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जय गणेश जय गणेश आरती

By पारंपरिक (कवि-नाम 'सूर' से अंकित)मध्यकालीन भक्ति कालब्रज भाषा

7 min readLast reviewed April 28, 2026

मूल पाठ

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी।
माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जय बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

अर्थ

“जय गणेश जय गणेश” आरती गणपति बप्पा को समर्पित सबसे प्रचलित आरती है। इसमें टेक के साथ चार छंद हैं — गणेश का स्वरूप, उन्हें चढ़ाई जाने वाली भेंट, उनकी उदारता, और अंत में दीनों की रक्षा की प्रार्थना।

टेक — “जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा”

प्रत्येक छंद के बाद दोहराई जाने वाली यह पंक्ति गणेश के जयघोष के साथ उनके परिवार-परिचय को प्रस्तुत करती है — “जिनकी माता पार्वती और पिता महादेव (शिव) हैं।” यह उल्लेख महत्वपूर्ण है, क्योंकि गणेश का गौरव उनके वंश से अधिक उनके अपने गुणों से है, परंतु इस पंक्ति में परिवार-स्मरण से भक्त को गणेश के साथ शिव-पार्वती का भी आशीर्वाद मिलता है।

छंद 1 — रूप-वर्णन

“एकदन्त (एक दाँत वाले), दयावन्त (दयालु), चार भुजाओं वाले; माथे पर सिंदूर सजा है, और सवारी मूषक (चूहा) है।” यह गणेश का आइकॉनोग्राफिक (स्वरूप-संबंधी) वर्णन है — एक दाँत महाभारत-लेखन की कथा से जुड़ा है (गणेश ने अपना दाँत तोड़कर लिखने की कलम बनाई), चार भुजाएँ शक्ति-पूर्णता का प्रतीक हैं, मूषक उनकी विनम्रता का प्रतीक है (छोटे से वाहन पर विशाल देवता)।

छंद 2 — भक्ति का अर्पण

“पान चढ़े, फूल चढ़े, और मेवा चढ़े; लड्डुओं का भोग लगे, संत आपकी सेवा करते हैं।” गणेश को विशेष रूप से मोदक और लड्डू प्रिय हैं — यह छंद उनके भोग-वर्णन से उन भक्तों को आश्वस्त करता है जो साधारण भेंट चढ़ाते हैं — पान, फूल, मेवा। भगवान को केवल भाव चाहिए

छंद 3 — उदारता

“अंधों को आँखें देते हैं, कोढ़ियों को (नवीन) शरीर देते हैं; बाँझ स्त्रियों को पुत्र देते हैं, निर्धनों को धन देते हैं।” यहाँ गणेश की कृपा का सर्वव्यापी विस्तार दिखाया गया है — शारीरिक रोग से लेकर आर्थिक संकट तक, हर बाधा को मिटाने वाले गणेश ही विघ्नहर्ता हैं। अंतिम पंक्ति — “‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा” — कवि-हस्ताक्षर है, जिसमें “सूर” से तात्पर्य भक्तकवि सूरदास से माना जाता है।

छंद 4 — दीन-रक्षा की प्रार्थना

“शंभु (शिव) के पुत्र, दीनों की लाज रखो; कामनाओं को पूर्ण करो — जय हो, मैं आप पर बलिहारी।” अंतिम छंद शरणागति और बलिदान-भाव को व्यक्त करता है। बलिहारी शब्द का अर्थ है — मैं आप पर न्योछावर हूँ।

इतिहास

“जय गणेश जय गणेश” आरती की रचना पारंपरिक रूप से भक्तकवि सूरदास (लगभग 1478–1583 ई.) से जोड़ी जाती है — आरती के तीसरे छंद में आने वाला “सूर” शब्द उनकी भणिता (कवि-हस्ताक्षर) माना जाता है। हालाँकि सभी विद्वान इस श्रेय से सहमत नहीं हैं; कुछ इसे एक अनाम भक्त-कवि की रचना मानते हैं जिसने सूरदास के नाम का प्रयोग किया, जो भक्तिकाल में सामान्य था।

