श्री लक्ष्मी चालीसा
By पारंपरिक (अज्ञात रचयिता)१९वीं–२०वीं शताब्दीखड़ी बोली
मूल पाठ
दोहा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करहु हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि, परम सुख आस॥
सिंधु सुता विष्णुप्रिये, नत शिर बारंबार।
ऋद्धि-सिद्धि-मंगल-निधि, करहु कृपा अपार॥
चौपाई
नमो नमो जगमातु भवानी। सुखद वरद हे माय कल्याणी॥१॥
कमलासन कमलापति प्यारी। नमो नमो भगवती श्रीहारी॥२॥
रत्नाकर के रत्न-स्वरूपा। हरि के मन की मूर्ति अनूपा॥३॥
सब सुख-संपत्ति की दात्री। करुणा-मय जग की हे पात्री॥४॥
जगत-जननी जय कमल-निवासिनि। शुभद-वरद हे हरि-सहचारिणि॥५॥
कोटि सूर्य सम मुख-छवि न्यारी। तुम सम कौन भगति-हितकारी॥६॥
चहुँ दिशि कमल हाथ में सोहै। मधुर हास से जग मन मोहै॥७॥
गज-राजन से अभिषेक करावत। चारों ओर अमरगण गावत॥८॥
लक्ष्मीजी की लीला अपारा। गावत वेद-पुराण उदारा॥९॥
जो नर ध्यावत भाव लगाई। ता पर कृपा करत मन भाई॥१०॥
विष्णु-प्रिये जय कमल-कुमारी। मात-पिता-कुल-तारिनि-तारी॥११॥
जो जन सेवा प्रेम से करै। निर्धन हो तौ धन से भरै॥१२॥
रोग-शोक से रहित बनावै। संकट-कष्ट सकल मिटावै॥१३॥
देवी कहावै महालक्ष्मी। माँ अष्टकर हो जग-शुभ-दक्षी॥१४॥
आदि लक्ष्मी—मूल जगत की। धन्य लक्ष्मी—धन की दात्री॥१५॥
धान्य लक्ष्मी—अन्न की धाता। गज लक्ष्मी—बल-सम्पद-दाता॥१६॥
संतान लक्ष्मी—पुत्र-वरदायी। वीर लक्ष्मी—साहस-प्रदायी॥१७॥
विजय लक्ष्मी—जय की देवी। विद्या लक्ष्मी—ज्ञान-निधि एवी॥१८॥
अष्टकर रूप एक माता। सब सुख देत भक्त को त्राता॥१९॥
समुद्र मंथन से प्रकट हुई। देव-दैत्य के बीच कही॥२०॥
विष्णु ने तुम्हें वरण कर पाया। तीन लोक में मंगल छाया॥२१॥
तुम बिन यज्ञ अधूरे रहते। तुम बिन देव अनाथ-से कहते॥२२॥
तुम बिन गृह-संसार न शोभे। तुम बिन भोग-योग नहिं होवे॥२३॥
तुलसी सम तुम पावन माता। पतिव्रता-शिरोमणि ख्याता॥२४॥
शुक्रवार तुम्हरा प्रिय वारा। पूजा-व्रत से हो उद्धारा॥२५॥
दीपावलि की रात निराली। तुम घर-घर में फिरत निहाली॥२६॥
स्वच्छ-शुद्ध जो घर तुम पावो। तहाँ निवास सदा बस जावो॥२७॥
तेल-दीप जो जलावै आँगन। पाहि-पाहि करत तेरा मनन॥२८॥
खील-बताशा भोग जो दीन्हें। मनोकामना सब पूरण कीन्हें॥२९॥
कोश-भण्डार सदा भर जावे। ऋण-व्याधि सब दूर हटावे॥३०॥
जो नर पाठ करै नित नेमा। ता पर मेहर करै हर सीमा॥३१॥
संकट से उद्धार करावै। सुख-सम्पति से घर भर जावै॥३२॥
व्यापार में लाभ बढ़ावै। नौकरी में उन्नति लावै॥३३॥
संतान सुख से मन हर्षावै। दाम्पत्य प्रेम सदा बनावै॥३४॥
विद्या-बुद्धि से शिर ऊँचा। यश-कीर्ति का बाजे डंका॥३५॥
जो शुक्रवार करै उपवासा। ता को मिले सकल अभिलाषा॥३६॥
सोलह शुक्रवार जो ध्यावै। मनवांछित फल नियत पावै॥३७॥
ब्रह्म-विष्णु-शिव सब तुम सेवें। तीन देव तुम चरण भजेवें॥३८॥
जय जय जय जग-मात भवानी। तुम बिन कोउ नहिं त्राता मानी॥३९॥
जो यह चालीसा नित गावै। सो लक्ष्मी कृपा सदा पावै॥४०॥
