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ॐ जय जगदीश हरे

By पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी19वीं शताब्दी (लगभग 1870 ई.)हिंदी (खड़ी बोली)

8 min readLast reviewed April 28, 2026

मूल पाठ

ॐ जय जगदीश हरे

स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे। ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का। ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा,
आस करूँ मैं जिसकी। ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी। ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता। ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, किस विधि मिलूँ कृपामय,
तुमको मैं कुमति। ॐ जय जगदीश हरे॥

दीनबन्धु दुःख हरता, तुम रक्षक मेरे।
स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने चरण बढ़ाओ,
द्वार पड़ा मैं तेरे। ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा प्रेम बढ़ाओ,
संतन की सेवा। ॐ जय जगदीश हरे॥

तन मन धन सब तेरा, सब कुछ है तेरा।
स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण,
क्या लागे मेरा। ॐ जय जगदीश हरे॥

ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे। ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ

“ॐ जय जगदीश हरे” आरती भगवान विष्णु — जगदीश (जगत के स्वामी) — को समर्पित है, परंतु इसकी भाषा इतनी सर्वव्यापी है कि यह किसी भी देवता की पूजा के अंत में गाई जाती है। आरती में नौ छंद हैं, और प्रत्येक छंद ईश्वर के एक भिन्न स्वरूप या भक्त की एक भिन्न प्रार्थना को प्रस्तुत करता है।

मुखड़ा (टेक) — “स्वामी जय जगदीश हरे”

प्रत्येक छंद के अंत में दोहराई जाने वाली यह पंक्ति आरती की धुरी है। भक्त घोषणा करते हैं — “हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो; आप अपने भक्तों और दासों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं।”

छंद 1 — ध्यान का फल

“जो आपका ध्यान करता है, वह फल पाता है, और मन का दुःख दूर हो जाता है। उसके घर सुख-संपत्ति आती है और शरीर का कष्ट मिट जाता है।” यह छंद भक्ति के साधारण आर्थिक-शारीरिक लाभों से प्रारंभ होता है — मन का दुःख, धन की कमी, तन की पीड़ा।

छंद 2 — एकमात्र शरण

“आप ही मेरे माता-पिता हैं; मैं और किसकी शरण लूँ? आपके बिना कोई दूसरा नहीं जिसकी मैं आशा करूँ।” यह एकेश्वरवादी समर्पण का सार है — सब कुछ छोड़कर केवल भगवान पर आसरा।

छंद 3 — परब्रह्म स्वरूप

“आप पूर्ण परमात्मा, अंतर्यामी (हृदय के भीतर वासी), परब्रह्म परमेश्वर — सबके स्वामी हैं।” यहाँ ईश्वर का निर्गुण (निराकार) स्वरूप व्यक्त है — वही जो उपनिषदों में सच्चिदानंद कहलाता है।

छंद 4 — दया-सागर पालनहार

“आप करुणा के सागर हैं, संसार के पालनकर्ता। मैं मूर्ख, दुष्ट, कामी हूँ — मैं सेवक, आप स्वामी; हे भर्ता, कृपा करें।” भक्त अपने दोष स्वयं स्वीकारता है — यह विनयभाव की पराकाष्ठा है।

छंद 5 — अगोचर सत्ता

“आप अगोचर (इंद्रियों से परे) हैं, सबके प्राणपति। हे दयामय, हे कृपामय, मैं कुमति (दुर्बुद्धि) हूँ — किस विधि से आपसे मिलूँ?” प्रश्न में ही उत्तर निहित है — यही प्रश्न-भाव साधना का प्रारंभ है।

छंद 6 — दीनबंधु

“दीनबंधु, दुःख हरने वाले, मेरे रक्षक — अपने हाथ उठाएँ, अपने चरण आगे बढ़ाएँ, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।” यह छंद पूर्ण शरणागति को व्यक्त करता है।

छंद 7 — पाप-हरण

“विषय-विकार मिटाएँ, पाप हरें; श्रद्धा, भक्ति, प्रेम बढ़ाएँ — संतों की सेवा का अवसर दें।” यह छंद आत्मशुद्धि की प्रार्थना है।

