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श्री सूर्य चालीसा

By पारंपरिक (अज्ञात रचयिता)१९वीं–२०वीं शताब्दीखड़ी बोली

7 min readLast reviewed May 2, 2026

मूल पाठ

दोहा

कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शङ्ख चक्र के सङ्ग॥

चौपाई

जय सविता जय जयति दिवाकर। सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥१॥

भानु पतंग मरीचि भास्कर। सविता हंस सुनूर विभाकर॥२॥

विवस्वान आदित्य विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥३॥

अंबरमणि खग रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥४॥

सहस्रांशु प्रद्योतन कहिकह। मुनिगन होत प्रसन्नता लहकह॥५॥

अरुण-सदृश सारथी मनोहर। हाँकत हय साता चढ़ि रथ पर॥६॥

मण्डल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥७॥

उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरन्दर लज्जित होते॥८॥

मित्र, रवि, सूर्य, भानु आदित। पूषा अर्क हिरण्यगर्भ अदितिवृत्॥९॥

ये द्वादश आदित्य कहाये। ज्योतिर्मय इन ब्रह्म समाये॥१०॥

बाहरह आगन्तुक स्थित जग में। मास-मास परिवर्तन तग में॥११॥

देव-दानव-गन्धर्व-यक्षाहि। सेवा करत जग जोति-निधाहि॥१२॥

एक चक्र रथ साता घोड़े। कोटि सूर्य की शक्ति समोड़े॥१३॥

कमल-नाभ कह सूर्य पुकारत। ब्रह्म-स्वरूप कहायि सब धारत॥१४॥

जो सूर्यान्त ध्यान धरै कोई। ता पर सूर्य कृपा अति होई॥१५॥

रोग जरा-व्यथा सब टूटे। नवजीवन सूर्य कृपा से जुटे॥१६॥

संतान अल्प जो हो किसी की। सूर्य कृपा से वंश बढ़े बहुप्रसी॥१७॥

विद्या-बुद्धि सूर्य से बढ़ती। तेज-ओज की किरण निसरती॥१८॥

जो रवि कहत सूर्य उपाधि। संकर्षण सूत मुख-गन प्रज्ञा-समाधि॥१९॥

रथ-यान्त्रिक अरुण कहलाये। पंगुपाद हो सूर्य-सहायी॥२०॥

रथ की रश्मि बिखेरत भू पर। शीत-पवन निवारत है तत्पर॥२१॥

कण-कण में सूर्य ज्योति समाई। प्राणि-मात्र को नवल-दिशाई॥२२॥

सूर्य बिन कोई जीव न पनपे। औषधि-वनस्पति सब हो विसपे॥२३॥

ऋत्विज याज्ञिक सूर्य पूजते। वेद-मंत्र से अर्घ्य देते॥२४॥

प्रात:काल अरुणोदय वेला। उठ प्रभु-दर्शन कर आता मेला॥२५॥

जल का पात्र हाथ में लेकर। अर्घ्य देते भक्त मुख-धरकर॥२६॥

ॐ मित्राय नमः उच्चारत। सहस्रांशु को प्रणाम करत॥२७॥

रवि-वार जो उपवास करे कोई। सूर्य कृपा से सब वर होई॥२८॥

रथ-सप्तमी पर्व विशाला। मन्दिर-मन्दिर पूजन-माला॥२९॥

छठ-पूजा बिहार में पावन। सूर्य-षष्ठी का व्रत मनभावन॥३०॥

संध्या-वेला अस्ताचल जाते। पुनर्ध्यान भक्तगण उठाते॥३१॥

गायत्री मंत्र सूर्य-स्वरूपा। तीन-संध्या जपन अनूपा॥३२॥

सावित्री-वेद-माता-शक्ति। सूर्य-तेज की केन्द्र-समाधि॥३३॥

दशरथ-राज्य रामचन्द्र-नंदन। सूर्य-वंश के तेज विभूषण॥३४॥

कर्ण कुन्ती-नंदन सूर्य-पुत्र। दान-वीर का चरित्र अद्भुत॥३५॥

जो भक्त चालीसा गाए। सूर्य कृपा से सर्व सुख पाए॥३६॥

रवि-वार पाठ नित-नित करै। ता पर भगवान् सूर्य उतरै॥३७॥

रोग-शोक संकट सब दूर होई। सूर्य कृपा से जीवन सुख-योई॥३८॥

जो यह चालीसा पढ़ निरन्तर। पावै तेज-ओज सब अंतर॥३९॥

सूर्य देव की कृपा अपारा। पाठ करत हो सब-दुख निवारा॥४०॥

दोहा

जयति जयति जय सूर्यदेव, सहस्रांशु तेज-निधान।
तेजस्विनं तपस्विनं, बल बुद्धि देह आन॥

