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कनकधारा स्तोत्र

By आदि शंकराचार्यलगभग 8वीं शताब्दी (आदि शंकराचार्य)संस्कृत

9 min readLast reviewed May 25, 2026

मूल पाठ

मंगलाचरण

वंदे वंदारु मंदारमिंदिरानंदकंदलम् ।
अमंदानंदसंदोह बंधुरं सिंधुराननम् ॥

स्तोत्र

अंगं हरेः पुलकभूषणमाश्रयंती
भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अंगीकृताखिलविभूतिरपांगलीला
मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवतायाः ॥१॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसंभवायाः ॥२॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुंदम्
आनंदकंदमनिमेषमनंगतंत्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनायाः ॥३॥

बाह्वंतरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥४॥

कालांबुदालिललितोरसि कैटभारेः
धाराधरे स्फुरति या तटिदंगनेव ।
मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिः
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनंदनायाः ॥५॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्
मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मंथरमीक्षणार्धं
मंदालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥६॥

विश्वामरेंद्रपदविभ्रमदानदक्षं
आनंदहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्थं
इंदीवरोदरसहोदरमिंदिरायाः ॥७॥

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते ।
दृष्टिः प्रहृष्ट कमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥८॥

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणांबुधाराम्
अस्मिन्नकिंचन विहंगशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनांबुवाहः ॥९॥

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुंदरीति
शाकंभरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥१०॥

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥११॥

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥१२॥

नमोऽस्तु हेमांबुजपीठिकायै
नमोऽस्तु भूमंडलनायिकायै ।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै
नमोऽस्तु शारंगायुधवल्लभायै ॥१३॥

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनंदनायै
नमोऽस्तु विष्णोरुरसिस्थितायै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै
नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥१४॥

नमोऽस्तु कांत्यै कमलेक्षणायै
नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै
नमोऽस्तु नंदात्मजवल्लभायै ॥१५॥

संपत्कराणि सकलेंद्रियनंदनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वंदनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयंतु मान्ये ॥१६॥

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसंपदः ।
संतनोति वचनांगमानसैः
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥१७॥

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगंधमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥१८॥

दिग्घस्तिभिः कनककुंभमुखावसृष्ट
स्वर्वाहिनी विमलचारुजलप्लुतांगीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥१९॥

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरंगितैरपांगैः ।
अवलोकय मामकिंचनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥२०॥

स्तुवंति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवंति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥२१॥

फलश्रुति

सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छंकराचार्य निर्मितम् ।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत् ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ कनकधारास्तोत्रं संपूर्णम् ॥

अर्थ

कनकधारा स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित देवी लक्ष्मी का 21-श्लोकीय स्तोत्र है। नाम का अर्थ है — कनक (स्वर्ण) + धारा (वर्षा/प्रवाह) — “स्वर्ण की धारा।” इसकी प्रधान विषय-वस्तु है लक्ष्मी का कटाक्ष (कृपापूर्ण तिरछा दृष्टि-निक्षेप) — स्तोत्र बार-बार यही प्रार्थना करता है कि देवी का वह करुणा-पूर्ण अपांग (नेत्र-कोर) दृष्टिपात भक्त पर पड़े। आरंभिक मंगलाचरण गणेश को समर्पित है; फिर 21 श्लोक; अंत में फलश्रुति।

मंगलाचरण

स्तोत्र-आरंभ में गणेश की वंदना — “जो भक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं, जो इंदिरा (लक्ष्मी) के आनंद के अंकुर हैं, अपार आनंद के पुंज, सुंदर गजमुख (सिंधुरानन) — उन्हें मैं वंदन करता हूँ।”

श्लोक 1–5 — हरि की ओर लक्ष्मी का कटाक्ष

प्रथम पाँच श्लोक लक्ष्मी की उस दृष्टि का वर्णन करते हैं जो विष्णु (मुरारि, मधुजित, कैटभारि) पर पड़ती है, और प्रार्थना करते हैं कि वही दृष्टि भक्त को मंगल दे। उपमाएँ अत्यंत मनोहर हैं — हरि के अंग का आश्रय लेती लक्ष्मी की अपांग-लीला ऐसी है जैसे तमाल-वृक्ष का आश्रय लेती भ्रमरी (श्लोक 1); मुरारि के मुख की ओर बार-बार जाती-आती उनकी दृष्टि-माला ऐसी है जैसे महाकमल पर मँडराती मधुमक्खी (श्लोक 2); कौस्तुभ-मणि के पास हरि के वक्ष पर शोभित उनकी कटाक्ष-माला नीलमणि-हार-सी (श्लोक 4); कैटभारि के मेघ-श्याम वक्ष पर वह विद्युत्-सी चमकती हैं (श्लोक 5)। प्रत्येक श्लोक प्रार्थना है — वह दृष्टि मुझे मंगल, श्री, कल्याण और भद्र दे

