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आरती कुंजबिहारी की

By श्री श्रीधर शर्मा (परंपरागत)20वीं शताब्दी का प्रारंभिक कालखड़ी बोली–व्रज मिश्रित

5 min readLast reviewed May 2, 2026

मूल पाठ

आरती कुंजबिहारी की।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

गले में बैजन्ती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला॥

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥

आरती कुंजबिहारी की।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दर्शन को तरसै।
गगन सों सुमन रासि बरसै,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की॥

आरती कुंजबिहारी की।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

जहाँ ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी शिव शीश, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्री बनवारी की॥

आरती कुंजबिहारी की।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृन्दावन बेनू।
चहुँ दिशि गोपी ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की॥

आरती कुंजबिहारी की।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

अर्थ

यह आरती श्री कृष्ण के उस मनोहर रूप का चित्रण है जिसमें वे वृन्दावन के निकुंजों में लीला करते हैं। ‘कुंजबिहारी’ का अर्थ है — कुंजों (लता-मंडपों) में विहार करने वाले। ‘गिरिधर’ का अर्थ है — गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले, और ‘मुरारी’ — मुर नामक दैत्य का नाश करने वाले।

पहले छंद में बालकृष्ण के बाह्य स्वरूप का वर्णन है — गले में बैजन्ती (पंच रंगों की वैजयंती) माला, हाथ में मुरली, कानों में चमकते कुंडल, और नंद के घर का वह आनंद जिसे नंदलाला कहा गया।

दूसरे छंद में राधा-कृष्ण की युगल छवि है। आकाश के समान श्याम वर्ण के कृष्ण और उनके निकट चमकती राधिका। काले भ्रमर जैसी लटें, माथे पर कस्तूरी का तिलक, और चंद्रमा सी मुख-कांति।

तीसरे छंद में कृष्ण के मस्तक पर सोने का मोर मुकुट है, देवता उनके दर्शन को तरसते हैं, आकाश से पुष्प वर्षा होती है, और मुरचंग-मृदंग के संग गोप-गोपिकाएं नृत्य करती हैं।

चौथे छंद में कृष्ण के चरणों से गंगा जी का प्रकट होना स्मरण कराया गया है — वही गंगा जो शिव की जटाओं में बसती हैं और जिनके स्मरण से मोह नष्ट होता है।

पाँचवें छंद में वृन्दावन के तट की रेणु, बंसी की मधुर ध्वनि, चारों ओर गोपियाँ-ग्वाल-गाएँ, और दीन-दुखियों की पुकार सुनकर भव बंधन काटने वाले कृष्ण का स्मरण है।

इतिहास

‘आरती कुंजबिहारी की’ की रचना का श्रेय परंपरागत रूप से श्री श्रीधर शर्मा को दिया जाता है, जो वृन्दावन के निकुंजवासी संत थे। यह आरती 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में लिखी गई और शीघ्र ही उत्तर भारत के वैष्णव मंदिरों में संध्या-आरती का अंग बन गई।

रचना की शैली खड़ी बोली में है, परंतु इसमें व्रज भाषा का माधुर्य यथा-स्थान आता है (‘बजावै’, ‘झलकाला’, ‘चहुँ दिशि’)। प्रत्येक पद के तीन भीतरी तुक — ‘भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक’ — गायन में लयात्मक प्रवाह उत्पन्न करते हैं, जो इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता है।

बाँके बिहारी मंदिर वृन्दावन, इस्कॉन के विश्वव्यापी मंदिरों, तथा अधिकांश राधा-कृष्ण मंदिरों में यह आरती जन्माष्टमी, होली, और दैनिक संध्या-सेवा में गाई जाती है।

आरती गायन विधि

कब करें

  • दैनिक संध्या आरती — सूर्यास्त के पश्चात गोधूली बेला में
  • जन्माष्टमी की रात्रि — अष्टमी की मध्यरात्रि कृष्ण जन्म के समय
  • होली, राधाष्टमी, गोपाष्टमी आदि कृष्ण से जुड़े पर्वों पर
  • एकादशी के दिन तुलसी पूजा के पश्चात