आरती की भाषा ब्रज भाषा के तत्व लिए हुए है — मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र की मध्यकालीन बोली, जो भक्ति-काव्य की प्रिय भाषा थी। “माता जाकी पार्वती”, “पान चढ़े”, “मूस की सवारी” — ये पंक्तियाँ ब्रज की संरचना और लय दोनों को दर्शाती हैं।

जो भी इसकी रचयिता हों, यह आरती हर हिंदू पूजा के आरंभ में गाई जाती है — यह परंपरा गणेश के प्रथम-पूज्य होने पर आधारित है। शिव-पुराण के अनुसार स्वयं शिव ने गणेश को यह वरदान दिया था कि किसी भी देवता की पूजा से पूर्व उनकी पूजा होगी; इसी कारण विवाह से लेकर गृहप्रवेश तक, और बच्चे के पहले अक्षर-लेखन से लेकर व्यापार के नए शुभारंभ तक — हर शुभ कार्य गणेश-वंदना से प्रारंभ होता है, और यह आरती इस वंदना का सबसे प्रिय रूप है।

पाठ विधि

“जय गणेश” आरती गाने की पारंपरिक विधि इस प्रकार है —

  • समय: किसी भी पूजा के प्रारंभ में (गणेश प्रथम-पूज्य हैं), विशेष रूप से बुधवार को (गणेश का दिन)। गणेश चतुर्थी के दस दिनों में दिन में अनेक बार। प्रातः और सायं की पूजा में नित्य पाठ।
  • थाली: दीपक (गाय के घी का), पान, फूल (विशेषकर लाल), दूर्वा (दूर्वा घास — गणेश को अत्यंत प्रिय), मोदक या लड्डू, सिंदूर, अक्षत
  • दिशा: गणेश की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख, थाली को दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाते हुए।
  • गायन: सब उपस्थित जन एक स्वर में, ताली के साथ। शंख, घंटी, मंजीरों के साथ गाई जा सकती है।
  • विशेष प्रथाएँ: गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने दूर्वा घास के 21 तृण चढ़ाने की परंपरा है। मोदक का भोग अनिवार्य है — यदि उपलब्ध न हो, तो गुड़ या लड्डू।
  • समापन: आरती के पश्चात “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का 11 या 21 बार जप, फिर “मंगल मूर्ति मोरया” का घोष।

जाति, आयु, लिंग — कोई बंधन नहीं। बच्चे विशेष रूप से इस आरती को सीखते हैं, क्योंकि गणेश बुद्धि के देवता हैं।

महत्व

“जय गणेश जय गणेश” आरती के कई स्तर हैं —

प्रथम-पूज्य की वंदना — हिंदू परंपरा में किसी भी अनुष्ठान का प्रारंभ गणेश से होता है — “श्री गणेशाय नमः”। यह आरती उसी सिद्धांत का गायन-रूप है। विघ्नहर्ता (विघ्नों को हरने वाला) कहलाने वाले गणेश से प्रार्थना यह है कि वे आगे की पूजा या किसी भी कार्य में बाधा न आने दें।

बच्चों की पहली आरती — सरल भाषा, छोटे पद, और याद रखने योग्य लय — यही कारण है कि उत्तर भारत के अधिकांश हिंदू बच्चे यही आरती सबसे पहले सीखते हैं। बुद्धि के देवता की प्रथम स्तुति बच्चे की शिक्षा-यात्रा का प्रतीकात्मक प्रारंभ है।

सर्व-कामना-पूर्ति — आरती के तीसरे छंद का एक-एक उदाहरण — अंधों को नेत्र, कोढ़ियों को काया, बाँझ स्त्रियों को पुत्र, निर्धनों को धन — गणेश की उदारता के सर्वोपरि विस्तार को दर्शाता है। चाहे शारीरिक हो या आर्थिक, हर बाधा को मिटाने का आश्वासन।