श्लोक 6–9 — दृष्टिपात की प्रार्थना और स्वर्ण-वर्षा

भक्त प्रार्थना करता है कि समुद्र-कन्या (मकरालय-कन्यका) का वह मंथर, मंद-अलस अर्ध-कटाक्ष उस पर पड़े — वही दृष्टि जिसके प्रभाव से मधुसूदन को मन्मथ (काम) ने प्रथम पद प्राप्त किया (श्लोक 6); इंदिरा का वह नील-कमल-सदृश दृष्टिपात क्षण भर मुझ पर ठहरे (श्लोक 7); पुष्कर-विष्टरा (कमल-आसना) की दृष्टि मुझे इष्ट पुष्टि दे (श्लोक 8)। श्लोक 9 स्तोत्र का केंद्र है — “नारायण की प्रिया के नेत्र-रूपी मेघ, करुणा की वायु से प्रेरित होकर, इस विषण्ण, अकिंचन विहंग-शिशु (पक्षी-बच्चे — अर्थात् असहाय भक्त) पर द्रविण (धन) की जल-धारा बरसाएँ, और दुष्कर्म-रूपी ताप को चिरकाल के लिए दूर कर दें।” यही वह श्लोक है जिसका भाव “स्वर्ण-धारा” से सीधा जुड़ा है।

श्लोक 10 — समस्त देवियों से अभेद

लक्ष्मी की पहचान सब देवियों से की गई है — वे गीर्देवता (सरस्वती), गरुडध्वज-सुंदरी (विष्णु-पत्नी), शाकंभरी (दुर्गा का रूप), और शशिशेखर-वल्लभा (शिव-प्रिया, पार्वती) हैं — सृष्टि, स्थिति और प्रलय की लीला में स्थित, त्रिभुवन के एकमात्र गुरु (विष्णु) की तरुणी को नमस्कार।

श्लोक 11–15 — “नमोऽस्तु” वंदना-श्लोक

पाँच श्लोक “नमोऽस्तु” (नमस्कार हो) की लड़ी हैं — श्रुति, रति, शक्ति, पुष्टि को (11); कमल-मुखी, दुग्ध-सागर-जन्मा, सोम-अमृत की सहोदरी, नारायण-वल्लभा को (12); स्वर्ण-कमल-पीठ-वासिनी, भूमंडल-नायिका, शारंग-धनुर्धर (विष्णु)-वल्लभा को (13); भृगु-नंदनी, विष्णु-वक्ष-स्थिता, कमलालया लक्ष्मी, दामोदर-वल्लभा को (14); कांति, कमल-नेत्रा, भुवन-प्रसूति (जगत्-जननी), देवों से अर्चित, नंदात्मज (कृष्ण)-वल्लभा को नमस्कार (15)।

श्लोक 16–18 — प्रत्यक्ष प्रार्थना

हे कमल-नयना माता, आपकी वंदनाएँ — जो संपत्ति देती हैं, समस्त इंद्रियों को आनंदित करती हैं, साम्राज्य-दान का वैभव रखती हैं, और पापों का उद्धार करने में उद्यत हैं — सदा मुझ पर ही फलित हों (16); जिनके कटाक्ष की उपासना सेवक को समस्त अर्थ-संपदा देती है, उन मुरारि-हृदयेश्वरी की मैं वचन, अंग और मन से उपासना करता हूँ (17); हे सरसिज-निलया, सरोज-हस्ता, धवल वस्त्र-गंध-माल्य से शोभित, हरि-वल्लभा, त्रिभुवन-भूति-कारिणी — मुझ पर प्रसन्न होइए (18)।

श्लोक 19 — प्रातः-वंदना

दिग्गजों द्वारा स्वर्ण-कलशों से उँडेले गए आकाश-गंगा के निर्मल जल से स्नात अंगों वाली, समस्त लोकों के अधिनाथ (विष्णु) की गृहिणी, अमृत-सागर की पुत्री, जगत्-जननी को मैं प्रातः नमन करता हूँ।

श्लोक 20 — प्रसिद्ध याचना

“हे कमले, हे कमल-नयन (विष्णु) की वल्लभे, करुणा के प्रवाह से तरंगित अपने कटाक्षों से मुझ पर दृष्टि डालिए — मैं अकिंचनों में प्रथम हूँ, आपकी दया का अकृत्रिम (सच्चा) प्रथम पात्र हूँ।” यह स्तोत्र का सर्वाधिक उद्धृत श्लोक है।