कैसे करें

  1. स्थान शुद्धि — पूजा स्थल को स्वच्छ कर श्री कृष्ण की प्रतिमा/चित्र के सम्मुख आसन ग्रहण करें।
  2. दीप प्रज्वलन — पाँच या सात बातियों वाला घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  3. धूप-नैवेद्य — धूप, पुष्प (विशेषकर तुलसी पत्र), तथा माखन-मिश्री का भोग अर्पण करें।
  4. आरती गायन — दीपक को दाहिने हाथ से दाएँ से बाएँ (clockwise) पाँच बार घुमाते हुए आरती गाएँ। घंटी या ताली के साथ ताल मिलाएँ।
  5. पुष्पांजलि एवं प्रदक्षिणा — आरती के पश्चात पुष्प चढ़ाएँ और तीन बार परिक्रमा करें।
  6. चरणामृत-प्रसाद — अंत में सबको चरणामृत और प्रसाद वितरित करें।

वाद्य संगति

पारंपरिक रूप से इस आरती के साथ मृदंग, मंजीरा, हारमोनियम, और शंख का प्रयोग होता है। घर पर केवल घंटी और ताली से भी की जा सकती है।

महत्व

  • दैनिक संध्या-आराधना का सरल माध्यम — मात्र पाँच मिनट में पूरी हो जाती है, परिवार सहित गाई जा सकती है।
  • बाल-स्वरूप का स्मरण — कृष्ण के बाल-किशोर रूप की छवि मन में अंकित होती है, जो भक्ति का सुगम प्रवेश-द्वार है।
  • राधा-कृष्ण युगल का दर्शन — गौड़ीय वैष्णव परंपरा में युगल भाव का संक्षिप्त एवं सरस वर्णन।
  • लय-प्रधान रचना — तीन-तुक वाली आंतरिक लय के कारण बच्चे भी सहज ही याद कर लेते हैं।
  • मोक्ष-प्रदायिनी — चौथे छंद में स्पष्ट है कि कृष्ण के चरणों के स्मरण मात्र से मोह और भव-बंधन कट जाते हैं।

सामान्य प्रश्न

क्या यह आरती केवल वृन्दावन में ही गाई जाती है?

नहीं। यह आरती अब विश्व भर के राधा-कृष्ण मंदिरों, इस्कॉन केंद्रों, तथा हिन्दू घरों में गाई जाती है। वृन्दावन में इसका जन्म अवश्य हुआ था, परंतु आज यह सार्वभौमिक है।

‘कुंजबिहारी’ और ‘बाँके बिहारी’ में क्या अंतर है?

दोनों कृष्ण के ही नाम हैं। ‘कुंजबिहारी’ अर्थात् कुंजों में विहार करने वाले — सामान्य नाम। ‘बाँके बिहारी’ विशेष रूप से वृन्दावन के बाँके बिहारी मंदिर के विग्रह का नाम है, जिसकी स्थापना स्वामी हरिदास ने की थी।

क्या स्त्रियाँ रजस्वला अवस्था में यह आरती गा सकती हैं?

शास्त्रों में परंपरागत मत भिन्न-भिन्न हैं, परंतु आधुनिक अधिकांश आचार्यों का मानना है कि कृष्ण-भक्ति में मानसिक स्मरण और गायन सदैव संभव है। केवल स्पर्श-पूजा का परिहार पर्याप्त है।

आरती के समय दीपक कितनी बार घुमाएं?

पारंपरिक विधि में दीपक को सात बार घुमाया जाता है — चार बार पैरों के समीप, दो बार नाभि के समीप, और एक बार मुख के समीप। संक्षिप्त विधि में पाँच बार पर्याप्त है।

क्या इस आरती के साथ कोई अन्य आरती भी गाई जाती है?

हाँ। पूर्ण संध्या-आरती क्रम में पहले ‘श्री राधे गोविन्द’ स्तुति, फिर ‘आरती कुंजबिहारी की’, और अंत में ‘जय जगदीश हरे’ (सामान्य आरती) गाई जाती है।

बच्चों को यह आरती कैसे सिखाएँ?

प्रथम पंक्ति ‘आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की’ को बार-बार दोहराकर शुरू करें। यही टेक है और यही सबसे सुगम है। शेष छंद धीरे-धीरे एक-एक करके सिखाएँ।