Divyam

ॐ जय लक्ष्मी माता

By पं. शिवानन्द (पारंपरिक)१९वीं–२०वीं शताब्दीखड़ी बोली

5 min readLast reviewed May 2, 2026

मूल पाठ

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

दुर्गा रूप निरंजनि, सुख-सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भव निधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

जिस घर में तुम रहती, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहिं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥

अर्थ

यह आरती माँ लक्ष्मी के अनेक रूपों, गुणों, और कृपाओं का संक्षिप्त चित्रण है। इसकी संरचना सरल है — आठ अंतरे, और प्रत्येक के अंत में टेक ‘ॐ जय लक्ष्मी माता’ की पुनरावृत्ति।

टेक — हे लक्ष्मी माता, तुम्हारी जय हो! दिन-रात तुम्हारी सेवा शिव, विष्णु, और ब्रह्मा (तीनों देव-शिखर) करते हैं।

अंतरा १ (उमा-रमा-ब्रह्माणी) — तुम ही उमा (पार्वती), रमा (लक्ष्मी), और ब्रह्माणी (सरस्वती) — तीनों देवियों की शक्ति हो। सूर्य-चन्द्रमा तुम्हारा ध्यान करते हैं; नारद मुनि तुम्हारी कीर्ति गाते हैं।

अंतरा २ (दुर्गा रूप) — तुम ही दुर्गा हो, निरंजन (निर्मल) रूप, सुख और सम्पत्ति की दात्री। जो भी तुम्हारा ध्यान करता है — उसे ऋद्धि, सिद्धि, और धन — तीनों मिलते हैं।

अंतरा ३ (पाताल-निवासिनि) — तुम पाताल लोक में निवास करती हो (शेषनाग के साथ विष्णु-सहचारिणी रूप में), तुम ही शुभदाता हो। कर्मों के प्रभाव की प्रकाशिका, भव-निधि (संसार-सागर) से तारने वाली।

अंतरा ४ (गृह-वैभव) — जिस घर में तुम रहती हो, वहाँ सब सद्गुण आते हैं। सब कार्य संभव हो जाते हैं, मन कहीं नहीं घबराता।

अंतरा ५ (यज्ञ की प्रेरक) — तुम बिन यज्ञ अधूरे, वस्त्र अनुपलब्ध, खान-पान का सब वैभव तुमसे ही प्राप्त है।

अंतरा ६ (क्षीरोदधि-जाता) — तुम शुभ गुणों का सुंदर मंदिर हो, क्षीर सागर से उत्पन्न (समुद्र मंथन से प्रकट)। तुम बिन समुद्र मंथन के चौदह रत्न (Chaurdah Ratna) कोई न पाता।

अंतरा ७ (फलश्रुति) — महालक्ष्मी की यह आरती जो भी मनुष्य गाता है, उसके हृदय में आनन्द समा जाता है, और सब पाप उतर जाते हैं।

इतिहास

‘ॐ जय लक्ष्मी माता’ की रचना का श्रेय पं. शिवानन्द जी को दिया जाता है, जिन्होंने १९वीं-२०वीं शताब्दी के मोड़ पर इसे लिखा। यह उसी आरती-शैली की रचना है जिसमें पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने ‘ॐ जय जगदीश हरे’ (१८७० के दशक में) लिखी थी। दोनों आरतियाँ एक ही धुन में गाई जाती हैं — और यह संयोग नहीं, परंपरा है।

‘जगदीश हरे’ की धुन हिन्दी क्षेत्र की अत्यंत लोकप्रिय आरती-धुन बन गई। २०वीं शताब्दी में इसी धुन पर अनेक देवी-देवताओं की आरतियाँ रची गईं — दुर्गा, सरस्वती, गणेश, हनुमान, और लक्ष्मी की भी।

लक्ष्मी की पारंपरिक आरतियों में यह सर्वाधिक गाई जाने वाली है। दीपावली रात्रि-पूजन, धनतेरस, शुक्रवार-व्रत, और गृह-प्रवेश — सभी अवसरों पर इसी आरती का गायन होता है। उत्तर भारत के प्रत्येक हिन्दू घर में यह आरती सुनी जा सकती है।

आरती गायन विधि

कब करें

  • दीपावली रात्रि — मुख्य पूजन के समापन पर
  • धनतेरस — कुबेर-लक्ष्मी पूजन के पश्चात
  • शुक्रवार सायंकाल — साप्ताहिक लक्ष्मी पूजन
  • दैनिक संध्या आरती — परिवार सहित संक्षिप्त पूजन
  • गृह-प्रवेश एवं व्यापार-शुभारंभ के अवसरों पर