दोहा
सिंधु-सुता विष्णु-प्रिये, करहु कृपा महरानि।
दीन-हीन की हे मात, हरहु संकट हानि॥
अर्थ
लक्ष्मी चालीसा माँ लक्ष्मी की उन सभी रूपों, गुणों, और कृपाओं का संक्षिप्त वर्णन है जिनसे भक्त की भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार की वृद्धि होती है।
प्रारंभ के दोहे में माँ का आवाहन है — ‘सिंधु-सुता’ (समुद्र की पुत्री) और ‘विष्णुप्रिये’ (विष्णु की प्रिय)।
चौपाइयों में पहले माँ की महिमा का वर्णन है — कमल पर विराजमान, चारों हाथों में कमल, गज द्वारा अभिषेक, कोटि सूर्य के समान कांति।
१४ से १८ तक की चौपाइयों में अष्टलक्ष्मी के आठ रूपों का परिचय है — आदि (मूल), धन्य (धन), धान्य (अन्न), गज (बल), संतान (वंश), वीर (साहस), विजय (विजय), विद्या (ज्ञान)।
२० से २४ तक की चौपाइयों में पौराणिक संदर्भ हैं — समुद्र मंथन से प्रकट होना, विष्णु से विवाह, यज्ञ-कर्म में अनिवार्य उपस्थिति, और तुलसी-तुल्य पवित्रता।
२५ से ३० तक के पद पूजा-विधि की ओर संकेत करते हैं — शुक्रवार उनका प्रिय दिन, दीपावली रात्रि की रात्रि-यात्रा, स्वच्छ घर में निवास, तेल-दीप, खील-बताशे का भोग।
अंत के पद फलश्रुति हैं — जो भक्त नियमित पाठ करे, उसे व्यापार में लाभ, नौकरी में उन्नति, संतान-सुख, विद्या, यश, और सोलह शुक्रवार के व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति।
इतिहास
लक्ष्मी चालीसा की रचना का सटीक रचयिता ज्ञात नहीं है। यह १९वीं–२०वीं शताब्दी के बीच प्रचलित हुआ, जब हनुमान चालीसा की लोकप्रियता के पश्चात् अनेक देवी-देवताओं के लिए ‘४० चौपाइयों वाले चालीसा’ की रचना हुई। इन सभी का छंद, संरचना, और स्वर हनुमान चालीसा से प्रभावित है।
शास्त्रीय आधार — माँ लक्ष्मी का वर्णन ‘श्री सूक्त’ (ऋग्वेद का खिल भाग), ‘पद्म पुराण’, ‘विष्णु पुराण’, और ‘श्री महालक्ष्मी अष्टक’ में है। चालीसा इन्हीं स्रोतों से आधारित है, परंतु लोक-भाषा में।
अष्टलक्ष्मी की परंपरा — दक्षिण भारत में अष्टलक्ष्मी की पूजा का विशेष प्रचलन है। चेन्नई का प्रसिद्ध ‘अष्टलक्ष्मी मंदिर’ इसी आठ रूपों की सेवा को समर्पित है। चालीसा में चौदहवीं से अठारहवीं चौपाई तक इसी परंपरा को संक्षेप में स्थान दिया गया है।
पाठ विधि
कब करें
- दैनिक प्रातः — स्नान के पश्चात
- शुक्रवार — माँ लक्ष्मी का प्रिय वार; विशेष फलदायी
- दीपावली, धनतेरस, शरद पूर्णिमा — विशेष पर्व
- गृह-प्रवेश, व्यापार आरंभ, कुबेर-स्थापन के अवसरों पर
- सोलह शुक्रवार के व्रत के साथ संकल्प पूर्वक
कैसे करें
- स्नान के पश्चात लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
- पूजा-स्थल पर माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि सम्भव हो तो श्री यंत्र भी रखें।
- गंगा जल से अभिषेक करें (यदि उपलब्ध हो)।
- लाल पुष्प, कमल पुष्प, या गुलाब अर्पित करें।
