श्री साईं चालीसा
By पारंपरिक (साईं भक्तों द्वारा संकलित)२०वीं शताब्दीखड़ी बोली
मूल पाठ
दोहा
प्रथम साईं के चरण में, अर्पित कर मन शीश।
श्रद्धा सबुरी ले हृदय, करूँ चालीसा निर्दिष्ट॥
चौपाई
जय जय साईं देव दयाला। कलियुग में हो भक्त संभाला॥१॥
शिरडी के तुम कृपा-निधाना। सबके हो प्रभु प्राण समाना॥२॥
जात-धर्म तुम पूछा नहिं भाई। हिन्दू-मुस्लिम सब को अपनाई॥३॥
मस्जिद में तुम धूनी जलाई। उदी से जग को राह दिखाई॥४॥
गुरु के नाम तुम ‘द्वारकामाई’। द्वार सबके हित खोल दिखाई॥५॥
बाहर मस्जिद, अंदर शिवालय। दोनों में तेरा एक शिवालय॥६॥
राम कहो या रहीम पुकारो। सब में तुम्हीं हो आधार हमारो॥७॥
‘अल्लाह मालिक’ का नारा प्यारा। सर्व-धर्म एकत्व का सहारा॥८॥
‘श्रद्धा सबुरी’ दो शब्द दिए। सर्व ज्ञान का रत्न संग्रहीए॥९॥
जो आये तेरे द्वार दीना। ता को कभी न मिलता रोना॥१०॥
रोग शोक तुम सब हर लेते। चमत्कार से सब को देते॥११॥
शामा, बाबू, माहलसापति। सब भक्तों के तुम सहचरि॥१२॥
मेघा को विभूति का दर्शन। पवित्र किया जिनसे जीवन॥१३॥
लक्ष्मीबाई को अंतिम क्षण में। नौ रुपये दिए तुम कृपा-धन में॥१४॥
रामचंद्र दादा का कुष्ठ निवारा। उदी से जग में नया उजियारा॥१५॥
तात्या, नाना सब को अपनाये। अपने भक्तों के सब दुख मिटाये॥१६॥
संत समर्थ के अंशी अवतारी। दत्तात्रेय के स्वरूप त्रिदेवारी॥१७॥
ब्रह्मा-विष्णु-महेश एक रूपा। तुम साईं हो लीला अनूपा॥१८॥
अल्लाह मालिक तुम कहलाते। राम कृष्ण अल्लाह सब बताते॥१९॥
जो भी तेरे चरण में आता। बिन माँगे ही फल पाता॥२०॥
संकट से तुम बचा लेते हो। निर्धन को तुम धन देते हो॥२१॥
रोगी को तुम स्वस्थ बनाते। पुत्र-संतान-सुख दिलाते॥२२॥
व्यापार में तुम लाभ कराते। नौकरी में उन्नति लाते॥२३॥
विद्या में तुम बुद्धि बढ़ाते। मन-शान्ति का मार्ग दिखाते॥२४॥
गुरुवार तेरा प्रिय वारा। पूजन-व्रत से उद्धारा॥२५॥
तेल का दीप जलाये कोई। ता पर बाबा कृपा होई॥२६॥
उदी का तिलक लगाये जो भी। पाप दूर हों उसके सब ही॥२७॥
ग्यारह बार पढ़े जो चालीसा। संकट टले रोग का खटका॥२८॥
साईं सच्चरित्र पढ़े जो कोई। ता का मन निर्मल हो होई॥२९॥
प्रत्येक गुरुवार जो ध्यान करे। साईं कृपा से सब काज सरे॥३०॥
शिरडी की यात्रा जो करे। समाधि पर मस्तक धरे॥३१॥
ता का जीवन धन्य हो जाता। साईं कृपा से सब कुछ पाता॥३२॥
‘सबका मालिक एक’ सिखाया। एकता का संदेश सुनाया॥३३॥
अल्लाह राम सब एक बताए। भेद-भाव से सबको दूर हटाए॥३४॥
संत समर्थ का परम सिद्धान्त। साईं से समझा सबने अंत॥३५॥
तुम बिन कोई न देता आधारा। तुम्हीं हो दीनों के सहारा॥३६॥
जो जन शरण आये तेरी। पावै सिद्धि अति सेरी॥३७॥
‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’ तुमने कहा। श्रद्धा रख तो डर कैसा रहा॥३८॥
जो यह चालीसा नित गावै। साईं कृपा से सब सुख पावै॥३९॥
रामजी कहत साईं चरण में। सर्व मनोरथ हों पल-छिन में॥४०॥
दोहा
जय जय बाबा साईं नाथ, सबके हृदय निवास।
श्रद्धा रख चरणों में, सब का होय उद्धार॥
अर्थ
साईं चालीसा शिरडी के साईं बाबा (१८३८ — १९१८) के जीवन, चमत्कार, और शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन है। इसमें उनकी अद्वितीय ‘सर्व-धर्म-समभाव’ शिक्षा का स्पष्ट चित्रण है।