कैसे करें

  1. पूजा-समापन के समय आरती गाई जाती है — अर्थात् लक्ष्मी चालीसा/स्तोत्र पाठ के बाद।
  2. थाली में पाँच या सात बातियों का घी का दीपक, धूप, पुष्प, चंदन, और कपूर रखें।
  3. दीपक प्रज्वलन के साथ आरती आरंभ करें।
  4. आरती गाते हुए दीपक को क्लॉकवाइज (दाएँ से बाएँ) घुमाते हुए माँ की प्रतिमा/चित्र के सामने सात बार चक्र पूर्ण करें।
  5. घंटी, ताली, अथवा शंख के साथ ताल मिलाते रहें।
  6. आरती के अंत में पुष्पांजलि अर्पित करें और तीन बार परिक्रमा करें।
  7. प्रसाद वितरण के साथ समाप्त करें।

सामूहिक गायन

परिवार के सभी सदस्य एक स्वर में आरती गाएँ। यदि एक व्यक्ति दीपक पकड़े, तो शेष ताली अथवा घंटी के साथ संगत करें। बच्चों को टेक ‘ॐ जय लक्ष्मी माता’ दोहराने को कहें — इससे आरती में उनकी भागीदारी होगी।

महत्व

  • दीपावली का अनिवार्य अंग — पूरे देश में इसी आरती से दीपावली पूजन का समापन होता है।
  • लक्ष्मी के सर्वांगीण रूप का संकलन — एक आरती में उमा, रमा, ब्रह्माणी, दुर्गा, और महालक्ष्मी का स्मरण।
  • समुद्र मंथन का स्मरण — सातवें अंतरे में चौदह रत्नों का संदर्भ पौराणिक कथा को आरती में जोड़ता है।
  • सरल धुन — ‘जगदीश हरे’ की प्रसिद्ध धुन में होने से सभी इसे आसानी से गा लेते हैं।
  • गृहस्थ जीवन का मंगल-गान — विशेष रूप से वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन के लिए शुभ।

सामान्य प्रश्न

क्या यह आरती और ‘जगदीश हरे’ की धुन एक है?

हाँ। दोनों आरतियाँ एक ही धुन में गाई जाती हैं। यह पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी की मूल धुन है, जो उत्तर-भारत की मानक आरती-धुन बन चुकी है।

कितनी बार दीपक घुमाएँ?

पारंपरिक विधि में सात बार — चार बार पैरों के समीप, दो बार नाभि के समीप, और एक बार मुख के समीप। संक्षिप्त विधि में पाँच बार पर्याप्त।

बच्चों को कैसे सिखाएँ?

केवल टेक — ‘ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता’ — को बार-बार दोहराकर शुरू करें। यही पंक्ति पूरी आरती में बार-बार आती है। शेष अंतरे धीरे-धीरे एक-एक करके सिखाएँ।

क्या यह आरती केवल दीपावली पर ही गाई जाती है?

नहीं। दीपावली विशेष अवसर है, परंतु यह आरती दैनिक संध्या पूजन, शुक्रवार पूजन, धनतेरस, और गृह-प्रवेश सभी अवसरों पर गाई जाती है।

क्या इसके साथ अन्य आरती भी आवश्यक है?

पारंपरिक क्रम में — पहले विशेष देवता की आरती (यहाँ ‘ॐ जय लक्ष्मी माता’), फिर सर्व-देव-वंदना के रूप में ‘ॐ जय जगदीश हरे’। दोनों एक साथ गाने से पूजन पूर्ण माना जाता है।

क्या रजस्वला अवस्था में आरती गा सकती हैं?

मानसिक गायन एवं दूर से दर्शन सदैव अनुमत है। केवल स्पर्श-पूजा एवं दीपक धारण से बचें। यह पारंपरिक मत है — आधुनिक अधिकांश आचार्य मानसिक स्मरण को सर्वदा श्रेष्ठ मानते हैं।

आरती के बाद क्या करें?

तीन प्रदक्षिणा (परिक्रमा) — माँ लक्ष्मी की प्रतिमा के चारों ओर तीन बार। फिर साष्टांग प्रणाम, और अंत में प्रसाद ग्रहण एवं वितरण। प्रसाद में खीर, खील, बताशे, और मिष्ठान्न उत्तम हैं।