श्री साईं मंत्र
By पारंपरिक (साईं भक्त परंपरा)२०वीं शताब्दीसंस्कृत-हिन्दी-मराठी
मूल पाठ
१. मूल मंत्र — सर्वाधिक प्रचलित
ॐ साईं राम।
यह सबसे सरल और सर्वाधिक प्रचलित साईं मंत्र है। साईं भक्त इसे हजारों-लाखों बार दोहराते हैं। एक मनके पर एक ‘ॐ साईं राम’ — १०८ की एक माला।
२. प्रणाम मंत्र (पंचाक्षर)
ॐ साईंनाथाय नमः।
पंचाक्षर मंत्र। पारंपरिक संस्कृत-शैली में रचा। पूजा के आरंभ में स्मरण।
३. सद्गुरु मंत्र (षडक्षर)
ॐ सद्गुरु साईंनाथाय नमः।
साईं को ‘सद्गुरु’ (सच्चे गुरु) के रूप में स्मरण। यह अधिक भावपूर्ण मंत्र है — बाबा को मात्र देवता नहीं, बल्कि जीवन-गुरु के रूप में स्थापित करता है।
४. महामंत्र (अष्टाक्षर)
ॐ श्री साईं राम जय जय साईं राम।
संगीतमय कीर्तन के लिए विशेष उपयुक्त। ‘जय जय’ की पुनरावृत्ति आनन्दमय भक्ति का संचार करती है।
५. साईं गायत्री
ॐ शिरडी वासाय विद्महे, सच्चिदानन्दाय धीमहि।
तन्नो साईं प्रचोदयात्॥
गायत्री मंत्र की तर्ज पर बना साईं-गायत्री। प्रात:-संध्या-सायं तीनों संधियों पर पाठ्य।
अर्थ — “हम शिरडी में निवास करने वाले उन साईं को जानते हैं; सच्चिदानन्द-स्वरूप का ध्यान करते हैं; वे साईं हमें (सत्-मार्ग पर) प्रेरित करें।”
६. बाबा का स्वयं का वचन — ‘अल्लाह मालिक’
अल्लाह मालिक। अल्लाह मालिक। अल्लाह मालिक।
बाबा स्वयं इसी का जप करते थे। अर्थ — ‘अल्लाह (ईश्वर) ही मालिक है।’ साईं की सर्व-धर्म-समभाव का सबसे संक्षिप्त रूप।
७. बाबा का अंतिम वचन
‘मैं तुम्हारे साथ हूँ, सदा तुम्हारे साथ।’
जप-मंत्र नहीं, परंतु बाबा का सर्वोच्च आश्वासन। संकट के समय इसी का स्मरण।
अर्थ
‘ॐ साईं राम’ — क्यों इतना प्रचलित?
यह मंत्र तीन शक्तियों का संगम है:
- ‘ॐ’ — सम्पूर्ण ब्रह्म का बीज-नाद
- ‘साईं’ — गुरु, ईश्वर, सहायक (फारसी), भगवान् (मराठी)
- ‘राम’ — सत् (होने का सत्य), हिन्दू-धर्म का सर्व-समावेशी नाम
बाबा स्वयं मस्जिद में रहते हुए ‘राम राम’ सुनते थे। उन्होंने ‘अल्लाह’ और ‘राम’ दोनों को एक माना। ‘ॐ साईं राम’ इसी एकत्व का सूत्र है।
सद्गुरु-मंत्र की विशेषता
‘सद्गुरु’ = सच्चा गुरु। साईं भक्ति में बाबा मात्र देवता नहीं — वे ‘जीवन के सद्गुरु’ हैं। यह मंत्र मानता है कि बाबा का संबंध शिष्य-गुरु का है — बाबा हर भक्त को व्यक्तिगत रूप से मार्ग दिखाते हैं।
साईं गायत्री का महत्व
पारंपरिक गायत्री मंत्र सूर्य-देव का है। साईं-गायत्री उसी छंद-संरचना में बाबा को आहूत करती है — ‘विद्महे’ (हम जानते हैं), ‘धीमहि’ (ध्यान करते हैं), ‘प्रचोदयात्’ (प्रेरित करें)। यह बाबा को वैदिक-स्तर का देवत्व प्रदान करती है, जो साईं-भक्ति परंपरा के विकास का संकेत है।
इतिहास
शिरडी के साईं बाबा (c. १८३८ — १५ अक्टूबर १९१८) एक सन्त थे जो अपने जीवन के अन्तिम लगभग साठ वर्ष महाराष्ट्र के शिरडी नामक छोटे गाँव में रहे। १५ अक्टूबर १९१८ को विजयादशमी के दिन उन्होंने महासमाधि ली। यहाँ संग्रहीत प्रमुख साईं मंत्रों में से लगभग सभी का अन्तिम रूप बाबा की महासमाधि के पश्चात् ही स्थिर हुआ — ये २०वीं शताब्दी में विस्फोटक गति से फैले साईं-भक्ति आन्दोलन की उपज हैं, विशेषतः गोविन्द राव रघुनाथ दाभोलकर (हेमाडपन्त) के श्री साईं सच्चरित्र (१९२२) के प्रकाशन के बाद।