अर्थ

सूर्य चालीसा सूर्यदेव की महिमा, उनके बारह आदित्य रूपों, उनके सात अश्व-रथ, और उनकी कृपाओं का संक्षिप्त चित्रण है।

दोहा — सूर्यदेव कनक (स्वर्ण) के समान देह वाले, मकर-कुण्डल पहने, मोती की माला धारण किए, पद्मासन पर बैठे, शंख-चक्र के साथ — उनका ध्यान करिए।

चौपाई १-४ — सूर्य के अनेक नाम: सविता, दिवाकर, सहस्रांशु (हजार किरणों वाले), सप्ताश्व (सात घोड़ों वाले), तिमिर-हर (अंधकार-नाशक), भानु, पतंग, मरीचि, भास्कर, हंस, विवस्वान, आदित्य, मार्तण्ड, विरोचन, अंबरमणि, खग, रवि।

चौपाई ६-८ — सूर्य के सारथी अरुण का वर्णन। सात घोड़ों के रथ पर सूर्य।

चौपाई ९-१०द्वादश आदित्य (बारह सूर्य-रूप): मित्र, रवि, सूर्य, भानु, आदित्य, पूषा, अर्क, हिरण्यगर्भ, और शेष चार। प्रत्येक मास में अलग-अलग आदित्य की उपस्थिति।

चौपाई १५-१८ — सूर्य की कृपा: रोग-निवारण, नव-जीवन, संतान-वृद्धि, विद्या-बुद्धि-तेज।

चौपाई २२-२३जीवन-स्रोत के रूप में सूर्य — कण-कण में ज्योति, बिना सूर्य कोई जीव-वनस्पति नहीं।

चौपाई २४-२७पूजा-विधि: प्रात:काल अरुणोदय, जल-पात्र, अर्घ्य, ‘ॐ मित्राय नमः’ का उच्चारण।

चौपाई २८-३०रविवार-व्रत, रथ-सप्तमी, छठ-पूजा — तीन प्रमुख सूर्य-पर्व।

चौपाई ३२-३३गायत्री मंत्र सूर्य-स्वरूप; सावित्री सूर्य-शक्ति।

चौपाई ३४-३५ — सूर्य-वंश: दशरथ, रामचंद्र — सूर्यवंशी; कर्ण — सूर्य-पुत्र।

चौपाई ३६-४० — फलश्रुति: नित्य पाठ से रोग-शोक-संकट दूर; तेज-ओज प्राप्ति।

इतिहास

सूर्य की पूजा भारत की सबसे प्राचीन परंपराओं में से एक है — वैदिक काल (१५००–१००० ईसा पूर्व) से प्रचलित। गायत्री मंत्र स्वयं सूर्य-स्तुति है। सूर्य ‘प्रत्यक्ष देवता’ हैं — एकमात्र देवता जिनका दर्शन सबको प्रतिदिन होता है।

द्वादश आदित्य — पुराणों में सूर्य के बारह रूप: मित्र, रवि, सूर्य, भानु, खग, पूषा, हिरण्यगर्भ, मरीचि, आदित्य, सविता, अर्क, भास्कर। प्रत्येक माह में एक का प्राधान्य।

सूर्य चालीसा १९वीं-२०वीं शताब्दी की रचना है — हनुमान चालीसा की तर्ज पर। संगीत में पारंपरिक भजन-शैली। आज:

  • उत्तर भारत के अनेक सूर्य-मंदिरों में दैनिक पाठ
  • छठ पूजा (बिहार-झारखंड-यूपी पूर्वांचल) — विश्व का सबसे बड़ा सूर्य-पर्व
  • रथ सप्तमी (माघ शुक्ल सप्तमी) — दक्षिण भारत में विशेष
  • रविवार का दैनिक उपवास

— सर्वत्र सूर्य चालीसा का पाठ होता है।

प्रसिद्ध सूर्य मंदिर:

  • कोणार्क सूर्य मंदिर (ओडिशा) — १३वीं शताब्दी; UNESCO धरोहर
  • मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात) — ११वीं शताब्दी
  • मार्तण्ड सूर्य मंदिर (कश्मीर) — ८वीं शताब्दी
  • दक्षिण-कोणार्क — आंध्र प्रदेश
  • सूर्यनार कोविल (तमिलनाडु) — नवग्रह मंदिर

पाठ विधि

कब करें

  • दैनिक प्रातः — सूर्योदय के समय (४:०० — ६:०० बजे)
  • रविवार — सर्वोच्च फलदायी दिन
  • रथ सप्तमी (माघ शुक्ल सप्तमी)
  • छठ पूजा (कार्तिक शुक्ल षष्ठी)
  • मकर संक्रांति (१४ जनवरी)
  • रोग-निवारण के विशेष संकल्प के साथ

