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कनकधारा स्तोत्रम्

By आदि शंकराचार्य८वीं शताब्दी ईस्वीसंस्कृत

7 min readLast reviewed May 2, 2026

मूल पाठ

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥१॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥२॥

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्
आनन्दहेतुरधिकं मधुविद्विषोऽपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥३॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥४॥

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥५॥

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्
धाराधरे स्फुरति या तटिदङ्गनेव।
मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः॥६॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावान्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः॥७॥

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः॥८॥

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः॥९॥

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै॥१०॥

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै॥११॥

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै॥१२॥

अर्थ

यह स्तोत्र माँ लक्ष्मी से ‘अपांग-लीला’ अर्थात् ‘कटाक्ष-दृष्टि’ की प्रार्थना है। शंकराचार्य पुनः-पुनः कहते हैं — माँ! तुम्हारी आधी दृष्टि भी मुझ पर पड़ जाए तो मेरा कल्याण हो जाएगा।

छंद १ — हरि के अंग को आश्रय किये हुए माँ — जैसे भ्रमरी तमाल के मुकुल को आश्रय देती है — सब विभूतियों को धारण करने वाली, अपांग-लीला से मेरा मंगल करें।

छंद २ — मुरारी के मुख की ओर बार-बार लज्जा-प्रेम से जाती-आती दृष्टि — जैसे महोत्पल पर भ्रमर — वह सागर-सम्भवा (समुद्र-जा) मुझे श्री प्रदान करे।

छंद ३ — विश्व के अमरेन्द्रों को पद देने में दक्ष, मधुसूदन को भी अधिक आनन्द देने वाली — माँ की वही आधी दृष्टि, इन्दीवर के समान — मुझ पर क्षण भर ठहर जाए।

छंद ४ — आधी मूँदी आँखों से आनंद-कन्द मुकुन्द को निहारते हुए, अनिमेष, अनंग-तन्त्र — शयनशायी (विष्णु) की पत्नी का दृष्टि-चमत्कार मेरे ऐश्वर्य का कारण बने।

छंद ५ — मधु-जित (विष्णु) की भुजाओं के बीच कौस्तुभ-मणि से युक्त वक्षस्थल पर हीराहार-समान शोभित — कमल-आलया (लक्ष्मी) की कटाक्ष-माला मेरा कल्याण लाए।

छंद ६ — काले मेघ-समान कैटभारी (विष्णु) के वक्ष पर तड़ित (बिजली) के समान चमकती — विश्वमाता की महनीय मूर्ति, भृगुनन्दना (लक्ष्मी), मुझे भद्र (कल्याण) प्रदान करे।

छंद ७ — जिनकी कृपा से मन्मथ (कामदेव) ने प्रथम पद प्राप्त किया — वही मन्द, आलस्य-भरी, मकरालया (समुद्र) की कन्या की आधी दृष्टि मुझ पर पड़े।

छंद ८ (कनकधारा का केन्द्रीय छंद) — हे माँ! दया रूपी पवन से प्रेरित — द्रविण (धन) की अम्बु-धारा (जलधारा) — इस अकिञ्चन (निर्धन) विहंग-शिशु (पक्षी-बच्चे) पर बरसाओ। मेरे दुष्कर्मों के घर्म (ताप) को दूर करो, हे नारायण-प्रणयिनी की नयन-अम्बु-वाह (अश्रु-धारा)।

छंद ९ — जिनकी दया-आर्द्र दृष्टि से विशिष्ट-मति वाले भी त्रिविष्टप (स्वर्ग) पद को सहज पाते हैं — वही पुष्करविष्टरा (कमल पर बैठी हुई) की दृष्टि मुझे पुष्टि (वृद्धि) प्रदान करे।

छंद १० — जो गीर्देवता (वाणी की देवी), गरुडध्वज-सुंदरी (विष्णु की प्रिया), शाकम्भरी (अन्न-दात्री), शशि-शेखर-वल्लभा (शिव की प्रिया, पार्वती) — सृष्टि-स्थिति-प्रलय की लीलाओं में संस्थित — त्रिभुवन की एक गुरु — उन तरुण माँ को नमस्कार।