श्लोक 21 — फलश्रुति

जो प्रतिदिन इन स्तुतियों से वेदत्रयी-मयी, त्रिभुवन-माता रमा (लक्ष्मी) की स्तुति करते हैं, वे गुणाधिक, गुरुतर भाग्य के भागी, और बुध-जनों द्वारा सम्मानित आशय वाले होते हैं।

फलश्रुति-श्लोक एवं समापन

“यह सुवर्णधारा-स्तोत्र, जो शंकराचार्य द्वारा रचित है, जो त्रिसंध्या (प्रातः-मध्याह्न-सायं) नित्य पाठ करता है, वह कुबेर के समान (धनी) होता है।” अंत में समापन-वचन स्तोत्र को आदि शंकर (श्री गोविंद भगवत्पाद के शिष्य) की कृति के रूप में अंकित करता है।

इतिहास

कनकधारा स्तोत्र आदि शंकराचार्य (लगभग 8वीं शताब्दी) की रचना है — अद्वैत वेदांत के महान् आचार्य, जिनकी कृति का उल्लेख समापन-वचन में स्वयं होता है (“श्री गोविंद भगवत्पाद के शिष्य श्री शंकर भगवान् की कृति”)।

स्तोत्र से जुड़ी प्रसिद्ध कथा शंकर के बाल्यकाल की है। ब्रह्मचारी रूप में भिक्षाटन करते हुए बालक शंकर एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मणी के घर पहुँचे। देने को उसके पास कुछ न था — उसने खोजकर एक सूखा आमलक (आँवला) फल बड़े श्रद्धा-भाव से अर्पित किया। उस दरिद्रता में भी उसके निःस्वार्थ दान से द्रवित होकर शंकर ने वहीं देवी लक्ष्मी की स्तुति में यह स्तोत्र रचा। प्रसन्न होकर लक्ष्मी प्रकट हुईं। शंकर ने उस निर्धन स्त्री पर कृपा की प्रार्थना की; देवी ने पहले उसके पूर्व-कर्म का उल्लेख किया, पर शंकर के आग्रह पर उन्होंने उस घर पर स्वर्ण-आमलकों की वर्षा कर दी — इसी “कनक की धारा” से स्तोत्र का नाम पड़ा।

स्तोत्र संस्कृत के वसंततिलका (अधिकांश श्लोक) और कुछ अन्य छन्दों में है, और देवी लक्ष्मी के सर्वाधिक पठित स्तोत्रों में से एक है — विशेषकर समृद्धि, ऋण-मुक्ति और आर्थिक संकट-निवारण हेतु। यह 18 और 21 श्लोकों — दोनों रूपों में प्रचलित है; यहाँ 21-श्लोकीय पूर्ण रूप प्रस्तुत है।

पाठ विधि

  • दिन — शुक्रवार लक्ष्मी को विशेष प्रिय है। अक्षय तृतीया, धनतेरस, दीपावली और शरद पूर्णिमा विशेष शुभ हैं।
  • समय — फलश्रुति के अनुसार आदर्श रूप से त्रिसंध्या (प्रातः, मध्याह्न, सायं) — तीनों संध्याओं में पाठ। न्यूनतम प्रातः स्नान के पश्चात एक पाठ।
  • विधि
    1. पूर्व या उत्तर मुख होकर स्वच्छ आसन पर बैठें।
    2. लक्ष्मी (अथवा लक्ष्मी-नारायण) के चित्र/प्रतिमा के सम्मुख घी का दीप जलाएँ; कमल अथवा लाल पुष्प और कमलगट्टे अर्पित करें।
    3. भाव-सहित पाठ करें; श्लोक 20 (कमले कमलाक्षवल्लभे) पर विशेष भाव-एकाग्रता की परंपरा है।
  • पुनरावृत्ति — नित्य एक से तीन पाठ। विशेष संकल्प हेतु 11 या 108 पाठ; आर्थिक संकट में 40 दिन का अनुष्ठान।

जाति, लिंग या आयु का कोई बन्धन नहीं — पाठ सबके लिए खुला है।

महत्व

कनकधारा स्तोत्र लक्ष्मी-स्तोत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है — इसके कटाक्ष-भाव और इसकी उत्पत्ति-कथा के नैतिक सार के कारण।

