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गायत्री मंत्र

By ऋषि विश्वामित्र (ऋग्वेद ३.६२.१०)वैदिक काल (१५००–१००० ईसा पूर्व)वैदिक संस्कृत

5 min readLast reviewed May 2, 2026

मूल मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

पूर्ण उच्चारण (व्याहृति-सहित)

ॐ भूः। ॐ भुवः। ॐ स्वः। ॐ महः। ॐ जनः। ॐ तपः। ॐ सत्यम्॥

ॐ तत् सवितुर् वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

ॐ आपो ज्योति रसो अमृतं ब्रह्म भूर् भुवः स्वर् ॐ॥

मंत्र-विश्लेषण

शब्द-दर-शब्द अर्थ

शब्द अर्थ
प्रणव — परब्रह्म का बीज-नाद
भूः भू-लोक (पृथ्वी)
भुवः भुवर्-लोक (अंतरिक्ष)
स्वः स्वर्-लोक (आकाश/स्वर्ग)
तत् वह (सर्वोच्च तत्त्व)
सवितुः सविता (सूर्य-सावित्री) का
वरेण्यम् वरण-योग्य, श्रेष्ठ
भर्गः तेज, प्रकाश, ज्योति
देवस्य देव का
धीमहि हम ध्यान करें
धियः बुद्धियों को
यः जो
नः हमारी
प्रचोदयात् प्रेरित करे

पूर्ण अर्थ

“ॐ — भू, भुवः, स्वः (तीनों लोकों के सहित) —
हम सविता-देव के उस वरेण्य (श्रेष्ठ), भर्ग (तेज) का ध्यान करते हैं —
जो हमारी बुद्धियों को (सत्य की ओर) प्रेरित करे।”

तीन मुख्य अनुवाद

(१) सूर्य-केंद्रित“हम सूर्य-देव सविता के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।”

(२) ज्ञान-केंद्रित“हम उस सर्वोच्च तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी प्रज्ञा (विवेक-बुद्धि) को जागृत करे।”

(३) ब्रह्म-केंद्रित“हम उस परम ब्रह्म का ध्यान करते हैं — जो सूर्य के तेज में प्रकट है, और जो हमारी समझ को प्रेरित करता है।”

इतिहास

गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मण्डल, ६२वें सूक्त, १०वीं ऋचा में स्थित है। ऋषि विश्वामित्र हैं, छंद गायत्री है (२४ अक्षर — तीन ८-अक्षर वाले पाद), और देवता सविता (सूर्य-सावित्री) हैं।

‘गायत्री’ का अर्थ‘गायन्तं त्रायते’ — जो गाने वाले की रक्षा करती है। मंत्र को ‘सर्व-मन्त्र-शिरोमणि’ (सब मंत्रों का शिरोमणि) कहा गया है।

वैदिक-पौराणिक स्थान

  • उपनयन संस्कार का केन्द्रीय मंत्र — आज भी ब्राह्मण-बालक यज्ञोपवीत के समय गायत्री-दीक्षा प्राप्त करता है।
  • त्रिकाल संध्या — प्रात:, मध्याह्न, सायंकाल — तीन समय जप।
  • मनुस्मृति में स्पष्ट कथन — “गायत्र्या परं नास्ति” (गायत्री से बढ़कर कुछ नहीं)।
  • भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं — “गायत्री छन्दसामहम्” (छंदों में मैं गायत्री हूँ)।

व्याहृतियाँ — सात लोकों का स्मरण

पारंपरिक उच्चारण में सात ‘व्याहृतियाँ’ आती हैं:

व्याहृति लोक
भूः पृथ्वी
भुवः अंतरिक्ष
स्वः आकाश
महः महर्लोक
जनः जनलोक
तपः तपोलोक
सत्यम् सत्यलोक (ब्रह्मलोक)

ये सप्त-लोक की कल्पना — हिन्दू ब्रह्माण्ड-विज्ञान का सार।

‘गायत्री-माता’ का व्यक्तिकरण

पुराण-काल में ‘गायत्री’ को देवी-स्वरूप माना गया — पाँच मुख वाली, दस भुजाओं वाली, तीनों लोकों की माता। गायत्री देवी मंदिर हरिद्वार, उज्जैन, और अन्य स्थानों पर। पारंपरिक चित्र में गायत्री हंस पर बैठीं, हाथ में कमण्डल, माला, अक्षमाला, और शास्त्र-ग्रंथ धारण करती हैं।

जप विधि

कब करें

  • त्रिकाल संध्या — प्रात:, मध्याह्न, सायंकाल (पारंपरिक)
  • ब्रह्म-मुहूर्त (४:०० — ६:०० बजे) — सर्वोत्तम
  • रविवार — सूर्य का दिन; विशेष फलदायी
  • यज्ञ, हवन, संस्कार के समय
  • यात्रा से पूर्व, परीक्षा से पूर्व, कठिन कार्य से पूर्व

