शिव चालीसा
By अयोध्यादास19वीं शताब्दीहिंदी (खड़ी बोली, ब्रज तत्वों के साथ)
मूल पाठ
दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
चौपाई
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दी गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायो। लवनिमेष महँ मारि गिरायो॥
आप जलन्धर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रगटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्हे दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हां। जीत के लंक विभीषण दीन्हां॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घट वासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करै मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करै सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
दोहा
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
अर्थ
शिव चालीसा भगवान शिव — महादेव, शंकर, भोलेनाथ — को समर्पित 40-चौपाई स्तोत्र है। इसमें शिव के स्वरूप, उनकी पौराणिक कथाओं, और भक्त की प्रार्थना का क्रम है।
आरंभिक दोहा — गणेश-वंदना और लेखक-संकल्प
“जय गणेश गिरिजा-सुवन, मंगल मूल सुजान; कहत अयोध्यादास, तुम देहु अभय वरदान।” लेखक अयोध्यादास पहले गणेश (पार्वती के पुत्र) की वंदना करते हैं और उनसे अभय वरदान माँगते हैं।
चौपाई 1–4 — शिव का स्वरूप-वर्णन
जो गिरिजा (पार्वती) के पति हैं, दीनों पर दया करते हैं, और सदा संतों की रक्षा करते हैं — उन्हीं को नमस्कार। मस्तक पर चंद्रमा, कानों में नागफनी (सर्प) के कुंडल, अंग गौर (श्वेत) हैं और मस्तक से गंगा बहती है, गले में मुण्डों की माला है, और शरीर पर भस्म लगी है। बाघ की खाल का वस्त्र है, जिसकी छवि देखकर साँप तक मोहित होते हैं। यह आधि-योगी शिव का रूप है।
चौपाई 5–8 — परिवार-वर्णन
बाईं ओर मैना-पुत्री पार्वती सुशोभित हैं — उनकी छवि अनुपम है। हाथ में त्रिशूल — जो सदा शत्रुओं का संहार करता है। नंदी (बैल) और गणेश ऐसे शोभित हैं जैसे सागर के बीच कमल। कार्तिकेय (श्याम) और गणपति (गणराऊ) के साथ की छवि का कोई वर्णन नहीं कर सकता।
चौपाई 9–12 — असुर-संहार
जब-जब देवताओं ने पुकारा, तब-तब प्रभु ने उनके दुःख दूर किए। तारकासुर का उपद्रव बढ़ा, सब देवता मिलकर शिव के पास आए — आपने तत्काल षडानन (कार्तिकेय) को भेजा, जिसने पल भर में तारक का वध किया। आपने स्वयं जलन्धर असुर का संहार किया, जिसका सुयश संसार में विख्यात है।
चौपाई 13–16 — दानवीरता और महिमा
त्रिपुरासुर से युद्ध किया, और कृपा से सब को बचाया। भागीरथ ने भारी तप किया — उसकी प्रतिज्ञा पुरारी (शिव) ने पूर्ण की (गंगा को पृथ्वी पर लाए)। दानियों में आपके समान कोई नहीं — सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं। वेद आपकी महिमा गाते हैं, परंतु अकथ और अनादि होने का भेद नहीं पाते।
चौपाई 17–20 — समुद्र-मंथन और श्रीराम-पूजन
समुद्र-मंथन के समय जब विष की ज्वाला प्रकट हुई और सुर-असुर व्याकुल हुए, तब आपने दया करके विष का पान किया — और तब नीलकण्ठ (नीला कण्ठ) नाम पड़ा। श्रीरामचन्द्र ने जब आपकी पूजा की, तब लंका जीतकर विभीषण को राज्य दिया। राम सहस्र कमलों से शिव की पूजा कर रहे थे; पुरारी (शिव) ने उनकी परीक्षा ली।
चौपाई 21–24 — राम की भक्ति-परीक्षा
