना गया। आधुनिक संत-परम्पराएँ इस विषय पर उदार दृष्टिकोण रखती हैं।
कृष्ण चालीसा संस्कृत में है या हिन्दी में?
कृष्ण चालीसा खड़ी बोली में है, जिसमें व्रज भाषा का स्पर्श है। यह संस्कृत नहीं है। संस्कृत में कृष्ण के अन्य प्रसिद्ध स्तोत्र हैं — मधुराष्टकम्, गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्, अच्युताष्टकम् आदि।
क्या तुलसी-पत्र अनिवार्य है?
तुलसी-पत्र कृष्ण-पूजा का अति प्रिय अंग है — कहा जाता है कि भगवान को तुलसी-दल के बिना भोग ग्रहण नहीं होता। पर यदि उपलब्ध न हो, तो श्रद्धा से किया गया पाठ भी पूर्ण फल देता है।
क्या भगवद्गीता और कृष्ण चालीसा में संबंध है?
हाँ। चालीसा की 27वीं–28वीं चौपाई में भगवान के “भारत के पारथ रथ हाँके… निज गीता के ज्ञान सुनाये” का उल्लेख है, जो गीता-उपदेश का प्रत्यक्ष स्मरण है। चालीसा कृष्ण के समस्त जीवन का सार है, जिसमें गीता एक केन्द्रीय प्रसंग है।
क्या कृष्ण चालीसा के एकाधिक पाठान्तर हैं?
हाँ, मुद्रित और मौखिक परम्पराओं में चौपाइयों के क्रम और कुछ शब्दों में भिन्नता मिलती है। हमने यहाँ सबसे अधिक प्रचलित रूप दिया है। यदि आपके परिवार में कोई अन्य पाठ-परम्परा है, तो वह भी मान्य है — भक्ति का मूल भाव सर्वोपरि है।