कटाक्ष — कृपापूर्ण दृष्टि। स्तोत्र की केंद्रीय छवि लक्ष्मी का अपांग (नेत्र-कोर से तिरछा) कटाक्ष है। पहले नौ श्लोक यह दृष्टि विष्णु पर पड़ती हुई वर्णित करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वही दृष्टि भक्त पर पड़े। भाव यह है कि लक्ष्मी की कृपा “दृष्टि-मात्र” से समस्त संपदा देती है — स्थूल धन से लेकर मोक्ष-संपदा तक। यही कारण है कि स्तोत्र को संपत्ति और ऐश्वर्य का स्तोत्र माना जाता है।

आमलक-कथा का सार। उत्पत्ति-कथा का संदेश केवल धन-प्राप्ति नहीं — वह दरिद्रता में भी निःस्वार्थ दान की महिमा है। निर्धन स्त्री ने जो एकमात्र आँवला श्रद्धा से दिया, उसी करुणा ने स्वर्ण-वर्षा को आमंत्रित किया। स्तोत्र इस प्रकार उदारता और करुणा को समृद्धि का मूल बताता है।

सर्व-देवी-अभेद (श्लोक 10)। लक्ष्मी की पहचान सरस्वती, दुर्गा (शाकंभरी) और पार्वती (शशिशेखर-वल्लभा) से करके स्तोत्र उन्हें एकमात्र महादेवी के रूप में प्रतिष्ठित करता है — जो सृष्टि, स्थिति और प्रलय की लीला में स्थित हैं।

ऋण-मुक्ति और आर्थिक संकट। परंपरा में यह स्तोत्र आर्थिक कठिनाई, ऋण-भार और निर्धनता के निवारण हेतु सर्वाधिक अनुशंसित लक्ष्मी-स्तोत्रों में से एक है। फलश्रुति-श्लोक स्वयं वचन देता है — त्रिसंध्या-पाठी कुबेर (धन के स्वामी) के समान होता है।

सामान्य प्रश्न

कनकधारा स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना आदि शंकराचार्य (लगभग 8वीं शताब्दी), अद्वैत वेदांत के आचार्य, ने की। प्रसिद्ध कथा के अनुसार, बालक शंकर ने एक निर्धन ब्राह्मणी के निःस्वार्थ दान (एक सूखा आँवला) से द्रवित होकर यह स्तोत्र रचा, जिस पर देवी लक्ष्मी ने उस घर पर स्वर्ण-आमलकों की वर्षा कर दी।

“कनकधारा” का अर्थ क्या है?

कनक का अर्थ है स्वर्ण और धारा का अर्थ है वर्षा या प्रवाह — अतः “कनकधारा” का अर्थ है “स्वर्ण की धारा।” यह नाम उस घटना से है जब देवी लक्ष्मी ने स्तोत्र से प्रसन्न होकर निर्धन स्त्री के घर पर स्वर्ण-आँवलों की वर्षा की।

इसमें कितने श्लोक हैं?

यह 18 और 21 — दोनों रूपों में प्रचलित है। यहाँ 21-श्लोकीय पूर्ण रूप प्रस्तुत है, साथ में एक आरंभिक मंगलाचरण (गणेश-वंदना) और एक फलश्रुति-श्लोक।

इसके पीछे की कथा क्या है?

ब्रह्मचारी बालक शंकर भिक्षाटन करते हुए एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मणी के घर पहुँचे। उसके पास देने को केवल एक सूखा आँवला था, जिसे उसने श्रद्धा से अर्पित किया। उसकी उदारता से द्रवित होकर शंकर ने लक्ष्मी की स्तुति में यह स्तोत्र रचा; प्रसन्न देवी ने उस घर पर स्वर्ण-आमलकों की वर्षा कर दी।

कनकधारा स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

फलश्रुति के अनुसार आदर्श रूप से त्रिसंध्या (प्रातः, मध्याह्न, सायं) पाठ। शुक्रवार, अक्षय तृतीया, धनतेरस और दीपावली विशेष शुभ हैं। न्यूनतम प्रातः स्नान के पश्चात एक पाठ पर्याप्त है।

क्या स्त्रियाँ कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

हाँ। पाठ में कोई शास्त्रीय निषेध नहीं है। यह स्तोत्र लिंग, जाति या आयु के बन्धन बिना सब भक्तों द्वारा पठित होता है।

क्या यह केवल धन के लिए है?

नहीं। यद्यपि यह आर्थिक समृद्धि और ऋण-मुक्ति हेतु विशेष प्रसिद्ध है, स्तोत्र का गहरा भाव लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि की प्रार्थना है — जो स्थूल धन के साथ-साथ आंतरिक/आध्यात्मिक संपदा (श्री) भी देती है। श्लोक 9 की “द्रविण-धारा” भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों अभावों के निवारण का प्रतीक है।