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महा मृत्युञ्जय मन्त्र

By ऋषि वसिष्ठ (ऋग्वेद 7.59.12)वैदिक काल (c. 1500–1000 BCE)संस्कृत (वैदिक)

5 min readLast reviewed May 20, 2026

मूल मन्त्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

(ऋग्वेद 7.59.12; यजुर्वेद-तैत्तिरीय संहिता 1.8.6.2)

पद-प्रति-पद अर्थ

  • — सर्वव्यापी ब्रह्म का ध्वन्यात्मक प्रतीक।
  • त्र्यम्बकम् — “तीन नेत्रों वाले” — शिव; “अम्बका” का अर्थ है नेत्र, “त्रि” तीन।
  • यजामहे — “हम पूजते हैं” / “हम यजन करते हैं” — बहुवचन में, सामूहिक स्तुति।
  • सुगन्धिम् — “सुगन्धित” — आध्यात्मिक अर्थ में जिसका स्मरण मन को सुगन्धित करता है
  • पुष्टि-वर्धनम् — “पोषण-वृद्धि करने वाले” — जो जीवन की वृद्धि और स्वास्थ्य देते हैं।
  • उर्वारुकम्-इव — “खरबूज़े की भाँति” — उर्वारुक एक प्रकार का ककड़ी-खरबूज़ है, जो पकने पर अपने आप डण्ठल से छूट जाता है।
  • बन्धनात् — “बन्धन से” — डण्ठल का बन्धन; प्रतीकात्मक रूप से शरीर-संसार का बन्धन।
  • मृत्योः — “मृत्यु से” — पंचमी विभक्ति, “मृत्यु से (मुक्ति)”।
  • मुक्षीय — “मैं मुक्त हो जाऊँ” — आत्मनेपद, आशीर्वाद-रूप क्रिया।
  • मा अमृतात् — “अमृत से नहीं” — (अर्थात् मुझे मृत्यु से मुक्त करें, परन्तु अमृत्व से अलग न करें)

समग्र अर्थ

“हम त्र्यम्बक (तीन-नेत्र शिव) की पूजा करते हैं — जो सुगन्धित हैं, जो पोषण के वर्धक हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूज़ा अपने डण्ठल के बन्धन से सहज ही मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार मैं मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाऊँ — किन्तु अमरता से नहीं।”

मन्त्र का गूढ़ बिन्दु अन्तिम चरण में है — “मा अमृतात्” — “अमरता से नहीं”। यह मात्र दीर्घायु की प्रार्थना नहीं है; यह उस अमृत-स्वरूप से न-छूटने की प्रार्थना है, जो आत्म-स्वरूप का प्रतीक है। जैसे पका खरबूज़ा बेल को नष्ट किये बिना उससे छूटता है — वैसे ही जीवन-बन्ध से छूटना मृत्यु नहीं, अमृत्व है।

ऋग्वेदिक स्रोत और ऋषि वसिष्ठ

महा मृत्युञ्जय मन्त्र ऋग्वेद के सातवें मण्डल, 59वें सूक्त के 12वें मन्त्र के रूप में मिलता है। इसके ऋषि वसिष्ठ हैं — सप्तर्षियों में से एक — और देवता रुद्र हैं। छन्द अनुष्टुप् है। यह त्र्यम्बक-यज्ञ नामक प्रसिद्ध वैदिक यज्ञ का मूल मन्त्र है।

यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (1.8.6.2) में भी यह आता है — परन्तु वहाँ इसके उपयोग का विधान कुछ भिन्न है — श्रावण-मास के सोमवार और महाशिवरात्रि पर इसके सहस्र-जप का विधान।

मार्कण्डेय की कथा

महा मृत्युञ्जय मन्त्र के साथ सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा मार्कण्डेय ऋषि की है। ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी मरुद्वती को सन्तान नहीं थी; उन्होंने शिव से सन्तान का वर माँगा। शिव ने दो विकल्प दिये — सौ-वर्ष-जीवी सामान्य पुत्र अथवा सोलह-वर्ष-जीवी असाधारण पुत्र। उन्होंने दूसरा चुना।

मार्कण्डेय बाल्यकाल से ही शिव-भक्त थे। जब उनकी आयु सोलह वर्ष पूर्ण हुई, यमराज लेने आये। मार्कण्डेय शिवलिङ्ग से लिपटे रहे और महा मृत्युञ्जय मन्त्र का जप करते रहे। यम ने पाश फेंका — और वह पाश शिवलिङ्ग से भी टकराया। शिव क्रोधित होकर प्रकट हुए; यम भाग गये। शिव ने मार्कण्डेय को चिरञ्जीवी का वरदान दिया।

यह कथा पुराण और महाभारत में आती है। आज भी मार्कण्डेय को सात चिरञ्जीवियों में गिना जाता है, और यह मन्त्र दीर्घायु और रोग-निवारण का सबसे महत्वपूर्ण वैदिक मन्त्र माना जाता है।

