गणेश चालीसा
By रामसुन्दर प्रभुदास (पारंपरिक श्रेय)19वीं–20वीं शताब्दीहिंदी (खड़ी बोली)
मूल पाठ
दोहा
जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्व-विधाता॥
ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगल कारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।
अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।
पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
सकल मगन सुख मंगल गावहिं।
नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं।
सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखने भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक देखन चाहत नाहीं॥
गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥
कहन लगे शनि मन सकुचाई।
का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास उमा कर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥
पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो आकाशा॥
गिरिजा गिरीं विकल हवै धरणी।
सो दुख दशा गयो नंहि वरणी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ विष्णु सिधाय।
काटि चक्र सों गज शिर लाये॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीना पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
दोहा
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥
अर्थ
गणेश चालीसा भगवान गणपति को समर्पित 40-चौपाई स्तोत्र है। यह चालीसा विशेष रूप से गणेश के जन्म, उनके गज-शीर्ष की प्राप्ति, और प्रथम-पूज्य होने की कथा को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है — इस प्रकार यह केवल स्तुति-स्तोत्र नहीं, गणेश-पुराण की संक्षिप्त कथा भी है।
आरंभिक दोहा
“जय गणपति, सद्गुणों के सदन, कविवरों के मुख पर कृपा करने वाले; विघ्नों को हरने वाले, मंगल करने वाले — जय जय गिरिजालाल (पार्वती के पुत्र)।” गणेश को सद्गुणों का धाम और विघ्नहर्ता कहकर वंदना का प्रारंभ।
चौपाई 1–2 — स्वरूप-वंदना
“जय जय गणपति, गणराज, मंगल भरने वाले, शुभ कार्यों को करने वाले। जय गज-वदन (हाथी के मुख वाले), सुख देने वाले, विश्व-विनायक (विश्व-नायक), बुद्धि के विधाता।”
चौपाई 3–4 — आभूषण और शस्त्र
वक्र तुण्ड (टेढ़ी सूँड), सुहावनी शुण्ड, मस्तक पर त्रिपुण्ड तिलक, मणि-मुक्ता की माला, स्वर्ण मुकुट, विशाल नेत्र। हाथों में पुस्तक (विद्या), कुठार (शस्त्र), त्रिशूल, और मोदक का भोग; सुगंधित पुष्प; पीताम्बर वस्त्र; मुनियों के मन को भाने वाली पादुकाएँ।
चौपाई 5 — परिवार और परिचर
“धन्य शिव-पुत्र, षडानन (कार्तिकेय) के भाई, गौरी (पार्वती) के लाल, विश्व-विधाता। ऋद्धि और सिद्धि (आपकी पत्नियाँ) चँवर (पंखा) झलती हैं; मूषक-वाहन द्वार पर सुशोभित है।”
चौपाई 6–8 — जन्म-कथा का प्रारंभ
“आपकी शुभ जन्म-कथा अति पवित्र है। एक समय गिरिराज (हिमालय) की पुत्री पार्वती ने पुत्र के लिए भारी तप किया। यज्ञ पूर्ण हुआ; तब तुम (विष्णु) द्विज (ब्राह्मण) रूप में पहुँचे। अतिथि जानकर पार्वती ने अति आदर से सेवा की। प्रसन्न होकर तुमने वर दिया — ‘पुत्र-हेतु तप किया है, तो विशाल बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा — बिना गर्भ धारण इस काल में।’”
चौपाई 9–10 — बालक रूप में प्रकट
“‘गणनायक, गुण-ज्ञान का निधान, प्रथम-पूज्य भगवान-रूप’ — ऐसा कहकर अंतर्धान हो गए। और बच्चे के रूप में पालने पर प्रकट हो गए। शिशु-रूप में रोने लगे — पार्वती को मुख देखकर अनुपम सुख हुआ। सब आनंदित होकर मंगल-गान करने लगे; आकाश से देवताओं ने पुष्प बरसाए।”
चौपाई 11–12 — शनि का आगमन
“शिव और उमा (पार्वती) ने बहुत दान दिए। देवता और मुनि बच्चे को देखने आए। आनंद-मंगल देखकर शनिराज भी आए। परंतु शनि अपने अवगुण (दृष्टि-दोष) के कारण बालक को देखना नहीं चाहते थे। पार्वती ने मन में भेद बढ़ाया — ‘मेरे उत्सव में शनि, तू क्यों नहीं भाता?’”