छंद 8 — अंतिम समर्पण

“तन, मन, धन — सब आपका है; आपका ही आपको अर्पण; मेरा क्या है?” यह आरती का चरम बिंदु है — सर्वार्पण भाव; जब भक्त के पास “मेरा” कुछ नहीं रहता, तब भक्ति पूर्ण होती है।

इतिहास

“ॐ जय जगदीश हरे” की रचना पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (1837–1881 ई.) ने की थी, जो पंजाब के फिल्लौर के एक संत-विद्वान थे। यह आरती लगभग 1870 ई. के आसपास लिखी गई — अर्थात् यह कोई प्राचीन वैदिक स्तोत्र नहीं, अपितु आधुनिक काल की रचना है। फिर भी इसने इतनी शीघ्र लोकप्रियता प्राप्त की कि आज यह विश्व की सबसे अधिक गाई जाने वाली हिंदू आरतियों में से एक है।

श्रद्धाराम फिल्लौरी आर्य समाज के पूर्व के विद्वानों में से थे; वे ज्योतिष, दर्शन और साहित्य के ज्ञाता थे। उनका सबसे प्रसिद्ध अन्य कार्य भाग्यवती नामक उपन्यास है, जिसे हिंदी का प्रारंभिक यथार्थवादी उपन्यास माना जाता है।

आरती की भाषा खड़ी बोली है — जो आधुनिक हिंदी का आधार है — इसी कारण यह उत्तर भारत के हर क्षेत्र में बिना अनुवाद के समझी जाती है। इसकी सरल लय, याद रखने योग्य पंक्तियाँ, और सर्वव्यापी ईश्वर-भाव के कारण यह विशिष्ट विष्णु-पूजा से बाहर निकलकर हर हिंदू अनुष्ठान का अंग बन गई — गृहप्रवेश से विवाह तक, जन्मोत्सव से अंतिम संस्कार तक।

यद्यपि “जगदीश” विष्णु का नाम है, “हरे” भी विष्णु से जुड़ा है, परंतु आरती के शब्द — पारब्रह्म, परमेश्वर, अंतर्यामी, अगोचर — इतने सर्वव्यापी हैं कि यह आरती शिव, दुर्गा, गणेश और किसी भी अन्य देवता की पूजा में बिना संशोधन गाई जा सकती है।

गायन विधि

ॐ जय जगदीश हरे आरती सामान्यतः पूजा के अंत में, आरती-थाली घुमाते हुए गाई जाती है। प्रचलित विधि इस प्रकार है —

  • समय: किसी भी देवता की पूजा के समापन पर। प्रातः और सायं की दैनिक पूजा में नियमित रूप से। विशेष पर्वों — जन्माष्टमी, दीपावली, एकादशी — पर अवश्य।
  • थाली: आरती की थाली में दीपक (पाँच या सात बत्तियाँ), अगरबत्ती, पुष्प, और कुमकुम-अक्षत रखे जाते हैं। दीपक प्रायः गाय के घी या तिल के तेल का होता है।
  • दिशा: देवता के सम्मुख खड़े होकर, थाली को दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाया जाता है।
  • गायन: सब उपस्थित जन एक स्वर में गाते हैं। आरती को बिना संगीत वाद्य के भी गाया जा सकता है, परंतु शंख, घंटी, मंजीरे और ढोलक का उपयोग सामान्य है।
  • अंत: आरती के पश्चात “ॐ शांति शांति शांति” का उच्चारण किया जाता है, फिर थाली के दीपक की ज्योति को सब उपस्थित जन आरती लेकर (हाथ ज्योति पर घुमाकर मस्तक पर लगाकर) ग्रहण करते हैं।
  • प्रसाद: अंत में पुष्प, अक्षत और प्रसाद वितरण होता है।

जाति, लिंग, आयु — किसी पर कोई बंधन नहीं। बच्चे भी इसे आसानी से सीख सकते हैं।

महत्व

ॐ जय जगदीश हरे आरती कई कारणों से हिंदू भक्ति-संसार में विशिष्ट स्थान रखती है —

सार्वभौमिक प्रयोग — यह आरती किसी भी देवता की पूजा के अंत में गाई जाती है। पारब्रह्म, अंतर्यामी, परमेश्वर जैसे शब्द किसी भी रूप के ईश्वर पर लागू होते हैं। इसलिए दुर्गा-पूजा, गणेश-पूजा, शिव-पूजा या लक्ष्मी-पूजा — हर अनुष्ठान में इसका स्थान है।