जप विधि

  • दिन — सोमवार सर्वोत्तम। प्रदोष-तिथि, श्रावण-मास, और महाशिवरात्रि पर विशेष।
  • समय — ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4:00–6:00); अथवा प्रदोष-काल (सायं)।
  • विधि
    1. पूर्व अथवा उत्तर मुख होकर बैठें।
    2. रुद्राक्ष माला (108 दानों की) का प्रयोग करें।
    3. शिवलिङ्ग पर बिल्व-पत्र समर्पित करें; घृत का दीप जलायें।
    4. प्रत्येक मनके पर एक मन्त्र — 108 बार।
    5. अनुष्ठान-काल में नित्य 108 बार न्यूनतम।
  • विशेष अनुष्ठान — गंभीर रोगी के लिये सहस्र जप (1000 बार दिन में) अथवा एक लाख जप (40-50 दिनों में) का अनुष्ठान प्रसिद्ध है।
  • सहयोगी द्रव्य — महामृत्युञ्जय जप के साथ शिवलिङ्ग पर गंगाजल और दूध की निरन्तर अभिषेक-धारा प्रसिद्ध है।

त्र्यम्बक, रुद्र-गायत्री, और महामृत्युञ्जय — सम्बन्ध

त्र्यम्बक यज्ञ — महा मृत्युञ्जय मन्त्र का मूल वैदिक उपयोग — एक रुद्र-यज्ञ था जिसमें इस मन्त्र से होम होता था। आज की मन्दिर-परम्परा में यह यज्ञ रुद्राभिषेक के रूप में जीवित है।

रुद्र-गायत्री एक अलग मन्त्र है — “तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्” — जो ध्यान-केन्द्रित है। महामृत्युञ्जय मन्त्र इसका पूरक है — आरोग्य और दीर्घायु पर केन्द्रित।

बहुत-से आचार्य दोनों का सम्मिलित जप करने की सलाह देते हैं — रुद्र-गायत्री से ध्यान-शुद्धि, फिर महामृत्युञ्जय से प्राण-शक्ति।

सामान्य प्रश्न

महा मृत्युञ्जय मन्त्र कहाँ से लिया गया है?

यह ऋग्वेद के 7वें मण्डल, 59वें सूक्त का 12वाँ मन्त्र है। इसके ऋषि वसिष्ठ हैं और देवता रुद्र। यह यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (1.8.6.2) में भी मिलता है।

“त्र्यम्बक” का अर्थ क्या है?

त्र्यम्बक का अर्थ है “तीन नेत्रों वाले”। “अम्बका” का अर्थ नेत्र, “त्रि” तीन। यह शिव का प्रसिद्ध नाम है — शिव के दो साधारण नेत्र और एक तीसरा अग्नि-नेत्र (ज्ञान-चक्षु) माथे पर है।

इस मन्त्र में “मा अमृतात्” का क्या तात्पर्य है?

“मा अमृतात्” का शाब्दिक अर्थ है — अमृत से नहीं। साधक प्रार्थना करता है — मृत्यु से तो मुक्त हो जाऊँ, परन्तु अमृत-स्वरूप (मेरे आत्म-स्वरूप) से न छूटूँ। यह वैदिक चिन्तन का गूढ़ बिन्दु है — मृत्यु से मुक्ति लेकिन अमरता से नहीं।

मार्कण्डेय की कथा क्या है?

ऋषि मृकण्डु के पुत्र मार्कण्डेय की आयु जन्म से ही 16 वर्ष नियत थी। जब यम लेने आये, मार्कण्डेय शिवलिङ्ग से लिपटे रहकर महा मृत्युञ्जय मन्त्र का जप करते रहे। शिव प्रकट हुए, यम भाग गये, और शिव ने मार्कण्डेय को चिरञ्जीवी का वर दिया। यह कथा पुराण और महाभारत में मिलती है।

कितनी बार जप करना चाहिये?

नित्य अभ्यास के लिये 108 बार (एक माला) पर्याप्त है। विशेष संकल्प हेतु — रोगी के लिये — सहस्र-जप (1000 बार/दिन) अथवा एक लाख (1,00,000) का अनुष्ठान 40-50 दिनों में पूरा करते हैं।

क्या यह मन्त्र केवल रोगियों के लिये है?

नहीं। यह मृत्यु-भय, असुरक्षा, अकाल-मृत्यु-दोष, और गंभीर मानसिक तनाव के लिये भी अत्यन्त फलदायी माना जाता है। नित्य जप से जीवन-शक्ति और मानसिक स्थिरता का अनुभव कई साधक करते हैं।

क्या इसका जप स्त्रियाँ कर सकती हैं?

हाँ, पूर्णतः। शास्त्रीय निषेध नहीं है। अनेक माता-बहनें परिवार के सदस्यों के आरोग्य-कामना से इस मन्त्र का जप करती हैं।

इस मन्त्र और गायत्री-मन्त्र में क्या अन्तर है?

गायत्री मन्त्र (ऋग्वेद 3.62.10) सूर्य/सविता का मन्त्र है — बुद्धि-शुद्धि और प्रकाश का। महा मृत्युञ्जय मन्त्र शिव/रुद्र का मन्त्र है — आरोग्य, दीर्घायु, और मृत्यु-भय के निवारण का। दोनों वैदिक हैं; दोनों भिन्न देवताओं के, भिन्न प्रयोजनों के।

क्या इसका जप किसी विशेष समय पर वर्जित है?

परंपरा में ग्रहण-काल और सूतक-काल में जप का विशेष विधान है (इन कालों में अधिक प्रभावी माना जाता है)। अशुद्ध स्थिति में जप का सामान्य निषेध है — स्नान के बाद, स्वच्छ वस्त्र में जप करें।