अम्बे गौरी आरती
By स्वामी शिवानंद (पारंपरिक रचना)मध्यकालीन भक्ति-कालहिंदी (खड़ी बोली, ब्रज तत्वों के साथ)
मूल पाठ
जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री॥
मांग सिंदूर विराजत टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना चंद्रबदन नीको॥
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै॥
केहरि वाहन राजत खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर मुनिजन सेवत तिनके दुःखहारी॥
कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर राजत समज्योति॥
शुम्भ निशुम्भ बिदारे महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी।
आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥
चौंसठ योगिनि मंगल गावैं नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दु:ख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥
भुजा चार अति शोभित खड्ग खप्परधारी।
मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी॥
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत कोटि रतन ज्योति॥
श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी सुख-सम्पत्ति पावै॥
अर्थ
“जय अम्बे गौरी” आरती माँ दुर्गा को उनके सर्व-कल्याणकारी रूप अम्बा और गौरी के रूप में संबोधित करती है। आरती में 13 छंद हैं — माँ का स्वरूप-वर्णन, उनके पराक्रम (विशेषकर असुर-संहार), उनकी सर्वोच्च सत्ता, और भक्त को मिलने वाला फल — सभी क्रमशः वर्णित हैं।
टेक — “जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी”
प्रथम पंक्ति में देवी को अम्बा (माता) और गौरी (शुद्ध, पार्वती के रूप में) तथा श्यामा (कृष्णवर्णा, काली के रूप में) — तीनों रूपों में एक साथ नमस्कार है। “तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री” — हरि (विष्णु), ब्रह्मा और शिव — त्रिमूर्ति भी दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।
छंद 1 — मुखमंडल
“मांग में सिंदूर विराजमान है, मृगमद (कस्तूरी) का तिलक है; दोनों नेत्र उज्ज्वल हैं, चंद्र-समान सुंदर मुख है।” यहाँ माँ का सौम्य (शांत) रूप वर्णित है — सुहागिन के प्रतीक मांग-सिंदूर के साथ।
छंद 2 — शरीर और वस्त्र
“शरीर स्वर्ण के समान है, रक्त-वस्त्र (लाल साड़ी) सुशोभित है; गले में लाल पुष्पों की माला सजी है।” रक्तवर्ण शक्ति का प्रतीक है — रजोगुण और पराक्रम का रंग।
छंद 3 — वाहन और शस्त्र
“सिंह वाहन पर सुशोभित, खड्ग और खप्पर धारण किए हैं; देवता, मनुष्य, और मुनि उनकी सेवा करते हैं — वे सबके दुःख-हारी हैं।” केहरि = सिंह; खप्पर = कपालपात्र (खोपड़ी का पात्र, जिसमें असुरों का रक्त भरा होता है)। यह माँ का रौद्र (उग्र) रूप है।
छंद 4 — आभूषण
“कानों में कुंडल, नाक के अग्रभाग पर मोती; करोड़ों चंद्र और सूर्य की तेज-समान ज्योति विराजमान है।” कोटिक चंद्र दिवाकर — माँ का तेज चंद्र-सूर्य से अनेक गुना है।
छंद 5 — असुर-संहार
“शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया, महिषासुर का वध किया; धूम्रलोचन के नेत्र भी दिन-रात मदमाते थे।” यह छंद देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण) की कथाओं का संक्षिप्त उल्लेख है।
छंद 6 — और अधिक राक्षस-संहार
“चण्ड-मुण्ड का संहार किया, रक्तबीज का नाश किया; मधु-कैटभ दोनों को मारा, देवताओं को निर्भय बनाया।” रक्तबीज — जिसके रक्त की हर बूँद से एक नया राक्षस उत्पन्न होता था; देवी ने उसे मारने के लिए अपनी चामुण्डा शक्ति को उतारा।
छंद 7 — सर्वोच्च सत्ता
“आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी, और कमला (लक्ष्मी) रानी हैं; आगम और निगम (शास्त्र) आपका वर्णन करते हैं — आप शिव की पटरानी हैं।” त्रिदेवियों — सरस्वती (ब्रह्माणी), पार्वती (रुद्राणी), लक्ष्मी (कमला) — सब माँ का ही रूप हैं।