- दीप प्रज्वलित करें — गाय का घी का दीपक श्रेष्ठ; तेल का भी उपयुक्त।
- धूप-नैवेद्य अर्पित करें। भोग में खीर, मिष्ठान्न, खील, बताशे, फल रखें।
- प्रथम श्री गणेश का स्मरण करें (किसी भी पूजा में पहले गणेश)।
- फिर लक्ष्मी चालीसा का पाठ एक बार धीमे, स्पष्ट उच्चारण से करें।
- अंत में दोहा पढ़कर ‘जय लक्ष्मी माता’ की आरती गाएँ।
- प्रसाद वितरण के साथ पाठ समाप्त करें।
सोलह शुक्रवार व्रत
लगातार सोलह शुक्रवार लक्ष्मी चालीसा का पाठ कर उपवास रखना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस व्रत में:
- दिन में फलाहार
- सायंकाल चालीसा-पाठ एवं आरती
- १६वें शुक्रवार को विशेष पूजा एवं १६ कन्याओं या ब्राह्मणियों को भोजन
महत्व
- अष्टलक्ष्मी का सर्वसमावेशी रूप — एक चालीसा में सभी आठ रूपों का स्मरण।
- गृहस्थ जीवन के लिए विशेष — व्यापार, नौकरी, संतान, दाम्पत्य — सब क्षेत्रों के लिए मंगलकारी।
- भौतिक एवं आध्यात्मिक सम्पन्नता — माँ लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं, बल्कि ‘श्री’ अर्थात् कल्याण की देवी हैं।
- दीपावली पूजन का अंग — पारंपरिक दीपावली रात्रि-पूजन में इसी चालीसा का पाठ होता है।
- सरल भाषा — खड़ी बोली में होने के कारण उच्चारण सहज है।
सामान्य प्रश्न
क्या लक्ष्मी चालीसा केवल धन के लिए है?
नहीं। ‘लक्ष्मी’ का अर्थ केवल धन नहीं — बल्कि ‘श्री’, अर्थात् सर्वांगीण कल्याण है। आठों रूप — संतान, विद्या, धान्य, साहस — सब इसमें समाहित हैं। केवल पैसे के लिए माँ की पूजा करना सीमित दृष्टि है।
क्या पुरुष भी लक्ष्मी चालीसा का पाठ कर सकते हैं?
बिलकुल। यह स्तोत्र किसी भी लिंग या आयु-वर्ग के लिए सुलभ है। राजा कुबेर तक माँ लक्ष्मी की पूजा करते हैं — स्तोत्र-पाठ का अधिकार सबको समान है।
क्या रजस्वला अवस्था में पाठ कर सकती हैं?
पारंपरिक मत में स्पर्श-पूजा का वर्जन है, परंतु मानसिक पाठ अथवा दूर से आरती-दर्शन का निषेध नहीं है। आधुनिक अधिकांश आचार्य मानसिक स्मरण को सदैव श्रेयस्कर मानते हैं।
कितने पाठ शुभ हैं?
एक, तीन, सात, या ग्यारह आवृत्तियाँ शुभ मानी जाती हैं। दीपावली पर एक पाठ, शुक्रवार को तीन या सात, संकल्प-व्रत में ग्यारह या सोलह।
चालीसा पाठ से कब तक फल मिलता है?
शास्त्रों में ‘सोलह शुक्रवार’ को संकल्प-काल माना गया है। परंतु निष्ठा के साथ नियमित पाठ का प्रभाव कुछ ही सप्ताह में अनुभव होने लगता है — चाहे आर्थिक स्थिति हो, चाहे मानसिक शांति।
श्री यंत्र के साथ पाठ क्यों श्रेष्ठ है?
श्री यंत्र माँ लक्ष्मी का ज्यामितीय प्रतीक है, जिसे शंकराचार्य ने ‘सौंदर्यलहरी’ में परम-यंत्र कहा है। इसकी उपस्थिति में किया गया पाठ शास्त्रों में अधिक प्रभावी माना गया है।
घर के किस दिशा में लक्ष्मी पूजन करें?
उत्तर अथवा पूर्व दिशा शुभ मानी जाती है। उत्तर कुबेर की दिशा है (धन के देवता), पूर्व सूर्योदय की दिशा है (आरंभ की)। दक्षिण से बचें।