चौपाई 13 — शनि की शंका और पार्वती की हठ
“शनि सकुचाते हुए कहने लगे — ‘क्या होगा यदि मैं शिशु को देखूँ?’ पार्वती को विश्वास नहीं हुआ; उन्होंने शनि से बालक को देखने का आग्रह किया।”
चौपाई 14 — दुर्घटना
“शनि की दृष्टि के कोण से प्रकाश पड़ते ही बालक का सिर आकाश में उड़ गया। पार्वती विकल होकर धरती पर गिर पड़ीं — उस दुःख की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।”
चौपाई 15–16 — गज-शीर्ष की प्राप्ति
“कैलाश में हाहाकार मच गया — शनि ने पुत्र का नाश कर दिया। तत्काल विष्णु गरुड़ पर सवार होकर निकले; चक्र से एक हाथी का सिर काट लाए। बालक के धड़ पर रख दिया; प्राण और मंत्र पढ़कर शंकर ने डाला। शिव ने तब उसका नाम गणेश रखा — और ‘प्रथम-पूज्य, बुद्धि के निधान’ का वर दिया।”
चौपाई 17–18 — बुद्धि-परीक्षा
“जब शिव ने बुद्धि-परीक्षा की — ‘पृथ्वी की प्रदक्षिणा करो।’ षडानन (कार्तिकेय) मोर पर सवार होकर चल पड़े, भ्रमित हुए, भूल गए। तुमने (गणेश ने) बुद्धि-उपाय रचा — माता-पिता के चरण ग्रहण करके उनकी सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं।”
चौपाई 19 — विजय
“शिव हृदय में हर्षित हुए, कहा — ‘धन्य गणेश!’ आकाश से देवताओं ने बहुत पुष्प बरसाए। यह कथा प्रथम-पूज्य होने के अधिकार की कथा है।”
चौपाई 20–22 — कवि की विनय और अंतिम प्रार्थना
“आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई शेष-नाग (सहस्र-मुख) भी नहीं गा सकते। मैं मति-हीन, मलीन, दुखारी हूँ — किस विधि से आपकी विनय करूँ? रामसुन्दर प्रभुदास (कवि का नाम) भजते हैं — प्रयाग, ककरा, दुर्वासा (तीर्थ-स्थलों के नाम)। हे प्रभु, अब दीन पर दया कीजिए — अपनी शक्ति और भक्ति कुछ दीजिए।”
अंतिम दोहे
“जो श्री गणेश चालीसा का पाठ ध्यान से करे, उसके घर नित्य-नवीन मंगल बसें, और जगत में सम्मान मिले।” अंतिम दोहे में रचना-तिथि का उल्लेख — सम्बन्ध सहस्त्र दश, ऋषि-पञ्चमी दिनेश — जिसका अर्थ कुछ विद्वान सम्वत 1010 या किसी अन्य काल-मान से जोड़ते हैं।
इतिहास
गणेश चालीसा की रचना पारंपरिक रूप से रामसुन्दर प्रभुदास से जोड़ी जाती है — चौपाई 22 में “भजत रामसुन्दर प्रभुदासा” से उनके नाम की पहचान होती है। हालाँकि कुछ विद्वान इसे रामसुन्दर प्रभु के दास के रूप में पढ़ते हैं — अर्थात कवि अनाम है, और यह केवल अपने आप को विष्णु (रामसुन्दर) का दास घोषित कर रहा है।
रचना का सटीक काल स्पष्ट नहीं है, परंतु अंतिम दोहे में दी गई तिथि — “सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश” — से कुछ विद्वान इसे विक्रम संवत 1910 (1853 ईस्वी) के आसपास रखते हैं। कुछ अन्य इसे 19वीं–20वीं शताब्दी की रचना मानते हैं।
रचना की भाषा खड़ी बोली है, जो हनुमान चालीसा की अवधी से भिन्न है — स्पष्ट रूप से यह बाद की रचना है।
चालीसा की संरचना अन्य चालीसाओं के समान है — एक आरंभिक दोहा, चालीस चौपाइयाँ, और दो समापन दोहे।
विशेष बात — गणेश चालीसा का अधिकांश भाग गणेश के जन्म और गज-शीर्ष की कथा को समर्पित है (चौपाई 6–18)। यह कथा गणेश पुराण, शिव पुराण, और ब्रह्म-वैवर्त पुराण से मिलती-जुलती है। चालीसा में शनि की दृष्टि से सिर उड़ना, विष्णु द्वारा गज-शीर्ष लाना, और बुद्धि-परीक्षा में कार्तिकेय पर विजय — तीनों प्रसंग संक्षेप में आ जाते हैं।
पाठ विधि
गणेश चालीसा के पाठ की पारंपरिक विधि —