‘अल्लाह मालिक’ एक बड़ा अपवाद है। यह बाबा का स्वयं का वचन था — ‘अल्लाह ही मालिक है।’ जीवन-भर वे इसी का बार-बार उच्चारण करते रहे, और हर धर्म के — हिन्दू, मुसलमान, पारसी — भक्तों ने उन्हीं से यह वाक्य अपनाया। साईं सच्चरित्र में यह वाक्य उन प्रमुख उच्चारणों में दर्ज है जिन्हें भक्त बाबा के निवास-स्थान द्वारकामाई में प्रवेश करते ही सुनते थे। यह एक वाक्य बाबा के सर्व-धर्म-समभाव को सबसे सघन रूप में दर्शाता है — किसी एक धर्म द्वारा स्वामित्व का अस्वीकार।
‘ॐ साईं राम’ — आज का सर्वाधिक प्रचलित साईं मंत्र — बाबा की महासमाधि के दशकों बाद, जब साईं भक्ति महाराष्ट्र से बाहर आन्ध्र, तमिलनाडु, उत्तर भारत, और प्रवासी समाज में फैली, तब इसका वर्तमान रूप उभरा। ‘साईं राम’ का यौगिक स्वयं हेमाडपन्त के विवरण में बाबा द्वारा भक्तों को दिये गये अभिवादन के रूप में आता है, जिसे बाबा ने भक्तों को अपनाने का निर्देश दिया था। वैदिक प्रणव ‘ॐ’ बाद में आचार्यों ने जोड़ा जिससे यह पूर्ण मन्त्र-स्तर का बना। आज ‘ॐ साईं राम’ विश्व भर के साईं भक्तों का सार्वभौम अभिवादन है — अनेक साईं-भक्ति परिवारों में ‘नमस्ते’ के स्थान पर इसी का प्रचलन है।
पञ्चाक्षर और षडक्षर प्रणाम — ‘ॐ साईंनाथाय नमः’ (पाँच अक्षर, प्रणव के बाद) और ‘ॐ सद्गुरु साईंनाथाय नमः’ (छह अक्षर) — संस्कृत के मानक देवता-नाम + नमः रूप का अनुसरण करते हैं। इन्हें १९३०-१९५० के दशकों में संस्कृत-प्रशिक्षित ब्राह्मण पुजारियों ने रचा, जब साईं-पूजा को औपचारिक पूजा-पद्धति में पिरोया जा रहा था — विशेषतः शिरडी के समाधि मन्दिर और इसके बढ़ते हुए सहयोगी मन्दिरों के तन्त्र में।
साईं गायत्री की रचना सबसे बाद की है। गायत्री छन्द और विद्महे / धीमहि / प्रचोदयात् की संरचना वैदिक है, परन्तु एक १९वीं-२०वीं शताब्दी के सन्त पर लागू की गई। साईं गायत्री संस्कृत-प्रशिक्षित साईं भक्तों ने उस समय रची जब साईं भक्ति अपनी विशिष्ट दैनिक सन्ध्या परम्परा के साथ एक स्वतन्त्र सम्प्रदाय का रूप ले रही थी। आज यह समाधि मन्दिर और सभी प्रमुख साईं मन्दिरों में मानक है।
मन्त्रों के साथ अक्सर उद्धृत किया जाने वाला एक और वचन — ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ, सदा तुम्हारे साथ’ — बाबा का प्रत्यक्ष उद्धरण है, जो साईं सच्चरित्र में दर्ज है। यह तकनीकी अर्थ में जप-मन्त्र नहीं है, परन्तु अनेक भक्तों के लिये यह वही भार वहन करता है — उपस्थिति का व्यक्तिगत संकल्प।
पाठ विधि
कब करें
- दैनिक प्रातः ब्रह्म-मुहूर्त (४:०० — ६:०० बजे) — सर्वोच्च समय
- गुरुवार — विशेष फलदायी
- साईं नवरात्रि के नौ दिनों में
- यात्रा-पूर्व अथवा कठिन कार्य से पूर्व
- रात्रि सोने से पूर्व — मन की शान्ति के लिए
- संकट काल में — बीच-बीच में मानसिक जप
कैसे करें
- एकाग्र मन से बैठें। आसन शुद्ध; मुख पूर्व अथवा उत्तर की ओर।
- साईं बाबा का चित्र अथवा पादुका सम्मुख रखें।
- तेल का दीप प्रज्वलन।
- रुद्राक्ष अथवा तुलसी की माला हाथ में लें।
