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श्री सूक्तम्

By वैदिक ऋषि (खिल सूक्त — ऋग्वेद)वैदिक काल (१५००–१००० ईसा पूर्व)वैदिक संस्कृत

7 min readLast reviewed May 2, 2026

मूल पाठ

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥२॥

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥३॥

कांसोऽस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥४॥

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥५॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥६॥

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥७॥

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥८॥

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥९॥

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥१०॥

कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥११॥

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥१२॥

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१३॥

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१४॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम्॥१५॥

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥१६॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

अर्थ

श्री सूक्तम् वेदों का सर्वाधिक प्राचीन लक्ष्मी-स्तोत्र है। यह मात्र स्तुति नहीं — एक हवन-सूक्त है। इसमें भक्त जातवेद (अग्निदेव) से प्रार्थना करता है कि वे माँ लक्ष्मी को आहूत कर मेरे घर ले आएँ। यही सूक्त की अनूठी विशेषता है।

ऋचा १ — हे जातवेद (अग्नि), स्वर्णवर्णा, हरिणी जैसी, सोने-चाँदी की मालाओं वाली, चंद्र-समान, सोने-सी लक्ष्मी को मेरे लिए आवाहन करो।

ऋचा २ — हे जातवेद, उस लक्ष्मी को बुलाओ जो जाने वाली नहीं — जिसके प्रसाद से मैं स्वर्ण, गाय, अश्व, और पुरुष (सहायक) प्राप्त करूँ।

ऋचा ३ — आगे अश्व-वाली, मध्य में रथ, हाथियों के नाद से जागने वाली — श्री देवी का मैं उपह्वान करता हूँ। श्री देवी मुझ पर प्रसन्न हों।

ऋचा ४ — मधुर-स्मित, सोने के प्राकार वाली, आर्द्र, ज्वलित, तृप्त, तर्पण करने वाली — पद्म पर बैठी, पद्म-वर्णा — उस श्री को मैं आवाहन करता हूँ।

ऋचा ५ — चंद्रवत् प्रभा-मय, यश से ज्वलित, लोक में देवों द्वारा सेवित, उदार — उस पद्मिनी की शरण में मैं जाता हूँ। मेरी अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) नष्ट हो; तुम्हें मैं वरण करता हूँ।

ऋचा ६ — आदित्यवर्णा, तप से उत्पन्न तुम्हारा वनस्पति-वृक्ष बिल्व है। उसके फल मेरी आंतरिक माया-बाधाओं और बाहरी अलक्ष्मी का नाश करें।

ऋचा ७ — हे देव-सखा (कुबेर), कीर्ति, और मणि — सब मेरे पास आओ। मैं इस राष्ट्र में प्रकट हुआ हूँ — मुझे कीर्ति और ऋद्धि दो।

ऋचा ८ — भूख-प्यास से मलिन, ज्येष्ठा (दरिद्रता) रूप अलक्ष्मी का मैं नाश करता हूँ। अभाव और असमृद्धि सब मेरे घर से बाहर निकलें।

ऋचा ९ — गंध-द्वारा (सुगंध-वाहिनी), दुर्धर्ष (अपराजेय), नित्य-पुष्ट, गोबर-समान (कृषि-समृद्धि की प्रतीक), समस्त भूतों की ईश्वरी — उस श्री का मैं आवाहन करता हूँ।

ऋचा १० — मन का काम (इच्छा), आकूति (संकल्प), वाणी का सत्य — हम पाएँ। पशुओं का रूप, अन्न का रूप — श्री मुझ में स्थित हो; यश मुझ में हो।

ऋचा ११ — हे कर्दम (लक्ष्मी के पुत्र), तुम मुझ में उत्पन्न हो। पद्ममालिनी माँ श्री को मेरे कुल में बसाओ।

ऋचा १२ — जल स्निग्ध-तत्त्वों को उत्पन्न करें। हे चिक्लीत (एक अन्य लक्ष्मी-पुत्र), मेरे घर में बसो। माता श्री को मेरे कुल में स्थित करो।

ऋचा १३ — आर्द्र, पुष्करिणी (कमलों से युक्त), पुष्टि-स्वरूप, पिंगल-वर्णा, पद्ममालिनी, चंद्र-समान, सोने-सी लक्ष्मी को हे जातवेद, मेरे लिए आवाहन करो।