छंद 8 — साथी और संगीत
“चौंसठ योगिनियाँ मंगल गाती हैं, भैरव नृत्य करते हैं; ताल, मृदंग और डमरू बजते हैं।” यह माँ के दरबार का वर्णन है — योगिनियों, भैरव, और दिव्य संगीत के साथ।
छंद 9 — माता और भर्ता
“आप ही जगत की माता हैं, और आप ही भर्ता (पालनहार); भक्तों के दुःख हरने वाली, सुख-सम्पत्ति देने वाली।” माता-भर्ता दोनों भूमिकाएँ माँ में एक साथ हैं।
छंद 10 — चार भुजाएँ
“चार भुजाओं वाली, खड्ग और खप्पर धारण की हुई; जो नर-नारी सेवा करते हैं, उन्हें मनवांछित फल मिलता है।”
छंद 11 — आरती-थाली
“कंचन (स्वर्ण) की थाली में अगर-कपूर की बत्ती जल रही है; मालकेतु (शायद माँ का धाम/पर्वत) में करोड़ों रत्नों की ज्योति शोभित है।”
छंद 12 — अंतिम वचन
“जो भी मनुष्य अम्बे की आरती गाता है, वह सुख-सम्पत्ति प्राप्त करता है — ऐसा शिवानंद स्वामी कहते हैं।” यहाँ कवि-हस्ताक्षर है — शिवानंद स्वामी।
इतिहास
“जय अम्बे गौरी” आरती की रचना पारंपरिक रूप से स्वामी शिवानंद से जोड़ी जाती है — आरती की अंतिम पंक्ति “कहत शिवानंद स्वामी” में उनकी भणिता (कवि-हस्ताक्षर) मानी जाती है। यह कौन से शिवानंद हैं — इस पर मत-भेद हैं; कुछ इसे मध्यकाल के किसी अनाम संत की रचना मानते हैं, तो कुछ इसे 19वीं-20वीं शताब्दी के किसी संत से जोड़ते हैं।
आरती की भाषा खड़ी बोली और ब्रज भाषा दोनों के तत्व लिए हुए है — “जो कोई नर गावै”, “बाजत डमरू” जैसे प्रयोग ब्रज की लय हैं, जबकि “सुख सम्पत्ति”, “दुःख हरता” खड़ी बोली के हैं।
आरती की विशेष बात यह है कि यह देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण की दुर्गा-कथा) की प्रमुख घटनाओं — महिषासुर-वध, शुम्भ-निशुम्भ-वध, रक्तबीज-संहार, मधु-कैटभ-संहार — को एक ही आरती में समेट लेती है। इस कारण यह स्वयं एक संक्षिप्त पुराण-पाठ के समान है।
यह आरती नवरात्रि के नौ दिनों, दुर्गा-पूजा के अनुष्ठानों, और किसी भी देवी-मंदिर की दैनिक पूजा में निरंतर गाई जाती है। बंगाल की दुर्गा पूजा से लेकर वैष्णो देवी और कामाख्या जैसे शक्ति-पीठों तक — यह आरती सर्वव्यापी है।
गायन विधि
अम्बे गौरी आरती के पारंपरिक गायन के लिए विधि —
- समय: नवरात्रि के नौ दिनों में दिन में दो बार (प्रातः-सायं), दुर्गाष्टमी और विजयादशमी पर अनिवार्यतः। नित्य पूजा में मंगलवार और शुक्रवार को विशेष रूप से। प्रत्येक देवी-पूजा का समापन इसी आरती से होता है।
- थाली: कंचन (स्वर्ण) या ताम्र की थाली में पंच-दीप (पाँच बत्ती वाला दीपक — गाय के घी का), अगर, कपूर, लाल पुष्प, लाल चुनरी, अक्षत, सिंदूर, नैवेद्य (विशेष भोग — खीर, हलवा, या फल)। आरती-थाली में मालकेतु (माँ का धाम/शक्ति-पीठ) के प्रति समर्पण-भाव है।
- दिशा: माँ की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख, थाली को दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाते हुए। उच्चारण के साथ शंख-घंटी की ध्वनि।
- गायन: सब उपस्थित जन एक स्वर में, ताली के साथ। डमरू, मंजीरा, ढोलक, और शंख के साथ गाई जाती है।
- विशेष प्रथाएँ: नवरात्रि में आरती से पूर्व दुर्गा सप्तशती के पाठ की परंपरा है। आरती के पश्चात कन्या-पूजन (कन्या-भोज) किया जाता है।
- समापन: आरती के पश्चात “या देवी सर्वभूतेषु” मंत्र का जप, फिर “जय माता दी” का घोष।
जाति, लिंग, आयु — कोई बंधन नहीं। बंगाल और महाराष्ट्र की परंपरा में स्त्रियाँ ही प्रायः आरती-गायन की अगुवाई करती हैं।
महत्व
“जय अम्बे गौरी” आरती शक्ति-संप्रदाय (शाक्त परंपरा) की केंद्रीय रचना है —