प्रभु (शिव) ने एक कमल छिपा लिया; तब राम ने अपना कमल-समान नेत्र निकालकर पूजा करनी चाही। कठिन भक्ति देखकर शिव प्रसन्न हुए और इच्छित वर दिया। “जय जय जय अनंत अविनाशी, सबके घट में निवास करने वाले” — यह पंक्ति शिव के सर्वव्यापी स्वरूप की घोषणा है। फिर भक्त अपनी पीड़ा कहता है — “दुष्ट सब मुझे सताते हैं, मैं भ्रमित रहता हूँ।”
चौपाई 25–28 — संकट से प्रार्थना
“त्राहि-त्राहि” पुकार करते हुए भक्त रक्षा माँगता है — “त्रिशूल लेकर शत्रुओं को मारो, संकट से उबारो।” माता-पिता-भाई — कोई संकट में नहीं पूछता; एक आप ही की आशा है।
चौपाई 29–32 — सर्वांगीण कृपा
“निर्धन को धन देते हैं — जो भी जाँचता है (माँगता है), वह फल पाता है। आपकी स्तुति किस विधि करूँ? हमारी चूक क्षमा करो।” शंकर — संकट के नाशन और विघ्न-विनाशन। योगी, यति, मुनि — सब आपका ध्यान करते हैं; नारद और शारदा (सरस्वती) सिर झुकाते हैं।
चौपाई 33–36 — पाठ का माहात्म्य
“नमो नमः शिवाय” — सुर, ब्रह्मा भी आपका पार नहीं पाते। जो मन लगाकर यह पाठ करता है, उस पर शंभु सहायी होते हैं। ऋणी (कर्ज में डूबा) पाठ करे तो पवित्र-हारी (पाप-हरने वाला) हो जाए। पुत्र की इच्छा रखने वाले को निश्चित रूप से शिव-प्रसाद से पुत्र मिलता है।
चौपाई 37–40 — व्रत और लेखक की प्रार्थना
“पंडित त्रयोदशी को (व्रत-) ध्यानपूर्वक हवन कराए। जो सदा त्रयोदशी का व्रत करे, उसके शरीर में क्लेश नहीं रहता। धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाए, शंकर के सम्मुख पाठ सुनाए। जन्म-जन्म के पाप नष्ट होंगे, अंत में शिवपुर (शिव-धाम, कैलाश) में स्थान मिलेगा।” अंत में अयोध्यादास कहते हैं — “हमारी आशा आप ही पर है, सकल दुःख हरें।”
अंतिम दोहे — रचना का संकल्प
“नित्य प्रातः चालीसा का पाठ करूँगा; आप मेरी मनोकामना पूर्ण करें, हे जगदीश।” अंतिम दोहे में मार्गशीर्ष (मगसर) माह की षष्ठी, हेमंत ऋतु, संवत 64 (?) — रचना की तिथि का उल्लेख है, जिसके आधार पर विद्वान इसे विक्रम संवत 1864 (1807 ई.) के आसपास रखते हैं।
इतिहास
शिव चालीसा की रचना अयोध्यादास ने की थी — आरंभिक दोहे में “कहत अयोध्यादास” और अंतिम चौपाई में “कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी” से उनका नाम स्पष्ट है। अयोध्यादास के विषय में जीवनी-संबंधी जानकारी सीमित है; वे संभवतः 19वीं शताब्दी के एक भक्त-कवि थे, जो शिव-उपासक थे।
अंतिम दोहे में लेखक स्वयं रचना-काल का उल्लेख करते हैं — “मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान”। संवत चौसठ से तात्पर्य प्रायः विक्रम संवत 1864 (1807 ईस्वी) माना जाता है, अर्थात् यह चालीसा लगभग दो शताब्दियों पुरानी है। अन्य विद्वान इसे संवत 1964 (1907 ई.) से जोड़ते हैं।
रचना की भाषा खड़ी बोली के साथ ब्रज भाषा के तत्वों का मिश्रण है — जो उत्तर-मध्यकालीन हिंदी भक्ति-काव्य की विशेषता है। कुछ शब्द — “पुरारी”, “नीलकण्ठ”, “भोलानाथ”, “त्रिपुरारी” — शिव के पौराणिक नामों के काव्यात्मक प्रयोग हैं।
चालीसा की संरचना हनुमान चालीसा के समान है — दो आरंभिक दोहे, चालीस चौपाइयाँ, और दो समापन दोहे। यह संरचना अयोध्यादास ने स्पष्ट रूप से तुलसीदास की हनुमान चालीसा से ली है, जो उनसे लगभग दो शताब्दी पहले रची गई थी।
विशेषता यह है कि चालीसा में शिव की अनेक पौराणिक कथाओं का संक्षिप्त उल्लेख है — समुद्र-मंथन, हलाहल-पान, तारकासुर-वध, जलन्धर-वध, त्रिपुरासुर-वध, भागीरथ-तप, राम-पूजन — इसलिए यह एक ही पाठ में शिव-पुराण की मुख्य कथाओं का दर्शन कराती है।