- विशेष दिन: बुधवार — गणेश का दिन; गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) — सबसे बड़ा गणेश-पर्व; संकष्टी चतुर्थी — हर माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी।
- शुभ समय: स्नान के पश्चात प्रातःकाल। चन्द्र-दर्शन के समय (विशेषकर संकष्टी पर)।
- आसन: स्वच्छ वस्त्र, लाल या पीला आसन। पूर्व या उत्तर मुख। पीठ सीधी।
- सामग्री: गणेश की प्रतिमा या चित्र; दूर्वा (दूर्वा घास के 21 तृण — अनिवार्य); लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल); सिंदूर; चंदन; मोदक या लड्डू; नारियल; घी का दीपक; अगरबत्ती।
- पूर्व मंत्र: पाठ से पूर्व “ॐ गण गणपतये नमः” का 21 बार जप।
- पाठ की संख्या: नित्य एक पाठ। संकष्टी या चतुर्थी पर 3, 11, 21 बार। गणेश चतुर्थी के दस दिनों में 108 बार (अनुष्ठान-रूप में)।
- समापन: पाठ के बाद “मंगल मूर्ति मोरया” का घोष; मोदक का भोग; प्रसाद-वितरण।
- विशेष नियम: गणेश-पूजा के समय तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाता (उन्होंने तुलसी से विवाह करने से इनकार किया था — पौराणिक कथा है)।
जाति, लिंग, आयु — कोई बंधन नहीं। बुद्धि के देवता की उपासना सब के लिए खुली है।
महत्व
गणेश चालीसा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है —
जन्म-कथा का संग्रह — यह चालीसा गणेश के जन्म और गज-शीर्ष की प्राप्ति की पूरी कथा को समाहित करती है — पार्वती का तप, विष्णु का वरदान, बालक की उत्पत्ति, शनि की दृष्टि से सिर उड़ना, विष्णु द्वारा गज-शीर्ष लाना, शिव द्वारा प्राण-संचार, और ‘प्रथम-पूज्य’ का वरदान। इस कारण यह चालीसा गणेश-पुराण का संक्षेप है।
बुद्धि-परीक्षा का प्रसंग — चौपाई 17–18 में पृथ्वी-प्रदक्षिणा की कथा — कार्तिकेय मोर पर सवार होकर भ्रमित हो गए; गणेश ने माता-पिता को ही पृथ्वी मानकर उनकी सात प्रदक्षिणाएँ कीं। यह बुद्धि बनाम बल की विजय है — और साथ ही माता-पिता का सम्मान सर्वोपरि का संदेश।
प्रथम-पूज्य का सिद्धांत — हिंदू परंपरा में किसी भी अनुष्ठान का प्रारंभ गणेश से होता है। चौपाई 16 में स्पष्ट है — “प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे।” यह वरदान शिव ने स्वयं दिया था।
विघ्नहर्ता का स्वरूप — गणेश को विघ्नहर्ता (विघ्नों को हरने वाला) कहा जाता है। इसी कारण नए कार्य के आरंभ में, विवाह में, गृह-प्रवेश में, व्यापार-शुभारंभ में — हर शुभ अवसर पर पहले गणेश-पूजा।
ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी — गणेश की दो पत्नियाँ — ऋद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (सफलता) — दार्शनिक रूप से दो शक्तियाँ हैं जो बुद्धि के साथ चलती हैं। गणेश के साथ ऋद्धि-सिद्धि का होना संदेश देता है कि बुद्धि के बिना समृद्धि और सफलता संभव नहीं।
दूर्वा का प्रतीक — गणेश को दूर्वा घास विशेष प्रिय है। दूर्वा एक तृण है जो हर परिस्थिति में जीवित रहती है — यह लचीलेपन और स्थायित्व का प्रतीक है। 21 तृणों का समूह 21 गुणों (विभिन्न पुराणों में अलग-अलग बताए गए) का प्रतीक है।
मूषक-वाहन का प्रतीक — गणेश की मूषक-सवारी का प्रतीकात्मक अर्थ — अहंकार और लोभ (मूषक) पर बुद्धि (गणेश) का नियंत्रण। साथ ही — विशालतम देवता ने सबसे छोटे प्राणी को वाहन चुनकर विनम्रता और समानता का संदेश दिया।
सामान्य प्रश्न
गणेश चालीसा के रचयिता कौन हैं?
