श्री सूर्य देव की आरती
By पारंपरिक (अज्ञात रचयिता)१९वीं–२०वीं शताब्दीखड़ी बोली
मूल पाठ
ॐ जय कश्यप-नन्दन, जय अदिति-नन्दन।
त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
सप्त अश्व रथ राजित, एक चक्र धारी।
दुख-हर्ता सुख-कर्ता, मानव-सुखकारी॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
स्वर्ण-वर्ण कंचन-रत्न, कंकण-कुण्डल धारी।
मुकुट सुशोभित मस्तक, हाथ कमल भारी॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, तुम तीन रूप हो।
सत्व रजस् तम भेदी, कारण-स्वरूप हो॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
प्रातः-काल अरुण उदय, मध्याह्न तपते हो।
संध्या-अस्ताचल जात, फिर भी ज्ञानी हो॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
जो जल अर्पण करते, अर्घ्य-समर्पण से।
उनको आरोग्य देते, सूर्य कृपा से॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
रविवार के व्रत से, फल-आहार रखते।
सूर्य कृपा से जीवन, सुख-समृद्धि भरते॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
छठ-पूजा का पर्व, बिहारियों का प्यारा।
चार दिन तक संयम, अर्घ्य से उद्धारा॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
राम-कृष्ण के प्रेरणा-स्रोत, सूर्य-वंश-धारी।
दशरथ-कुन्ती-गर्भ से, अवतार बहारी॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
जो भक्त गाये आरती, श्रद्धा से तेरी।
रोग-शोक संकट सब, दूर भागते भेरी॥
ॐ जय सूर्य भगवान्॥
ॐ जय कश्यप-नन्दन, जय अदिति-नन्दन।
त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥
अर्थ
यह आरती सूर्य देव की महिमा, स्वरूप, परिवार-संदर्भ, और कृपाओं का संक्षिप्त वर्णन है। संरचना सरल — आठ अंतरे, और प्रत्येक के अंत में टेक ‘ॐ जय सूर्य भगवान्’ की पुनरावृत्ति।
टेक — हे कश्यप-नंदन (कश्यप ऋषि के पुत्र), हे अदिति-नंदन (अदिति-माता के पुत्र), तुम्हारी जय हो। तीनों लोकों के अंधकार के नाशक, भक्तों के हृदय में चंदन-सुगंध समान।
अंतरा १ — सात घोड़ों से जुते एक-चक्र वाले रथ पर विराजमान। दुखों के हरने वाले, सुखों के देने वाले, मानवों के सुखकारी।
अंतरा २ — स्वर्ण-वर्ण, कंचन-रत्नों से सजे, कंकण-कुण्डल धारी। माथे पर मुकुट सुशोभित, हाथ में कमल।
अंतरा ३ — ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर — तीनों रूप तुम्हारे हैं। सत्त्व-रजस्-तम तीनों गुणों के भेदक; सर्व-कारण-स्वरूप।
अंतरा ४ — प्रात:काल अरुण-उदय, मध्याह्न तपते हुए, संध्या में अस्ताचल — सब अवस्थाओं में ज्ञानी।
अंतरा ५ — जो जल अर्पण कर अर्घ्य देते हैं, उन्हें सूर्य कृपा से आरोग्य प्राप्त होता है।
अंतरा ६ — रविवार के व्रत में फल-आहार। सूर्य कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि।
अंतरा ७ — छठ पूजा बिहार-झारखंड का प्यारा पर्व। चार दिनों का संयम, अर्घ्य-दान से जीवन-उद्धार।
अंतरा ८ — राम और कृष्ण के प्रेरणा-स्रोत, सूर्य-वंशी। दशरथ (राम-पिता) और कुन्ती (कर्ण-माता) — सब के अवतार।
अंतरा ९ (फलश्रुति) — जो भक्त श्रद्धा से आरती गाता है, उसके रोग-शोक-संकट दूर भागते हैं।
इतिहास
सूर्य आरती की यह विशेष रचना १९वीं-२०वीं शताब्दी की है, परंतु सूर्य-वंदना का इतिहास वैदिक काल तक जाता है। गायत्री मंत्र स्वयं सूर्य-स्तुति है।
‘ॐ जय सूर्य भगवान्’ की धुन ‘जगदीश हरे’ की लोकप्रिय धुन से प्रेरित। उत्तर भारत के सूर्य-मंदिरों में दैनिक संध्या-आरती।
पौराणिक संदर्भ:
- कश्यप-नन्दन — कश्यप ऋषि के पुत्र; पुराणों में सूर्य कश्यप एवं अदिति के पुत्र हैं।