लड्डू-भोग का प्रतीक — गणेश को मोदक और लड्डू विशेष प्रिय हैं — मोदक का अर्थ है “आनंद देने वाला”। आरती में लड्डू-भोग का उल्लेख इस सिद्धांत को व्यक्त करता है कि भक्त की भेंट उसके भाव से तय होती है, उसकी मात्रा से नहीं।

मूषक की शिक्षा — गणेश की मूषक-सवारी का प्रतीकात्मक अर्थ गहरा है — विशालतम देवता ने सबसे छोटे प्राणी को अपना वाहन चुना। यह विनम्रता और सबकी समानता का संदेश है। साथ ही, मूषक अहंकार और लोभ का भी प्रतीक माना जाता है — गणेश के नीचे होने का अर्थ है कि बुद्धि (गणेश) ने अहंकार (मूषक) को नियंत्रण में रखा है।

सामान्य प्रश्न

“जय गणेश जय गणेश” आरती किसने लिखी थी?

पारंपरिक रूप से इसकी रचना भक्तकवि सूरदास से जोड़ी जाती है — आरती के तीसरे छंद में आने वाला “सूर” शब्द उनकी भणिता (कवि-हस्ताक्षर) माना जाता है। हालाँकि कुछ विद्वान इसे एक अनाम भक्त-कवि की रचना मानते हैं।

यह आरती किस अवसर पर गानी चाहिए?

यह आरती हर पूजा के प्रारंभ में गाई जाती है, क्योंकि गणेश प्रथम-पूज्य हैं। विशेष रूप से बुधवार को (गणेश का दिन) और गणेश चतुर्थी के पर्व पर। नए कार्य के शुभारंभ से पहले — विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार-आरंभ — इसका विशेष महत्व है।

गणेश को क्या भोग लगाना चाहिए?

गणेश को मोदक और लड्डू विशेष प्रिय हैं। इसके अतिरिक्त दूर्वा घास (21 तृण), लाल पुष्प, सिंदूर, और मेवा। गुड़ भी चढ़ाया जा सकता है। आरती में स्वयं उल्लेख है — “लड्डुअन का भोग लगे।”

“एकदन्त” का क्या अर्थ है?

“एकदन्त” अर्थात् एक दाँत वाले। पुराणों के अनुसार महाभारत लिखते समय गणेश की कलम टूट गई, तब उन्होंने अपना एक दाँत तोड़कर उससे लेखन जारी रखा। यह उनके समर्पण और विद्वत्ता का प्रतीक है।

गणेश का वाहन मूषक (चूहा) क्यों है?

मूषक विनम्रता, समानता, और बुद्धि-नियंत्रण का प्रतीक है। विशालतम देवता ने सबसे छोटे प्राणी को वाहन चुनकर यह संदेश दिया कि कोई भी प्राणी छोटा या तुच्छ नहीं। साथ ही, मूषक अहंकार और लोभ का भी प्रतीक है — गणेश के नीचे होने का अर्थ है कि बुद्धि ने अहंकार को नियंत्रण में रखा है।

क्या यह आरती बच्चों के लिए उपयुक्त है?

हाँ, यह आरती बच्चों के लिए सर्वोत्तम है। सरल भाषा, छोटी पंक्तियाँ, और याद रखने योग्य लय के कारण यह बच्चों की पहली आरती मानी जाती है। बच्चे की शिक्षा-यात्रा (अक्षर-आरंभ) से पहले गणेश की वंदना की परंपरा है।

“मंगल मूर्ति मोरया” का क्या अर्थ है?

“मंगल मूर्ति” = शुभता का स्वरूप; “मोरया” = एक 14वीं शताब्दी के संत मोरया गोसावी का नाम, जो गणेश के परम भक्त थे। महाराष्ट्र में आरती के बाद यह घोष लगाने की परंपरा है — संत मोरया गोसावी के सम्मान में, जिनकी भक्ति को गणेश ने स्वयं स्वीकार किया था।