त्रिदेवी का संगम — आरती का “ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी” छंद यह घोषित करता है कि सरस्वती (ब्रह्मा की शक्ति), पार्वती (शिव की शक्ति), और लक्ष्मी (विष्णु की शक्ति) — सभी माँ दुर्गा का ही रूप हैं। यह आदि-शक्ति के सिद्धांत का स्पष्ट प्रतिपादन है।
सौम्य और रौद्र दोनों रूप — आरती में माँ का सौम्य रूप — मांग-सिंदूर, चंद्रमुख, स्वर्ण-वर्ण; और रौद्र रूप — सिंह-सवारी, खड्ग-खप्पर, असुर-संहार — दोनों एक साथ प्रस्तुत हैं। यह अम्बा (पालिका माता) और चण्डी (संहारिका) की एकता है।
देवी महात्म्य का संक्षेप — महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज, धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, मधु-कैटभ — ये सब देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण) के असुर हैं। एक ही आरती में इन सब का उल्लेख इसे पुराण-संक्षेप बना देता है।
नवरात्रि का केंद्र — नवरात्रि के नौ दिन माँ के नौ रूपों — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री — को समर्पित हैं। इस आरती में इन सब रूपों का सार समाहित है।
सिंह वाहन का प्रतीक — माँ का सिंह-वाहन शक्ति, साहस, और निर्भयता का प्रतीक है। माँ ने सबसे शक्तिशाली पशु को अपना वाहन चुना — यह संदेश है कि भक्त को भी जीवन के संग्राम में निर्भय और शक्तिशाली होना चाहिए।
सर्वजनीय भक्ति — आरती के अंतिम छंद में स्पष्ट है — “जो कोई नर गावै, सुख-सम्पत्ति पावै।” यहाँ कोई भेद नहीं — नर-नारी, बालक-वृद्ध, साधु-गृहस्थ — सब एक समान।
सामान्य प्रश्न
अम्बे गौरी आरती किसने लिखी थी?
पारंपरिक रूप से इसकी रचना स्वामी शिवानंद से जोड़ी जाती है — आरती की अंतिम पंक्ति में “कहत शिवानंद स्वामी” उनकी भणिता (कवि-हस्ताक्षर) मानी जाती है। हालाँकि कुछ विद्वान इसे एक अनाम मध्यकालीन संत की रचना मानते हैं।
“अम्बे” और “गौरी” का क्या अर्थ है?
अम्बे = माता (माँ); गौरी = शुद्ध, श्वेत-वर्णा, पार्वती का एक नाम। श्यामा = कृष्णवर्णा, काली का एक नाम। आरती में माँ को इन तीनों रूपों में एक साथ संबोधित किया गया है — सौम्य गौरी और रौद्र काली — दोनों एक हैं।
यह आरती कब गानी चाहिए?
नवरात्रि के नौ दिनों में नित्य प्रातः-सायं, दुर्गाष्टमी और विजयादशमी पर अनिवार्य रूप से। नित्य पूजा में मंगलवार और शुक्रवार माँ के दिन माने जाते हैं। प्रत्येक देवी-पूजा का समापन इसी आरती से होता है।
आरती में माँ ने किन-किन असुरों का संहार किया?
आरती में निम्न असुरों का उल्लेख है — महिषासुर (भैंस-राक्षस), शुम्भ-निशुम्भ (दो भाई), रक्तबीज (जिसके रक्त से नए राक्षस जन्मते थे), धूम्रलोचन (शुम्भ का सेनापति), चण्ड-मुण्ड (दो असुर — चामुण्डा शक्ति का जन्म इन्हीं के वध से), और मधु-कैटभ (विष्णु के निद्रा-काल में उत्पन्न प्रथम असुर)। ये सब देवी महात्म्य की कथाओं के पात्र हैं।
“खप्पर” क्या है?
खप्पर = कपालपात्र, अर्थात् मानव खोपड़ी का पात्र। माँ काली और चण्डी के रूप में इसे धारण करती हैं — असुरों का रक्त इसमें पीने का प्रतीक। यह रौद्र शक्ति और अधर्म के अंत का प्रतीक है।
क्या यह आरती केवल नवरात्रि में गानी चाहिए?
नहीं, यह आरती किसी भी देवी-पूजा के समापन पर गाई जा सकती है — चाहे नित्य पूजा हो या किसी विशेष अवसर की। नवरात्रि और दुर्गाष्टमी पर इसका विशेष महत्व है, परंतु मंगलवार और शुक्रवार को भी इसका नित्य पाठ शुभ माना जाता है।
“ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला” से क्या अर्थ है?
ये त्रिदेवी के नाम हैं — ब्रह्माणी = ब्रह्मा की शक्ति, अर्थात् सरस्वती (ज्ञान); रुद्राणी = रुद्र (शिव) की शक्ति, अर्थात् पार्वती (तप); कमला = कमल पर विराजमान, अर्थात् लक्ष्मी (वैभव)। आरती की यह पंक्ति घोषित करती है कि माँ दुर्गा सभी देवियों का मूल — आदि-शक्ति — हैं।