छंद ११ — श्रुति को नमस्कार, रति को नमस्कार, शक्ति को नमस्कार, पुष्टि को नमस्कार। (माँ इन सभी रूपों में हैं)।

छंद १२ — कमल-समान मुख वाली को नमस्कार, क्षीर सागर से जन्मी को नमस्कार, चंद्रामृत की सहोदरा को नमस्कार, नारायण की प्रिया को नमस्कार।

इतिहास — कनकधारा की कथा

आदि शंकराचार्य (८वीं शताब्दी ईस्वी) की युवावस्था की एक प्रसिद्ध कथा है। बाल-संन्यासी शंकर अपने आचार्य गोविन्द भगवत्पाद के आश्रम में रहते हुए दैनिक भिक्षा पर निर्भर थे।

एक दिन वे एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण-स्त्री के घर भिक्षा के लिए गए। घर में देने को कुछ भी नहीं था। दीर्घ खोज के पश्चात् उस सती ने एक सूखा आँवला (अमलक) पाया, जो वह स्वयं खाने वाली थी। यही उसने काँपते हाथों से शंकराचार्य को अर्पित किया।

युवा शंकर इस गरीब लेकिन निःस्वार्थ सेवा से इतने भाव-विभोर हुए कि उन्होंने वहीं खड़े-खड़े कनकधारा स्तोत्रम् की रचना की — माँ लक्ष्मी से प्रार्थना करते हुए कि इस सती के पूर्व जन्म के दुर्भाग्य को दूर करें।

स्तोत्र के पाठ के पश्चात्, माँ लक्ष्मी ने स्वयं प्रकट होकर शंकर से कहा कि उस स्त्री ने पूर्व जन्मों में कोई दान नहीं किया, अतः इस जन्म में निर्धन है। परंतु शंकर के स्तोत्र से प्रभावित होकर उन्होंने उस घर पर सुनहरे आँवले की वर्षा कराई — और इसी कारण इसका नाम ‘कनकधारा’ (कनक = स्वर्ण, धारा = वर्षा) पड़ा।

स्थान — कई परम्पराएँ इसे केरल के कलडी (शंकर की जन्मभूमि) के निकट का गाँव बताती हैं।

ऐतिहासिक महत्व — यह स्तोत्र शंकराचार्य की किशोर अवस्था की रचना है, परंतु इसमें उनकी अद्वैत-दृष्टि स्पष्ट है। माँ लक्ष्मी मात्र धन-दात्री नहीं — श्रुति, रति, शक्ति, पुष्टि — सब उनके रूप हैं (छंद ११)।

पाठ विधि

कब करें

  • दैनिक प्रातः स्नान के पश्चात
  • शुक्रवार — विशेष फलदायी
  • दीपावली, अक्षय तृतीया, धनतेरस
  • आर्थिक संकट के समय — विशेष रूप से ऋण, बेरोज़गारी, व्यापार-हानि
  • ४१ दिनों के अनुष्ठान के साथ — विशेष संकल्प के लिए

कैसे करें

  1. स्नान के पश्चात लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा-स्थल पर माँ लक्ष्मी की प्रतिमा अथवा चित्र; श्री यंत्र की उपस्थिति विशेष फलदायी।
  3. गंगा जल, अक्षत, चंदन, पुष्प अर्पित करें।
  4. गाय का घी का दीपक प्रज्वलित करें (तेल का दीपक भी स्वीकार्य)।
  5. गुड़, खीर, या मिष्ठान्न का भोग।
  6. प्रथम गणेश-स्मरण
  7. स्थिर मन, स्पष्ट उच्चारण से पूरे १२ छंदों का पाठ। यदि अधिक समय हो तो ३ या ५ बार।
  8. पाठ के पश्चात कम से कम ५ मिनट का मौन ध्यान — माँ की कृपा-दृष्टि का अनुभव।
  9. अंत में लक्ष्मी आरती और प्रसाद वितरण।

विशेष विधि — ‘११ शुक्रवार पाठ’

लगातार ११ शुक्रवारों तक प्रतिदिन कनकधारा स्तोत्रम् का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। पारंपरिक मान्यता है कि यह आर्थिक संकट से उद्धार करता है।

विशेष विधि — ‘१४००० बार पाठ’