भक्ति की क्रमिक यात्रा — आरती के नौ छंद भक्ति की क्रमिक यात्रा को दर्शाते हैं — पहले संकट-निवारण और भौतिक सुख की प्रार्थना (छंद 1), फिर शरणागति (छंद 2), फिर ईश्वर का परब्रह्म स्वरूप (छंद 3), फिर अपने दोषों की स्वीकृति (छंद 4–5), और अंत में पूर्ण समर्पण (“तन मन धन सब तेरा”)। यह आरती स्वयं कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों योगों की संक्षिप्त शिक्षा है।

सरल भाषा का बल — संस्कृत के जटिल मंत्रों के विपरीत, यह आरती शुद्ध खड़ी बोली में है। इसी कारण यह बच्चों, ग्रामीणों, और हिंदी-न-जानने वाले विदेशी भक्तों — सब के द्वारा गाई जा सकती है।

आधुनिक रचना का प्रमाण — यह तथ्य कि एक 19वीं शताब्दी की रचना इतनी व्यापक रूप से अपनाई गई, यह बताता है कि भक्ति-परंपरा कभी जमी हुई नहीं — हर युग अपने नए स्तोत्र रचता है। श्रद्धाराम फिल्लौरी ने एक ऐसी आरती लिखी जो प्राचीन भी लगती है और सर्वथा आधुनिक भी।

सर्वार्पण भाव — आरती का अंतिम छंद — “तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा” — अनासक्ति (निरहंकार) की चरम अभिव्यक्ति है। भगवद्गीता में कृष्ण ने अर्जुन को यही उपदेश दिया था — सब कर्म ईश्वर को अर्पित करो।

सामान्य प्रश्न

ॐ जय जगदीश हरे आरती किसने लिखी थी?

इस आरती की रचना पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने की थी, जो 19वीं शताब्दी के पंजाब के संत-विद्वान थे। उन्होंने यह आरती लगभग 1870 ईस्वी में लिखी।

यह आरती किस देवता को समर्पित है?

मूलतः यह आरती भगवान विष्णु (जगदीश) को समर्पित है। परंतु इसकी भाषा इतनी सार्वभौमिक है कि यह किसी भी देवता की पूजा के अंत में गाई जाती है — चाहे शिव, दुर्गा, गणेश, या लक्ष्मी की पूजा हो।

क्या यह आरती प्राचीन है?

नहीं, यह आरती लगभग 150 वर्ष पुरानी है — 19वीं शताब्दी की रचना। फिर भी इसकी सरल लय और सर्वव्यापी भाव के कारण यह आज की सबसे प्रचलित आरतियों में है।

आरती कब गानी चाहिए?

पूजा के समापन पर — चाहे प्रातः की नित्य पूजा हो या किसी विशेष अनुष्ठान की समाप्ति। दीपावली, जन्माष्टमी, एकादशी पर इसका विशेष महत्व है।

क्या यह आरती सब लोग गा सकते हैं?

हाँ, जाति, लिंग, आयु का कोई बंधन नहीं। बच्चे, स्त्री-पुरुष, सब समान रूप से इसे गा सकते हैं।

“स्वामी जय जगदीश हरे” टेक का क्या अर्थ है?

“हे जगत के स्वामी हरि (विष्णु), आपकी जय हो।” जगदीश = जगत + ईश (जगत के स्वामी), हरे = हरि (विष्णु का एक नाम)। यह पंक्ति प्रत्येक छंद के अंत में दोहराई जाती है, जिससे आरती में लय और सामूहिक भागीदारी बनी रहती है।

आरती के अंत में दीपक की ज्योति क्यों ली जाती है?

आरती के दीपक की ज्योति को मस्तक पर लगाने का अर्थ है — देवता की कृपा को ग्रहण करना। दीपक ईश्वर के प्रकाश का प्रतीक है, और उस प्रकाश को अपने जीवन में अंगीकार करना ही आरती का चरम भाव है।