दोहा — साईं के चरणों में मन और शीश अर्पित कर, ‘श्रद्धा-सबूरी’ (विश्वास और धैर्य) हृदय में लेकर मैं चालीसा का पाठ करता हूँ।
चौपाई १-२ — कलियुग में भक्तों की रक्षा करने वाले दयालु साईं देव। शिरडी के कृपानिधान, सबके प्राण-समान।
चौपाई ३-८ — साईं की केन्द्रीय शिक्षा — जात-धर्म से ऊपर उठकर सबको अपनाना। मस्जिद में रहना, परंतु मस्जिद का नाम ‘द्वारकामाई’ रखना (कृष्ण की द्वारका के संदर्भ में)। ‘अल्लाह मालिक’ का नारा। हिन्दू-मुस्लिम एकत्व का साकार रूप।
चौपाई ९ — साईं के दो शब्द — ‘श्रद्धा’ और ‘सबूरी’ — सम्पूर्ण ज्ञान का रत्न।
चौपाई १०-१६ — साईं के प्रसिद्ध भक्त एवं चमत्कार — शामा, बाबू, मेघा (विभूति-दर्शन), लक्ष्मीबाई शिंदे (अंतिम क्षण ९ रुपये), रामचंद्र दादा (कुष्ठ-निवारण), तात्या-नाना।
चौपाई १७-१८ — साईं को दत्तात्रेय अवतार माना गया — ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेव-स्वरूप।
चौपाई २०-२४ — सर्व-कामना-पूर्ति: संकट-निवारण, धन, स्वास्थ्य, संतान, व्यापार-लाभ, नौकरी-उन्नति, विद्या, मन-शान्ति।
चौपाई २५-२८ — पूजा-विधि: गुरुवार का प्रिय दिन, तेल-दीप, उदी-तिलक, चालीसा का ११ बार पाठ।
चौपाई २९-३२ — शिरडी-यात्रा एवं साईं सच्चरित्र के पाठ का महत्व।
चौपाई ३३-३८ — साईं की ‘सबका मालिक एक’ शिक्षा का पुनर्उल्लेख। अंत में साईं का प्रसिद्ध वचन — ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’।
चौपाई ३९-४० — फलश्रुति।
इतिहास
शिरडी के साईं बाबा (अनुमानित जन्म १८३८ — समाधि १५ अक्टूबर १९१८) महाराष्ट्र के शिरडी ग्राम में रहने वाले संत थे। उनके जन्म-स्थान, माता-पिता, और प्रारंभिक जीवन के बारे में निश्चित ज्ञान नहीं है — यह स्वयं उनकी शिक्षा का अंश रहा कि जात-धर्म महत्वहीन है, श्रद्धा महत्वपूर्ण।
‘साईं’ शब्द का अर्थ — फारसी में ‘गुरु’, ‘पवित्र पुरुष’; मराठी में ‘भगवान्’; हिन्दी में ‘सहायक’। बाबा को यह नाम भक्त ‘महलसापति’ ने दिया।
द्वारकामाई — एक पुरानी मस्जिद जिसमें वे ६० वर्ष रहे। इसी का नाम उन्होंने ‘द्वारकामाई’ (कृष्ण की द्वारका) रखा — इस्लामी मस्जिद का हिन्दू नाम — एकत्व का प्रतीक।
केन्द्रीय शिक्षाएँ:
- ‘सबका मालिक एक’ — सब का स्वामी एक है (अल्लाह, राम, कृष्ण, भगवान् — एक ही)।
- ‘अल्लाह मालिक’ — उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध शब्द।
- ‘श्रद्धा सबूरी’ — विश्वास और धैर्य; सम्पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग का सार।
- ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’ — अंतिम वचन; भक्तों को अनंतकाल का आश्वासन।
ग्रंथ — ‘श्री साईं सच्चरित्र’ — हेमादपन्त (गोविंद रघुनाथ दाभोलकर) द्वारा १९२९ में लिखी, ५३ अध्यायों में बाबा के जीवन-चरित्र की प्रामाणिक रचना।
आधुनिक प्रसार — आज:
- शिरडी भारत के प्रमुख तीर्थों में, प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु
- विश्व भर में हजारों साईं मंदिर
- गुरुवार बाबा का प्रिय दिन — दैनिक भक्तजन-जत्था
- साईं नवरात्रि (सप्टेम्बर-अक्टूबर) पुण्यतिथि के आसपास
पाठ विधि
कब करें
- दैनिक प्रातः स्नान के पश्चात
- गुरुवार — सर्वोच्च फलदायी दिन
- साईं नवरात्रि — विजयादशमी से पूर्व नौ दिन
- साईं पुण्यतिथि (१५ अक्टूबर / विजयादशमी)