पाठ विधि
शिव चालीसा के पाठ की पारंपरिक विधि —
- विशेष दिन: सोमवार — शिव का दिन; त्रयोदशी (प्रदोष) — हर पक्ष की तेरहवीं तिथि; महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी) — सबसे बड़ा शिव-पर्व; श्रावण मास के सोमवार — विशेष रूप से उत्तम।
- शुभ समय: स्नान के पश्चात प्रातःकाल, या सायंकाल प्रदोष (सूर्यास्त के लगभग दो घंटे का समय) में। निशीथ-काल (मध्यरात्रि) महाशिवरात्रि पर।
- आसन: स्वच्छ वस्त्र पहनकर, पूर्व या उत्तर मुखी होकर, सफेद या लाल आसन पर बैठें। पीठ सीधी रखें।
- सामग्री: शिवलिंग या शिव-चित्र, बेलपत्र (तीन पत्तियाँ — त्रिगुण के प्रतीक), भस्म, चंदन, सफेद पुष्प (विशेषकर धतूरा, आक), दूध (अभिषेक के लिए), गंगाजल, दीपक (तिल का तेल या घी), धूप, नैवेद्य (फल, मिठाई)।
- पूर्व मंत्र: पाठ से पूर्व “ॐ नमः शिवाय” का 21 बार जप।
- पाठ की संख्या: नित्य एक पाठ। महाशिवरात्रि या प्रदोष पर 3, 11, 21, 108 बार पाठ। अष्टम सोमवार से लेकर श्रावण के अंतिम सोमवार तक का अनुष्ठान विशेष फलदायी।
- समापन: पाठ के बाद “महामृत्युंजय मंत्र” — “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…” का 11 बार जप, फिर अभिषेक का जल और प्रसाद ग्रहण।
जाति, लिंग, आयु — कोई बंधन नहीं। शिव सर्वसमता के देवता हैं — अभिषेक का जल चांडाल से लेकर ब्राह्मण तक, सब एक ही भाव से चढ़ाते हैं।
महत्व
शिव चालीसा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है —
शिव की पौराणिक कथाओं का संग्रह — चालीसा में शिव की प्रमुख पौराणिक कथाओं का संक्षिप्त उल्लेख है — नीलकण्ठ बनना (समुद्र-मंथन में हलाहल-पान, चौपाई 17–18), तारकासुर-वध (कार्तिकेय द्वारा, चौपाई 11), जलन्धर-वध (चौपाई 12), त्रिपुरासुर-वध (चौपाई 13), भागीरथ की प्रतिज्ञा (गंगा का अवतरण, चौपाई 14), राम की कमल-पूजा (चौपाई 19–22)। एक ही चालीसा में शिव पुराण के मुख्य प्रसंगों का दर्शन।
विरोधाभासों का समन्वय — शिव आदि-योगी (तपस्वी) और पारिवारिक पुरुष (पार्वती के पति, गणेश-कार्तिकेय के पिता) दोनों हैं; भयंकर श्मशान-वासी और भोलानाथ (सरल हृदय वाले) दोनों हैं। चालीसा इन दोनों रूपों को एक साथ प्रस्तुत करती है।
त्रयोदशी व्रत का माहात्म्य — चौपाई 37–38 में त्रयोदशी (प्रदोष) व्रत का विशेष उल्लेख है। प्रदोष काल — सूर्यास्त के पूर्व-पश्चात का समय — शिव-पूजा के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इस समय शिव कैलाश पर तांडव करते हैं।
सार्वजनिक भक्ति — शिव भोलेनाथ (सरल हृदय वाले) के रूप में किसी भी भक्त की साधारण भेंट से प्रसन्न हो जाते हैं — जल और बेलपत्र पर्याप्त हैं। चालीसा में बार-बार “दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं” (दानियों में आप समान कोई नहीं) कहा गया है।
नीलकण्ठ का प्रतीक — विष-पान करके शिव ने न केवल समुद्र-मंथन को सम्भव बनाया, बल्कि आत्म-त्याग का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया। नीलकण्ठ — दूसरों के विष को अपने में धारण करने वाला — आज भी परोपकारी व्यक्तित्व का पर्याय है।
सर्वसमता — चालीसा का अंतिम संदेश यह है कि शिव घट-घट के वासी हैं — हर हृदय में निवास करने वाले। यह अद्वैत-दर्शन का सरल प्रतिपादन है।
सामान्य प्रश्न
शिव चालीसा के रचयिता कौन हैं?