कैसे करें

  1. स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण।
  2. पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठें।
  3. रुद्राक्ष अथवा तुलसी की माला हाथ में।
  4. मंत्र का स्पष्ट उच्चारण — एक मनके पर एक मंत्र।
  5. एक माला (१०८ बार) = एक चक्र।
  6. प्रतिदिन एक से १० मालाओं का संकल्प।
  7. जप के पश्चात सूर्य-दर्शन अथवा सूर्य-ध्यान।

तीन प्रकार के जप

  • वाचिक (बोलकर) — आरंभिक स्तर
  • उपांशु (होंठ हिलाकर) — मध्यम
  • मानसिक (मन ही मन) — सर्वोच्च

विशेष विधियाँ

सरल विधि (दैनिक) — १०८ बार जप।

मध्यम विधि — २१ बार त्रिकाल — कुल ६३ बार।

अनुष्ठान विधि — २४००० बार ४१ दिनों में।

पुरश्चरण विधि — २४ लाख बार — पूर्ण पुरश्चरण।

महत्व

  • सर्व-मंत्र-शिरोमणि — हिन्दू परंपरा का सर्वोच्च मंत्र।
  • वैदिक प्रामाणिकता — सीधे ऋग्वेद से।
  • सूर्य-स्तुति — प्रत्यक्ष देवता का मंत्र।
  • बुद्धि-वर्धक‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ — बुद्धि-प्रेरणा का सूत्र।
  • उपनयन-संस्कार का केन्द्र।
  • भगवद्गीता-सम्मत — कृष्ण ने स्वयं इसे “छन्दसामहम्” कहा।

सामान्य प्रश्न

क्या गायत्री मंत्र केवल ब्राह्मणों का है?

ऐतिहासिक संदर्भ — मनुस्मृति काल में गायत्री-दीक्षा द्विजों (तीन वर्णों) तक सीमित मानी गई। आधुनिक काल — स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, गाँधी जी, श्री अरविंद — सभी ने यह मत दिया कि गायत्री सर्व-समावेशी है। आज सभी हिन्दू (और अनेक हिन्दू-इतर भी) इसका जप करते हैं।

क्या स्त्रियाँ गायत्री-जप कर सकती हैं?

हाँ। आधुनिक आचार्यों — स्वामी दयानंद से लेकर श्री अरविंद, स्वामी शिवानंद, स्वामी चिन्मयानंद — का स्पष्ट मत है कि स्त्रियाँ गायत्री का जप कर सकती हैं। ऐतिहासिक रूप से कुछ काल-खण्डों में परिहार रहा, परंतु यह वैदिक मूल का अंग नहीं। गायत्री स्वयं देवी-रूप हैं।

मंत्र में कितने अक्षर हैं?

२४ अक्षर — तीन पादों में, ८-८ अक्षर के। यही ‘गायत्री छंद’ की परिभाषा है। ‘ॐ’ एवं ‘भूर् भुवः स्वः’ को मूल छंद का अंग नहीं माना गया, परंतु जप में सम्मिलित किए जाते हैं।

सूर्य से क्या संबंध?

मंत्र सविता (सूर्य-सावित्री-शक्ति) को आहूत करता है। ‘सविता’ = वह जो प्रेरित करता है — सूर्य की किरणों से जैसे जीवन प्रेरित होता है, वैसे ही ‘सविता’ बुद्धि को प्रेरित करते हैं। अतः गायत्री सूर्य-स्तुति भी है, बुद्धि-प्रेरणा भी।

क्या इसे रोज जपना ज़रूरी है?

पारंपरिक मत में हाँ — त्रिकाल संध्या अनिवार्य कर्तव्य था। आधुनिक काल में नित्य-कर्म-व्यस्त के लिए दैनिक एक माला (१०८) पर्याप्त। यदि वह भी न हो तो दिन में ५ बार जप भी आदर्श।

मानसिक जप कितना फलदायी?

सर्वोच्च। शास्त्रों का स्पष्ट कथन — “मानसिक जप उपांशु से १००० गुना श्रेष्ठ; उपांशु वाचिक से १०० गुना श्रेष्ठ।” शुरुआत में बोलकर, फिर अंत में मानसिक — यह क्रमिक मार्ग।

बच्चों को कब सिखाएँ?

बच्चों को ५-६ वर्ष की आयु से ही गायत्री-मंत्र सिखाया जा सकता है। उच्चारण सरल — ‘ॐ भूर्भुवः स्वः, तत् सवितुर्वरेण्यं’। बच्चे शीघ्र पकड़ लेते हैं। उपनयन संस्कार (पारंपरिक रूप से ८ वर्ष के बालक का) इसी दीक्षा का संस्कार है।

अष्टोत्तर-शत-नाम के साथ कैसे संबंध?

गायत्री अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्रम् — गायत्री-देवी के १०८ नामों का स्तोत्र — गायत्री-जप के पूरक के रूप में पाठ्य।