कैसे करें

  1. ब्रह्म-मुहूर्त (४:०० बजे) उठें; स्नान करें।
  2. पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों।
  3. तांबे के लोटे में जल भरें; उसमें लाल पुष्प, चावल, हल्दी, रोली डालें।
  4. ‘ॐ मित्राय नमः, ॐ रवये नमः, ॐ सूर्याय नमः’ आदि द्वादश आदित्य नाम का उच्चारण करते हुए सूर्य की ओर अर्घ्य दें।
  5. गायत्री मंत्र का ११ बार जप।
  6. सूर्य चालीसा का पाठ स्पष्ट उच्चारण से।
  7. सूर्य नमस्कार के १२ चक्र (योग) — स्वास्थ्य के लिए विशेष।
  8. लाल चंदन का तिलक माथे पर।
  9. अंत में ‘ॐ सूर्याय नमः’ का जप।

अर्घ्य-विधि का महत्व

जल का अर्घ्य देते समय जल के माध्यम से सूर्य की किरणें छनकर आँखों तक पहुँचती हैं — इस से नेत्र-रोग में लाभ माना गया है। साथ ही विटामिन डी का प्राकृतिक स्रोत प्रात:कालीन सूर्य ही है।

रविवार-व्रत विधि

  • दिन भर एक समय भोजन (केवल फलाहार उत्तम)
  • लाल वस्त्र धारण
  • सूर्य चालीसा का तीन बार पाठ
  • गुड़, गेहूँ, तांबा, लाल वस्त्र का दान
  • नमक से परहेज — रविवार को नमक-वर्जन

रथ सप्तमी विशेष

  • सूर्योदय से पूर्व स्नान अनिवार्य
  • ७ अर्क-पत्र सिर पर रखकर स्नान
  • दीप ७ बार सूर्य की ओर
  • ७ कन्याओं अथवा ब्राह्मणों को भोजन
  • सूर्य चालीसा + सूर्याष्टकम् पाठ

छठ पूजा

  • ४ दिनीय व्रत — कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक
  • तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य
  • चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य
  • गन्ने, फल, ठेकुआ का प्रसाद
  • नदी-तट पर खड़े होकर पूजा

महत्व

  • प्रत्यक्ष देवता — एकमात्र देवता जिनका दर्शन सबको प्रतिदिन।
  • जीवन-स्रोत — बिना सूर्य कोई जीव-जगत् नहीं।
  • रोग-निवारक — विटामिन डी, नेत्र-स्वास्थ्य, स्किन-सेहत — सब सूर्य से।
  • सूर्य-वंश की प्रतिष्ठा — राम, भीष्म, युधिष्ठिर — सब सूर्य-वंशी।
  • गायत्री-स्वरूप — सर्वोच्च मंत्र सूर्य-स्तुति।

सामान्य प्रश्न

क्या सूर्य पूजा हिन्दू-धर्म-विशेष है?

नहीं — सूर्य पूजा विश्व-व्यापी है। पारसी, मिस्री (राय), इंका, और अनेक प्राचीन सभ्यताओं में। हिन्दू परंपरा में यह वैदिक काल से सतत प्रचलित।

अर्घ्य-जल कहाँ डालना चाहिए?

तुलसी पौधे, गमले, अथवा बगीचे में। पैरों पर न पड़ने दें (अपवित्र होगा)। खुले मैदान में अर्पण आदर्श।

बादलों के दिनों में अर्घ्य कैसे दें?

सूर्य की दिशा (पूर्व) में अर्घ्य दें — दर्शन न हो तो भी। बाबा सूर्य की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है, दिखावट नहीं।

क्या स्त्रियाँ रजस्वला अवस्था में पाठ कर सकती हैं?

मानसिक पाठ सदैव अनुमत है। छठ पूजा स्त्रियों का व्रत है — पारंपरिक रूप से उन दिनों में परिहार करना चाहिए, परंतु यह केवल पूजा-काल के लिए, सामान्य पाठ के लिए नहीं।

सूर्य पूजा से कौन-कौन से ज्योतिषीय लाभ हैं?

कुंडली में सूर्य कमजोर होने पर रविवार-व्रत एवं चालीसा-पाठ विशेष फलदायी। पिता से संबंध, सरकारी नौकरी, राजसत्ता, स्वास्थ्य — सब सूर्य के क्षेत्र।

कौन सी मूर्ति/यंत्र श्रेष्ठ?

तांबे की मूर्ति सूर्य के लिए आदर्श धातु है। सूर्य यंत्र एक चौकोर ताम्रपत्र पर अंकित होता है। यदि मूर्ति-यंत्र न हो तो केवल उगते सूर्य का दर्शन ही पर्याप्त।

क्या सूर्य चालीसा छोटे बच्चों को सिखानी चाहिए?

बच्चों को सूर्य नमस्कार एवं गायत्री मंत्र पहले सिखाएँ। चालीसा बाद में। बच्चों को उगते सूर्य का दर्शन का अभ्यास कराना अमूल्य संस्कार है।