- एक मनके पर एक ‘ॐ साईं राम’ — दाहिने हाथ के अंगूठे एवं मध्यमा से।
- एक माला (१०८) = एक चक्र।
- प्रतिदिन एक से सात मालाओं का संकल्प।
- जप के पश्चात एक से पाँच मिनट का मौन ध्यान — बाबा की उपस्थिति का अनुभव।
- अंत में ‘जय साईं राम’ का तीन बार उच्चारण।
विशेष विधियाँ
सरल विधि (दैनिक) — एक माला ‘ॐ साईं राम’। १०८ बार।
मध्यम विधि (साप्ताहिक) — गुरुवार को १००८ बार ‘ॐ साईं राम’।
दीर्घ विधि (अनुष्ठान) — ४१ दिनों तक प्रतिदिन ११ मालाएँ (११८८ बार)।
पुरश्चरण विधि — १,२५,००० बार ‘ॐ साईं राम’ — एक पूर्ण पुरश्चरण। यह कई महीनों का संकल्प है।
मन ही मन जप
पारंपरिक रूप से तीन प्रकार के जप हैं:
- वाचिक (बोलकर) — आरंभिक स्तर
- उपांशु (होंठ हिलाकर, बिना ध्वनि) — मध्यम स्तर
- मानसिक (मन ही मन) — सर्वोच्च स्तर
बाबा कहते — “जो मेरा मन ही मन स्मरण करता है, मैं उसके पास हूँ।” मानसिक जप कभी भी, कहीं भी संभव है — काम करते-करते, यात्रा में, रात-दिन।
महत्व
आधुनिक हिन्दू अभ्यास के सबसे सरल और सबसे सुलभ मन्त्रों में। जहाँ वैदिक मन्त्रों के लिये संस्कृत प्रशिक्षण, औपचारिक उपनयन, और शुद्ध उच्चारण की आवश्यकता है, वहाँ प्रमुख साईं मन्त्रों — विशेषतः ॐ साईं राम — के लिये इन में से किसी की आवश्यकता नहीं। बच्चा इसे सीख सकता है; निरक्षर भक्त इसे जप सकता है; किसी भी भाषा की पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति इसका अभ्यास कर सकता है।
फलश्रुति — भक्तों का अनुभूत अनुभव। बाबा के चारों ओर बीते एक शताब्दी में जो परम्परा विकसित हुई है, उसमें ॐ साईं राम के दैनिक जप के निम्नलिखित फल बताये जाते हैं — मानसिक शान्ति, अटके हुए सङ्कटों का सहज समाधान, शरीर और मन का आरोग्य, धन-वृद्धि (बाबा दीन-धन-दाता कहलाते हैं), गुरु-कृपा का अनुभव, और अन्त-समय में राम-नाम का स्मरण — जो अनेक हिन्दू परम्पराओं में मोक्ष-कुंजी है। श्री साईं सच्चरित्र के अनेक अध्यायों में बाबा के स्पष्ट कथन हैं — “जो मेरा नाम लेता है, मैं उसके साथ हूँ — सदैव। श्रद्धा से मेरा नाम जपो; तुम्हारे सब काम मैं करूँगा।” तथा “मेरा नाम सबसे महान् मन्त्र है। नाम से बढ़कर कोई औषधि नहीं।”
सर्व-धर्म-समभाव का प्रतीक। ‘अल्लाह मालिक’ से ‘ॐ साईं राम’ तक — साईं मन्त्र मिलकर हिन्दू आधुनिकता के एक विशिष्ट धार्मिक वचन को धारण करते हैं — यह दावा कि सभी धर्मों के ईश्वर-नाम एक साधक द्वारा सम्बोधित किये जा सकते हैं, बिना धर्म-परिवर्तन के, बिना श्रेणी-क्रम के। बाबा स्वयं एक मस्जिद में रहे जिसे उन्होंने द्वारकामाई (कृष्ण की द्वारका के नाम पर) कहा, एक निरन्तर पवित्र अग्नि जलाये रखी, उसकी राख को औषधि और आशीर्वाद दोनों के रूप में बाँटा, और हिन्दू-मुसलमान दोनों भक्तों के पास उत्तर दिया — यह सब मन्त्रों में सङ्क्षिप्त रूप में निहित है।
२४-घण्टे का अभ्यास। अनेक पारम्परिक पूजाओं के विपरीत जिनमें निश्चित समय, स्थान, और कर्म-शुद्धि की आवश्यकता है, ॐ साईं राम का जप चलते-फिरते, काम करते-करते, यात्रा में, सुख में, सङ्कट में — हर परिस्थिति में हो सकता है। बाबा द्वारा प्रोत्साहित मानसिक जप (मानसिक) मन्त्र को अनुसूचित कर्तव्य के बजाय निरन्तर साथी बनाता है। यही सुलभता बहुत हद तक कारण है कि साईं भक्ति इतनी दूर, इतनी जल्दी, इतने विभिन्न सामाजिक वर्गों में फैली है।