ज्योतिष-शास्त्रीय अनुष्ठान में संकल्प पूर्वक १४००० बार कनकधारा स्तोत्रम् का जाप किया जाता है — यह वर्षों का समर्पित अभ्यास है।

महत्व

  • शंकराचार्य की रचना — अद्वैत-वेदान्त के परम आचार्य की प्रत्यक्ष रचना; आध्यात्मिक एवं भाषाई दोनों दृष्टि से अद्वितीय।
  • धन-संकट के लिए विशेष — पौराणिक कथा का आधार ही धन-वर्षा का है।
  • काव्य-सौंदर्य — संस्कृत कविता की दृष्टि से अनुप्रास, उपमा, श्लेष — सब का अद्भुत प्रयोग।
  • दार्शनिक गहराई — माँ को मात्र धन-दात्री नहीं बल्कि श्रुति-रति-शक्ति-पुष्टि के रूप में स्तुत किया गया है।
  • ‘अपांग-लीला’ का उत्सव — पूरा स्तोत्र माँ की ‘आधी दृष्टि’ की प्रार्थना है — पूर्ण दृष्टि की नहीं। यह विनम्रता का अद्वितीय भाव है।

सामान्य प्रश्न

क्या कनकधारा स्तोत्र पाठ से सचमुच धन की वर्षा होती है?

पौराणिक कथा रूपक है। आधुनिक काल में ‘सोने के आँवले’ का अर्थ — अप्रत्याशित आर्थिक राहत, लंबे समय से रुके धन की प्राप्ति, ऋण-मुक्ति आदि। निष्ठा से किए गए पाठ के अनुभव अनेक भक्तों ने साझा किए हैं, परंतु यह ‘जादू’ नहीं — माँ की कृपा का अनुभव है।

स्तोत्र में कुल कितने छंद हैं?

विभिन्न पांडुलिपियों में १२ से २१ छंद तक मिलते हैं। यहाँ १२ प्रमुख छंद दिए गए हैं — जो सर्वाधिक पाठ्य हैं। पूर्ण २१-छंद वाले संस्करण के लिए गीता प्रेस गोरखपुर का प्रकाशन देखें।

क्या कनकधारा यंत्र अलग होता है?

हाँ। कनकधारा यंत्र विशेष रूप से इस स्तोत्र के साथ पूजा के लिए बनाया गया है। यह श्री यंत्र का ही एक रूप है, जिसमें कनकधारा-बीजमंत्र अंकित होते हैं। नवरात्रि या दीपावली पर इसकी स्थापना श्रेष्ठ मानी जाती है।

कितने पाठ श्रेष्ठ हैं?

  • दैनिक १ पाठ — सामान्य लाभ
  • दैनिक ३ पाठ — विशेष कृपा
  • ११ शुक्रवारों तक १ पाठ — आर्थिक संकल्प के लिए
  • ४१ दिन ३ पाठ — गहन संकट से उद्धार
  • १४००० पाठ — सर्वोच्च अनुष्ठान, विशेष पुरश्चरण के लिए

क्या स्त्रियाँ रजस्वला अवस्था में पाठ कर सकती हैं?

मानसिक पाठ सदैव अनुमत है। शास्त्रीय परंपरा में सस्वर पाठ एवं स्पर्श-पूजा का परिहार है, परंतु आधुनिक अधिकांश आचार्य मानसिक स्मरण को निर्विवाद मानते हैं।

स्तोत्र का संगीतमय संस्करण कौन सा प्रसिद्ध है?

एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी एवं एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम के संस्करण विश्व-प्रसिद्ध हैं। आधुनिक काल में अनूप जलोटा एवं आनुराधा पौडवाल के भी प्रसिद्ध संस्करण उपलब्ध हैं।

क्या यह स्तोत्र अद्वैत-वेदान्त के विरुद्ध है?

बिलकुल नहीं। शंकराचार्य ने स्वयं इसकी रचना की है। उनके दर्शन में ‘सगुण भक्ति’ को ‘निर्गुण ज्ञान’ का सोपान माना गया है — माँ लक्ष्मी की भक्ति परब्रह्म-साक्षात्कार की पूर्व-तैयारी है। छंद ११ में स्पष्ट है — माँ श्रुति, रति, शक्ति, पुष्टि — सर्व-रूप हैं।