पारंपरिक रूप से इसकी रचना रामसुन्दर प्रभुदास से जोड़ी जाती है — चौपाई 22 में “भजत रामसुन्दर प्रभुदासा” से उनके नाम की पहचान होती है। कुछ विद्वान इसे रामसुन्दर प्रभु के दास (अर्थात विष्णु के अनाम भक्त) के रूप में पढ़ते हैं।
गणेश चालीसा कब लिखी गई?
रचना का सटीक काल स्पष्ट नहीं है। कुछ विद्वान इसे विक्रम संवत 1910 (1853 ईस्वी) के आसपास रखते हैं, अन्य इसे 19वीं–20वीं शताब्दी की रचना मानते हैं।
गणेश चालीसा का पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?
बुधवार गणेश का दिन है। गणेश चतुर्थी (भाद्रपद) सबसे बड़ा पर्व है। संकष्टी चतुर्थी (हर माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी) पर पाठ का विशेष महत्व है। दैनिक पाठ के लिए प्रातःकाल श्रेष्ठ है।
गणेश को क्या भोग लगाना चाहिए?
मोदक और लड्डू गणेश को विशेष प्रिय हैं — मोदक का अर्थ है “आनंद देने वाला”। दूर्वा घास के 21 तृण अनिवार्य हैं — दूर्वा गणेश की सर्वश्रेष्ठ भेंट मानी जाती है। लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल), सिंदूर, चंदन, और नारियल भी।
गणेश-पूजा में तुलसी का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता?
पौराणिक कथा के अनुसार तुलसी ने गणेश से विवाह करना चाहा था; गणेश ने ब्रह्मचारी होने के कारण इनकार कर दिया। इस पर तुलसी ने उन्हें श्राप दिया कि वे दो विवाह करेंगे, और गणेश ने तुलसी को विष्णु से विवाह का आशीर्वाद दिया, साथ ही यह कि तुलसी कभी गणेश-पूजा में स्वीकार नहीं की जाएगी। इसी कारण आज भी गणेश को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती।
गणेश का सिर हाथी का क्यों है?
जब शनि की दृष्टि से बालक गणेश का सिर उड़ गया, तब विष्णु तत्काल गरुड़ पर सवार होकर गए और चक्र से एक हाथी का सिर ले आए। शिव ने वह सिर बालक के धड़ पर रखकर मंत्र-शक्ति से प्राण फूँक दिए। तभी से गणेश गज-शीर्ष (हाथी के सिर वाले) कहलाते हैं। यह कथा चालीसा की चौपाई 14–16 में संक्षेप में है।
गणेश “प्रथम-पूज्य” क्यों हैं?
जब शिव ने बुद्धि-परीक्षा के लिए कहा — “पृथ्वी की प्रदक्षिणा करो” — कार्तिकेय मोर पर सवार होकर निकल पड़े, परंतु गणेश ने माता-पिता को ही पृथ्वी मानकर उनकी सात प्रदक्षिणाएँ कीं। शिव प्रसन्न हुए और गणेश को प्रथम-पूज्य (किसी भी अनुष्ठान से पहले पूजा जाने वाला) का वरदान दिया।
“ऋद्धि-सिद्धि” कौन हैं?
ऋद्धि = समृद्धि (भौतिक धन-संपदा); सिद्धि = सफलता (कार्य-पूर्ति)। ये गणेश की दो पत्नियाँ हैं — दार्शनिक रूप से बुद्धि के साथ चलने वाली दो शक्तियाँ। संदेश यह है कि समृद्धि और सफलता बुद्धि के साथ ही प्राप्त होती हैं।