- अदिति-नन्दन — अदिति-माता के पुत्र; इसी से सूर्य का नाम ‘आदित्य’।
- सूर्य-वंश — दशरथ-राम-वंश सूर्यवंशी; भीष्म, युधिष्ठिर, भगीरथ, सत्यवती के पुत्र वेदव्यास — सब सूर्य-वंश से।
- कुन्ती-कर्ण कथा — कर्ण कुन्ती और सूर्य के पुत्र; महाभारत के तेज-स्वरूप योद्धा।
आधुनिक प्रचलन — आज:
- सूर्य मंदिरों में दैनिक संध्या आरती
- छठ पूजा के समय अर्घ्य के पश्चात
- रथ सप्तमी के विशेष पूजन में
- रविवार-व्रत के पश्चात
- गृह-पूजन में सूर्य-दर्शन के पश्चात
— सर्वत्र गाई जाती है।
आरती गायन विधि
कब करें
- दैनिक संध्या आरती — सूर्यास्त से पूर्व
- रविवार — विशेष पूजन के पश्चात
- रथ सप्तमी, छठ पूजा, मकर संक्रांति — विशेष पर्व
- सूर्य ग्रहण के पश्चात
- यात्रा से पूर्व, परीक्षा से पूर्व, कठिन कार्य से पूर्व
कैसे करें
- सूर्य के पूजन के पश्चात आरती गाई जाती है — गायत्री मंत्र, सूर्य चालीसा, अथवा आदित्य हृदयम् के बाद।
- थाली में पाँच बातियों का घी का दीप, धूप, लाल पुष्प, अक्षत।
- दीप प्रज्वलन के साथ आरती आरंभ।
- आरती गाते हुए दीपक को क्लॉकवाइज़ घुमाते हुए सात बार चक्र पूर्ण करें।
- घंटी, ताली, अथवा शंख से ताल मिलाएँ।
- पूर्व दिशा की ओर मुख कर खड़े हों।
- आरती के पश्चात पुष्पांजलि अर्पण।
- लाल चंदन का तिलक माथे पर।
- प्रसाद वितरण — गुड़, खजूर, फल।
वाद्य संगति
पारंपरिक रूप से हारमोनियम, तबला, मंजीरा, ढोलक, और शंख के साथ। शंख-ध्वनि सूर्य-पूजन के लिए विशेष शुभ मानी जाती है।
महत्व
- ‘जगदीश हरे’ की प्रसिद्ध धुन — सर्व-परिचित।
- सूर्य के पारिवारिक संदर्भ — कश्यप-अदिति का स्मरण।
- सूर्य-वंश की प्रतिष्ठा — राम-कृष्ण-कर्ण के साथ संबंध।
- छठ पूजा का स्मरण — विशेषकर बिहारी-झारखंडी भक्तों के लिए।
- त्रि-गुण भेदक — सत्व-रजस्-तम के परे का संकेत।
सामान्य प्रश्न
क्या यह आरती और ‘जगदीश हरे’ की धुन एक है?
हाँ। ‘जगदीश हरे’ की लोकप्रिय धुन उत्तर-भारत की मानक आरती-धुन है। यह आरती भी इसी धुन में गाई जाती है। एक बार ‘जगदीश हरे’ सीख लेने पर सरलता से गायी जा सकती है।
कितनी बार दीपक घुमाएँ?
पारंपरिक विधि — सात बार — चार बार पैरों के समीप, दो बार नाभि के समीप, एक बार मुख के समीप। संक्षिप्त विधि में पाँच बार पर्याप्त।
बच्चों को आरती कैसे सिखाएँ?
टेक — ‘ॐ जय सूर्य भगवान्, स्वामी जय सूर्य भगवान्’ — को बार-बार दोहराएँ। शेष अंतरे धीरे-धीरे जोड़ें।
क्या यह आरती केवल सूर्य-मंदिर में ही गाई जाती है?
नहीं। घर-घर में सूर्य-पूजन के साथ। विशेषकर रविवार, छठ, और रथ-सप्तमी पर। सामान्य गृह-पूजन में सूर्य-दर्शन के पश्चात भी।
क्या स्त्रियाँ रजस्वला अवस्था में आरती गा सकती हैं?
मानसिक गायन एवं दूर से दर्शन सदैव अनुमत। केवल स्पर्श-पूजा एवं दीपक-धारण से बचें। आधुनिक अधिकांश आचार्य मानसिक स्मरण को सर्वदा श्रेष्ठ मानते हैं।
प्रसाद में क्या उपयुक्त?
गुड़, खजूर, फल, ठेकुआ (विशेषकर छठ पूजा में), लाल मिष्ठान्न। सूर्य को लाल रंग प्रिय है — लाल चंदन, लाल पुष्प, लाल वस्त्र — सब उपयुक्त।
क्या आरती के साथ कोई अन्य आरती भी गानी चाहिए?
संध्या-काल में पारंपरिक क्रम: (१) सूर्य चालीसा / आदित्य हृदयम् / गायत्री मंत्र; (२) यह सूर्य आरती; (३) ‘ॐ जय जगदीश हरे’ — सर्व-देव-वंदना के रूप में अंत में।
सूर्य ग्रहण के पश्चात क्यों?
सूर्य ग्रहण को पारंपरिक रूप से सूर्य पर संकट का काल माना गया। ग्रहण के पश्चात स्नान कर सूर्य-दर्शन एवं आरती से पुनः-स्थापना का भाव होता है।