गुरु-शिष्य सम्बन्ध की स्थापना। अधिकांश हिन्दू देवता-मन्त्रों के विपरीत — जहाँ देवता की पूजा की जाती है किन्तु आवश्यक रूप से उनसे शिक्षा नहीं ली जाती — साईं मन्त्र बाबा को प्रत्येक भक्त के व्यक्तिगत जीवन के सद्गुरु के रूप में प्रस्तुत करते हैं। ‘सद्गुरु साईंनाथाय नमः’ मन्त्र विशेषतः इस व्यक्तिगत गुरु-शिष्य सम्बन्ध की पुष्टि करता है, जो साईं भक्ति को उसका भावनात्मक गहराई देता है।
अन्त-काल का सहारा। भगवद् गीता सिखाती है — अन्त-मतिः सा गतिः — “अन्त में जैसी मति, वैसी ही गति।” जिन भक्तों ने दशकों तक ॐ साईं राम को नित्य संस्कार बनाया है, वे पाते हैं कि नाम स्वतः ही सर्वाधिक आवश्यकता के क्षण में — रोग, शोक, मृत्यु — उठ आता है। यह मन्त्र-अभ्यास का सबसे गहन और सबसे व्यापक रूप से प्रमाणित आश्वासन है।
सामान्य प्रश्न
कौन सा साईं मंत्र सबसे श्रेष्ठ है?
‘ॐ साईं राम’ सबसे प्रचलित है — सरल, सशक्त, सार्वभौम। ‘सद्गुरु साईंनाथाय नमः’ भी विशेष फलदायी। चुनाव अपनी रुचि एवं श्रद्धा पर निर्भर — बाबा सब रूपों में स्वीकार करते हैं।
क्या मंत्र-दीक्षा आवश्यक है?
पारंपरिक तंत्र-शास्त्र में गुरु-दीक्षा अनिवार्य मानी गई है। परंतु साईं भक्ति में ‘श्रद्धा’ ही सर्वोपरि है। बाबा की दृष्टि में जो श्रद्धा से नाम लेता है, वह स्वयं दीक्षित है। यदि उपलब्ध हो तो किसी साईं-गुरु से दीक्षा लाभदायक, परंतु अनिवार्य नहीं।
कौन सी माला सर्वोत्तम?
रुद्राक्ष माला (शिव-स्वरूप, साईं को दत्तात्रेय अवतार माना गया — शिव अंश), तुलसी माला (विष्णु-स्वरूप), अथवा साधारण कमंडल माला भी पर्याप्त। १०८ मनकों की माला मानक है।
क्या स्त्रियाँ रजस्वला अवस्था में जप कर सकती हैं?
बाबा की दृष्टि में श्रद्धा सर्वोपरि। मानसिक जप सदैव अनुमत है। माला से जप करने में परंपरागत संकोच है, परंतु बाबा स्वयं इन प्रतिबंधों से ऊपर थे — अंतिम निर्णय स्वयं की श्रद्धा पर।
‘अल्लाह मालिक’ कह सकते हैं?
बिल्कुल। बाबा स्वयं इसी का जप करते थे। यह उनकी सर्व-धर्म-दृष्टि का सबसे शुद्ध रूप है। यदि घर का वातावरण न हो तो मन ही मन कह सकते हैं।
मंत्र की संख्या क्या मायने रखती है?
संख्या से अधिक गुणवत्ता महत्वपूर्ण। १०८ बार सावधानी एवं श्रद्धा से, १००० बार यांत्रिक रूप से अधिक श्रेष्ठ। परंतु संख्या-संकल्प से अनुशासन बनता है — दोनों का संतुलन आदर्श।
क्या एक से अधिक मंत्रों का जप कर सकते हैं?
हाँ। एक दिन में ‘ॐ साईं राम’ की एक माला, साईं गायत्री की पाँच आवृत्तियाँ, और ‘सद्गुरु साईंनाथाय नमः’ की तीन आवृत्तियाँ — सब किया जा सकता है। केवल एक मुख्य मंत्र चुनना आदर्श, परंतु अन्य मंत्र भी पाठ्य।
बच्चों को कौन सा मंत्र सिखाएँ?
‘ॐ साईं राम’ — सबसे सरल। बच्चे ३-४ वर्ष की आयु में भी यह मंत्र सीख जाते हैं। प्रतिदिन सोने से पहले ११ बार दोहराने का संकल्प कराएँ — जीवन-भर का संस्कार।