ऋचा १४ — आर्द्र, हाथी-वाहना, यष्टि (दण्ड)-धारिणी, स्वर्ण-वर्णा, हेम-माला से युक्त, सूर्य-समान, सोने-सी लक्ष्मी को हे जातवेद, मेरे लिए आवाहन करो।

ऋचा १५ — हे जातवेद, उस अनपगामिनी (न जाने वाली) लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाओ — जिसके प्रसाद से मैं प्रचुर स्वर्ण, गाय, दासियाँ, अश्व, और पुरुष पाऊँ।

ऋचा १६ (फलश्रुति) — जो शुद्ध और संयमित होकर प्रतिदिन घी की आहुति देता है, और श्री-कामी होकर इन पन्द्रह ऋचाओं का सतत जप करता है — वही श्री-प्राप्ति करता है।

इतिहास

श्री सूक्तम् ऋग्वेद के खिल भाग (परिशिष्ट) में स्थित है। यह वैदिक काल (१५००–१००० ईसा पूर्व) की रचना है — अर्थात् लक्ष्मी की यह सबसे प्राचीन स्तुति है। पुराण-काल के लक्ष्मी-स्तोत्रों (अष्टकम्, चालीसा, कनकधारा) से यह कई शताब्दियाँ पहले की रचना है।

ऋषि एवं देवता — परंपरागत रूप से इसके ऋषि आनन्दकर्दम, चिक्लीत, और इन्दिरा सुत माने जाते हैं — जो स्वयं लक्ष्मी के पुत्र-पुत्रियाँ कहे जाते हैं। देवता श्री (लक्ष्मी), छंद त्रिष्टुप् एवं अनुष्टुप् का संमिश्रण।

मुख्य विशेषता — हवन-मंत्र — यह सूक्त अग्नि (जातवेद) से लक्ष्मी का आवाहन है। हवन-कुण्ड में अग्नि प्रज्वलित कर, इसी सूक्त से आहुतियाँ दी जाती हैं — विशेष रूप से बिल्व-पत्र, घी, और काले तिल की।

दार्शनिक आधार — सूक्त का वैदिक दृष्टिकोण द्वैत है — एक ओर श्री (कल्याण), दूसरी ओर अलक्ष्मी (दुर्भाग्य, ज्येष्ठा)। ऋचा ८ में स्पष्ट है — ‘अलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्’ — अलक्ष्मी का नाश। यह केवल धन की नहीं, दुर्भाग्य से रक्षा की भी प्रार्थना है।

आधुनिक प्रचलन — आज भी:

  • तिरुपति बालाजी मंदिर के अनेक अनुष्ठानों में
  • दक्षिण भारत के सभी प्रमुख लक्ष्मी मंदिरों में
  • दीपावली के लक्ष्मी-यज्ञ में
  • गृह-प्रवेश एवं व्यापार-शुभारंभ के यज्ञों में

— इसी सूक्त की आहुतियाँ दी जाती हैं।

हवन / पाठ विधि

कब करें

  • दीपावली — विशेष रूप से लक्ष्मी-कुबेर पूजन के साथ
  • शरद पूर्णिमा, धनतेरस
  • शुक्रवार — साप्ताहिक पाठ
  • गृह-प्रवेश, व्यापार-आरंभ, विवाह के अवसरों पर
  • दैनिक प्रातः पाठ (बिना हवन के भी)

हवन विधि (विस्तृत)

  1. हवन कुण्ड स्थापित करें — पीतल, ताम्र, या मिट्टी का।
  2. अग्नि प्रज्वलन — आम की लकड़ी एवं गाय के घी से।
  3. गणपति-स्तुति से प्रारंभ।
  4. संकल्प — अपने नाम-गोत्र-तिथि का उच्चारण कर मनोकामना का संकल्प।
  5. एक-एक ऋचा का उच्चारण कर आहुति दें — आहुति-सामग्री में:
    • गाय का घी (मुख्य)
    • बिल्व-पत्र (विशेष — ऋचा ६ के अनुसार)
    • काले तिल
    • अक्षत (बिना टूटे चावल)
    • खीर (विशेष आहुति के लिए)
  6. प्रत्येक आहुति के पश्चात ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण।
  7. १६ ऋचाओं के पश्चात पूर्णाहुति (अंतिम बड़ी आहुति) — एक नारियल, घी, और मिष्ठान्न के साथ।
  8. शान्ति-पाठ से समापन।

सरल विधि (बिना हवन के)

जिनके पास हवन की सुविधा नहीं, वे:

  1. लक्ष्मी प्रतिमा/श्री यंत्र के सम्मुख दीप जलाएँ
  2. सूक्त का स्पष्ट पाठ करें
  3. प्रत्येक ऋचा के साथ एक तुलसी पत्र, बिल्व पत्र, या पुष्प अर्पण करें
  4. १६वीं ऋचा के पश्चात पंचांग प्रणाम करें

विशेष — ‘१२५००० बार जप’ (पुरश्चरण)

ज्योतिषीय अनुष्ठान में सम्पूर्ण श्री सूक्त का १२५००० बार जप एक ‘पुरश्चरण’ माना जाता है। यह वर्षों का प्रयास है और किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही किया जाता है।

महत्व

  • वैदिक प्रामाणिकता — यह सीधे ऋग्वेद की रचना है; पुराणिक स्तोत्रों से पूर्ववर्ती।
  • हवन-केंद्रित — मात्र पाठ नहीं, अग्नि-होम का सूक्त।
  • ‘अलक्ष्मी नाश’ का मंत्र — दरिद्रता-दुर्भाग्य से प्रत्यक्ष मुक्ति की प्रार्थना (ऋचा ८)।
  • सम्पूर्ण समृद्धि — स्वर्ण, गाय, अश्व, अन्न, पशु, यश, कीर्ति — सब इसमें माँगे गए हैं।
  • बिल्व-वृक्ष का संदर्भ — ऋचा ६ में बिल्व को लक्ष्मी का वृक्ष बताया गया है, जो आज की पूजा-परंपरा का आधार है।

सामान्य प्रश्न

क्या यह सूक्त बिना हवन के पढ़ा जा सकता है?

बिलकुल। हवन का विधान आदर्श है, परंतु केवल पाठ भी फलदायी है। ऋचा १६ में ‘जप’ का स्पष्ट उल्लेख है — ‘श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्’। श्री-इच्छुक को इन पन्द्रह ऋचाओं का सतत जप करना चाहिए।

१६ या १५ ऋचाएँ?

मूल सूक्त में १५ ऋचाएँ हैं (ऋचा १६ फलश्रुति है)। पुरश्चरण-गणना में १५ ऋचाएँ ही गिनी जाती हैं।

स्त्रियाँ श्री सूक्त पाठ कर सकती हैं?

हाँ। आधुनिक शास्त्र-व्याख्याकारों में आम सहमति है कि स्त्रियाँ सभी वैदिक मंत्रों का पाठ कर सकती हैं। ‘गृह-कीर्ति’ एवं ‘मातृत्व’ सूक्त की केंद्रीय अवधारणाएँ हैं — स्त्री-सहभागिता स्वाभाविक है।

क्या इसे बिना उच्चारण सीखे पढ़ा जा सकता है?

वैदिक मंत्र उदात्त-अनुदात्त-स्वरित स्वरों में होते हैं। आदर्श यह है कि किसी वेद-पाठी से शुद्ध उच्चारण सीखा जाए। यदि यह संभव न हो, तो भी श्रद्धा से स्पष्ट पाठ फलदायी है — परंतु शुद्ध पाठ से प्रभाव कई गुना बढ़ता है।

बिल्व-पत्र की क्या भूमिका?

ऋचा ६ में बिल्व को ‘तपसोऽधिजात वृक्ष’ कहा गया है — माँ लक्ष्मी का वृक्ष। आज भी हवन में बिल्व-पत्र की आहुति विशेष फलदायी मानी जाती है। शिव-पूजा में बिल्व का अर्पण (शिव को बिल्व प्रिय है) से इसका स्रोत यही सूक्त है।

सूक्त की आधुनिक रिकॉर्डिंग कौन सी श्रेष्ठ है?

पं. रविशंकर शर्मा (वाराणसी) एवं पं. वेंकट कृष्णा घनपाठी (तिरुपति) के उच्चारण-शुद्ध संस्करण व्यापक रूप से उपलब्ध हैं। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का संगीतमय संस्करण भी प्रसिद्ध है, परंतु उसमें कुछ विधि-शिथिलता है।

क्या यह सूक्त केवल धन के लिए है?

नहीं। ‘श्री’ का अर्थ केवल धन नहीं — सर्वांगीण कल्याण है। अन्न, संतान, यश, कीर्ति, गृह-शान्ति — सब ‘श्री’ के अंग हैं। दरिद्रता का बाह्य-आंतरिक नाश और कल्याण की पूर्ण स्थापना — यही सूक्त का उद्देश्य है।