शिव चालीसा की रचना अयोध्यादास ने की थी, जो संभवतः 19वीं शताब्दी के एक शिव-भक्त कवि थे। उनका नाम चालीसा में दो स्थानों पर स्पष्ट रूप से लिखा है — आरंभिक दोहे में और अंतिम चौपाइयों में।
शिव चालीसा कब लिखी गई थी?
अंतिम दोहे में “संवत चौसठ” का उल्लेख है, जिसे विद्वान प्रायः विक्रम संवत 1864 (1807 ईस्वी) मानते हैं। अर्थात् यह चालीसा लगभग दो शताब्दियों पुरानी है। कुछ विद्वान इसे संवत 1964 (1907 ई.) से भी जोड़ते हैं।
शिव चालीसा का पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?
सोमवार शिव का दिन है। त्रयोदशी (प्रदोष) की तिथि और महाशिवरात्रि का पर्व सबसे शुभ हैं। श्रावण मास के सोमवार विशेष रूप से उत्तम माने जाते हैं। दैनिक पाठ के लिए प्रातः और संध्या (प्रदोष-काल) श्रेष्ठ हैं।
शिव को क्या भोग लगाना चाहिए?
शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय हैं — तीन पत्तियाँ त्रिगुण (सत्व-रजस-तमस) और त्रिनेत्र की प्रतीक हैं। इसके अतिरिक्त दूध (अभिषेक के लिए), धतूरा, आक के पुष्प, गंगाजल, भस्म, चंदन, और सफेद मिठाई (खीर, बर्फी)। तुलसी पत्र शिव को नहीं चढ़ाते — वह विष्णु को अर्पित होती है।
क्या स्त्रियाँ शिव चालीसा का पाठ कर सकती हैं?
हाँ, स्त्रियाँ शिव चालीसा का पाठ कर सकती हैं। चालीसा में स्वयं कोई शास्त्रीय प्रतिबंध नहीं है। सोमवार व्रत (विशेषकर सोलह सोमवार व्रत) पारंपरिक रूप से अविवाहित स्त्रियों के लिए उत्तम वर हेतु प्रसिद्ध है।
शिव “नीलकण्ठ” क्यों कहलाते हैं?
समुद्र-मंथन के समय जब हलाहल विष प्रकट हुआ और सुर-असुर व्याकुल हो गए, तब शिव ने सबकी रक्षा के लिए विष पी लिया। पार्वती ने विष को कण्ठ में रोका — जिससे शिव का कण्ठ नीला हो गया। इसी कारण उनका नाम नीलकण्ठ (नीला कण्ठ वाले) पड़ा। यह आत्म-त्याग और परोपकार का सर्वोच्च उदाहरण है।
“त्रिपुरारी” का क्या अर्थ है?
त्रिपुरारी = त्रिपुर के अरि (शत्रु)। पुराणों के अनुसार तारक नामक असुर के तीन पुत्रों — तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष — ने तीन उड़ते हुए नगर (त्रिपुर) — स्वर्ण, रजत, लोह — बनाए थे, जो हजार वर्ष में एक बार एक रेखा में आते थे। शिव ने इस क्षण को पकड़कर एक ही बाण से तीनों पुर भस्म कर दिए — इसी कारण वे त्रिपुरारी कहलाए।
शिव चालीसा के पाठ के क्या लाभ हैं?
चालीसा स्वयं चार प्रकार के लाभों का संकेत करती है — संकट-निवारण और शत्रु-नाश (चौपाई 25–26), निर्धन को धन की प्राप्ति (चौपाई 29), पुत्र-प्राप्ति (चौपाई 36), और अंत में शिवपुर (कैलाश-धाम) की प्राप्ति (चौपाई 40)। साथ ही जन्म-जन्म के पापों का नाश।