संकट मोचन हनुमानाष्टक
By गोस्वामी तुलसीदास16वीं शताब्दीअवधी
मूल पाठ
प्रथम चौपाई
बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो।।
देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
द्वितीय चौपाई
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि शाप दियो तब, चाहिय कौन बिचार बिचारो।।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
तृतीय चौपाई
अंगद के सँग लेन गये सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो।।
हेरि थके तट सिन्धु सबै तब, लाय सिया-सुधि प्राण उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
चतुर्थ चौपाई
रावन त्रास दई सिय को सब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो।।
चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
पंचम चौपाई
बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्रान तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो।।
आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
षष्ठ चौपाई
रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग की फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो।।
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
सप्तम चौपाई
बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि, देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो।।
जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत संहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
अष्टम चौपाई
काज किये बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसों नहिं जात है टारो।।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।
अर्थ
संकट मोचन हनुमानाष्टक आठ चौपाइयों का एक संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त सघन स्तोत्र है। प्रत्येक चौपाई किसी न किसी ऐसे प्रसंग का स्मरण कराती है जिसमें हनुमान जी ने किसी का गहरा संकट दूर किया था — और हर चौपाई इस एक टेक पर समाप्त होती है: “को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।” यही एक टेक — पुनरावृत्त होते हुए — स्तोत्र की आत्मा है।
चौपाइयों के प्रसंग संक्षेप में:
- बाल्यकाल का सूर्य-ग्रसन — हनुमान बालक रहते ही सूर्य को पका हुआ फल समझकर निगल गये; तीनों लोक अंधकार में डूब गये। देवताओं की प्रार्थना पर सूर्य को मुक्त किया।
- बाली का त्रास — सुग्रीव बाली के भय से ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे; मतंग ऋषि के शाप ने बाली का प्रवेश वहाँ निषिद्ध कर दिया था। ब्राह्मण-वेश में राम-लक्ष्मण को सुग्रीव के पास लाकर हनुमान ने मित्रता कराई।
- लंका में सीता-खोज — अंगद-समेत वानर दल सिन्धु तट पर थक गये; हनुमान ने ही समुद्र लाँघकर सीता का संदेश लाकर सबके प्राण बचाये।
- अशोक वाटिका में सीता-दर्शन — सीता ने रावण के त्रास से चिता प्रज्वलित कर आत्मदाह का संकल्प कर लिया था; हनुमान ने राम की मुद्रिका देकर उन्हें आश्वस्त किया।
- लक्ष्मण-मूर्च्छा और संजीवनी — मेघनाद के बाण से मूर्च्छित लक्ष्मण के प्राण बचाने हेतु हनुमान सुषेण वैद्य को घर सहित उठा लाये और संजीवनी-समेत द्रोणाचल पर्वत भी ले आये।
- नागपाश से मुक्ति — मेघनाद के नागपाश में राम सहित सम्पूर्ण सेना बँध गई थी; हनुमान ने गरुड़ का स्मरण कराकर बन्धन कटवाया।
- पाताल और अहिरावण-वध — अहिरावण राम-लक्ष्मण को पाताल ले गया था; हनुमान ने वहाँ जाकर देवी-पूजा भंग की और अहिरावण-सेना का संहार करके दोनों भाइयों को बचाया।
- समापन प्रार्थना — “देवताओं तक के बड़े-बड़े कार्य आपने किये, तो मेरा छोटा-सा संकट क्या आपके लिये कठिन है? हनुमान महाप्रभु, शीघ्र हमारे संकट हर लो।”
इतिहास
संकट मोचन हनुमानाष्टक की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की है — वही तुलसीदास जिन्होंने रामचरितमानस और हनुमान चालीसा की भी रचना की। रचनाकाल 16वीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। यह कृति विशेष रूप से उन सात-आठ अष्टकों में गिनी जाती है जिनमें तुलसीदास ने रामायण के विभिन्न प्रसंगों को सघन रूप में स्मरण किया है।
जनश्रुति है कि तुलसीदास ने यह स्तोत्र वाराणसी में रचा था, और वहीं काशी के दक्षिण भाग में स्थापित संकट मोचन मंदिर का सम्बन्ध भी इसी से जोड़ा जाता है। आज भी इस मन्दिर के परिसर में मंगलवार-शनिवार को इस अष्टक का सामूहिक पाठ होता है।
पाठ विधि
- दिन — मंगलवार और शनिवार प्रमुख हैं, परन्तु किसी भी दिन पाठ करना दोषरहित है।
- समय — प्रातः स्नान के बाद, या सायं सूर्यास्त से पूर्व।
- विधि — पूर्व अथवा उत्तर मुख होकर बैठें, हनुमान चित्र अथवा यंत्र के सम्मुख दीपक प्रज्वलित करें, फिर भावपूर्वक पाठ करें।
- पुनरावृत्ति — संकट के समय 11 बार या 21 बार पाठ करने की लोक-परम्परा है। नित्य एक पाठ पर्याप्त है।
- सहसंकल्प — हनुमान चालीसा के साथ इसका पाठ करने की प्रथा अनेक परिवारों में है। पहले चालीसा, फिर यह अष्टक।
महत्व
तुलसीदास द्वारा रचित अनेक हनुमान-स्तोत्रों में संकट मोचन हनुमानाष्टक का स्थान विशिष्ट है — इसके प्रयोजन की स्पष्टता के कारण। हनुमान चालीसा नित्य भक्ति का स्तोत्र है — किसी विशेष परिस्थिति के बिना भी पठित — एक निरन्तर श्रद्धांजलि। संकट मोचन अष्टक हस्तक्षेप का स्तोत्र है — जब कोई विशिष्ट संकट सामने हो, तब पठित। इस जोड़ी — एक नित्य उपस्थिति के लिये, दूसरा संकट-काल के लिये — पर ही हिन्दी-भाषी क्षेत्र की व्यावहारिक हनुमान-भक्ति टिकी है।
अष्टक में नामांकित आठ प्रसंग यादृच्छिक नहीं हैं। प्रत्येक रामायण से एक आदर्श संकट है — बाल्यकाल की दुर्घटना, छिपा हुआ भय, खोये हुए प्रियजन, मूर्च्छित भाई, पाताल में बन्धन। इन सब को मिलाकर भक्त के सामने आने वाले विविध संकटों का एक लघु कोश बनता है, जिसमें प्रत्येक संकट का मोचक स्वयं हनुमान हैं। स्तोत्र-पाठ इस अर्थ में आत्म-विश्वास का अभ्यास है — स्वयं को यह स्मरण कराना कि मानवीय संकट का हर प्रकार हनुमान द्वारा पहले ही समाप्त किया जा चुका है; यह भी टलेगा।
वाराणसी के संकट मोचन मन्दिर से इस स्तोत्र का सम्बन्ध, चार शताब्दियों से, इसे भारतीय भक्ति-जीवन में सबसे संस्थागत रूप से बद्ध स्तोत्रों में से एक बनाता है। तुलसीदास का वर्तमान मन्दिर-स्थल पर हनुमान-दर्शन, और स्वयं तुलसीदास द्वारा मन्दिर की स्थापना — इन दोनों ने इस स्तोत्र को एक स्थायी भौतिक केन्द्र दिया है। मन्दिर में मंगलवार-शनिवार के सार्वजनिक पाठ तुलसीदास के समय से अबाध रूप से चलते आ रहे हैं। यह स्तोत्र हिन्दी क्षेत्र के लगभग हर पारिवारिक चालीसा-संग्रह पुस्तक में, रेडियो भजन संकलनों में, और अनगिनत मन्दिरों के प्रातः लाउडस्पीकर प्रसारणों में मिलता है।
आधुनिक काल में अष्टक के संगीतमय रूपान्तरण ने इसे मन्दिर-परिसरों से निकालकर पूरे भारत और प्रवासी समाज के घरों और गाड़ियों तक पहुँचाया है। कोई हिन्दी-भाषी परिवार बहुत कम ही होगा जो कम-से-कम इस टेक — “को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो” — को न गुनगुना सके।
सामान्य प्रश्न
संकट मोचन हनुमानाष्टक की रचना किसने की है?
इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की है, जो 16वीं शताब्दी के सबसे प्रसिद्ध रामभक्त कवि-सन्त थे। रामचरितमानस और हनुमान चालीसा भी इन्हीं की कृतियाँ हैं।
इस स्तोत्र में कुल कितनी चौपाइयाँ हैं?
इसमें कुल आठ चौपाइयाँ हैं — इसी कारण इसे “अष्टक” कहा जाता है। प्रत्येक चौपाई हनुमान के किसी एक प्रसंग का संक्षिप्त वर्णन कर एक स्थिर टेक — “को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो” — पर समाप्त होती है।
हनुमान चालीसा और संकट मोचन अष्टक में क्या अन्तर है?
हनुमान चालीसा हनुमान के सम्पूर्ण व्यक्तित्व, गुणों, और कृपा का चालीस-चौपाई का वर्णन है। संकट मोचन अष्टक केवल आठ चौपाइयों में हनुमान के संकट-मोचन रूप पर केंद्रित है — हर चौपाई एक विशिष्ट प्रसंग में संकट-निवारण को रेखांकित करती है।
इस स्तोत्र का पाठ किस समस्या में विशेष फलदायी माना जाता है?
परम्परा में यह उन परिस्थितियों के लिये विशेष माना जाता है जहाँ चारों ओर मार्ग बन्द दिखाई दे — गहरा संकट, अकस्मात् विपत्ति, अथवा किसी प्रियजन की पीड़ा। आठों चौपाइयों के प्रसंग ही इस ओर संकेत हैं कि “जब किसी से कोई हल न निकले, तब हनुमान-स्मरण से निकलता है।”
क्या इसका पाठ स्त्रियाँ भी कर सकती हैं?
हाँ। स्तोत्र में स्वयं कोई शास्त्रीय प्रतिबन्ध नहीं है। अधिकांश समकालीन गुरुजन इसकी पुष्टि करते हैं कि स्तोत्र-पाठ में लिंग, जाति, अथवा आयु का बन्धन नहीं है।
इस अष्टक का पाठ कितनी बार करना चाहिये?
नित्य एक पाठ की प्रथा है। विशेष संकल्प हेतु 11 या 21 बार पाठ किया जाता है। मंगलवार-शनिवार को हनुमान चालीसा के साथ इसका पाठ अनेक परिवारों में परम्परा है।