- रामनवमी — साईं भक्तों के लिए विशेष
- संकट काल में
कैसे करें
- स्नान के पश्चात पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करें।
- पूजा-स्थल पर साईं बाबा का चित्र। उदी अवश्य रखें।
- पुष्प, चंदन, धूप अर्पित करें।
- तेल का दीप सर्वोत्तम (साईं तेल-दीप के विशेष भक्त थे)।
- खिचड़ी, फल, गुड़-चना का भोग।
- ‘ॐ साईं राम’ अथवा ‘सद्गुरु साईंनाथाय नमः’ का ११ बार जप।
- चालीसा का स्पष्ट उच्चारण से पाठ — एक बार दैनिक, ११ बार गुरुवार पर।
- उदी का तिलक माथे पर।
- अंत में साईं आरती (‘आरती साईं बाबा’ अथवा ‘काकड़ आरती’)।
- साईं सच्चरित्र का एक अध्याय पढ़ने का संकल्प श्रेष्ठ।
गुरुवार विशेष
- ९ या ११ गुरुवार लगातार उपवास और चालीसा-पाठ।
- गुरुवार को साईं मंदिर में दर्शन।
- साईं सच्चरित्र का ७ दिनीय ‘सप्ताह-पाठ’ (साप्ताहिक पारायण) विशेष फलदायी।
- भोजन में: खिचड़ी, गेहूँ की रोटी, गुड़-चना।
साईं नवरात्रि विधि
विजयादशमी से पूर्व नौ दिन:
- दैनिक चालीसा + साईं सच्चरित्र का एक अध्याय
- दैनिक १०८ बार ‘ॐ साईं राम’ जप
- नौवें दिन (विजयादशमी) महाआरती एवं भण्डारा
महत्व
- सर्व-धर्म-समभाव का जीवंत प्रतीक — हिन्दू-मुस्लिम एकत्व।
- ‘श्रद्धा सबूरी’ का सार — दो शब्दों में सम्पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग।
- दत्तात्रेय अवतार — ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेव-स्वरूप।
- उदी का चमत्कार — आज भी बाबा की समाधि से उदी प्राप्त होती है, अनेक भक्त चमत्कार के साक्षी।
- ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’ — अनंतकालीन उपस्थिति का आश्वासन।
सामान्य प्रश्न
क्या साईं बाबा हिन्दू थे या मुस्लिम?
बाबा ने स्वयं कहा — “मैं किसी जाति-धर्म का नहीं — मैं हर भक्त का हूँ।” मस्जिद में रहे, उसका नाम ‘द्वारकामाई’ रखा। ‘अल्लाह मालिक’ कहते, ‘राम राम’ सुनाते। उनका ‘सबका मालिक एक’ सिद्धांत हिन्दू-मुस्लिम दोनों परंपराओं में मान्य।
क्या साईं बाबा के अनेक हैं?
शिरडी के साईं बाबा (मूल) और सत्य साईं बाबा (पुट्टपर्थी) — दो अलग व्यक्ति हैं। यह चालीसा शिरडी के साईं बाबा के लिए है। सत्य साईं बाबा (१९२६–२०११) ने स्वयं को शिरडी साईं का पुनर्जन्म बताया था।
‘उदी’ क्या है?
उदी अर्थात् राख — वह पवित्र भस्म जो साईं बाबा की धूनी (सतत जलने वाली अग्नि) से प्राप्त होती है। बाबा भक्तों को उदी देते थे; भक्त इसे रोग-निवारण, मन-शान्ति, और रक्षा के लिए धारण करते। आज भी शिरडी में बाबा की धूनी निरंतर जलती है।
‘श्रद्धा सबूरी’ का क्या अर्थ है?
श्रद्धा = विश्वास, आस्था; सबूरी = धैर्य, संयम। ये दो शब्द साईं के सम्पूर्ण आध्यात्मिक उपदेश हैं। बाबा कहते — “जो मेरे पास इन दो को लेकर आता है, मैं उसे सब कुछ देता हूँ।”
क्या साईं चालीसा पाठ से चमत्कार होते हैं?
साईं भक्तों के असंख्य अनुभव-वृत्तांत हैं — रोग-निवारण, ऋण-मुक्ति, संकट-निवारण, मनोकामना-पूर्ति। ‘श्री साईं सच्चरित्र’ में ही ५३ अध्यायों में अनेक चमत्कार वर्णित हैं। परंतु बाबा स्वयं कहते — “मेरा चमत्कार नहीं — श्रद्धा का चमत्कार।”
क्या स्त्रियाँ रजस्वला अवस्था में पाठ कर सकती हैं?
बाबा ने स्वयं इन शास्त्रीय परिपाटियों से ऊपर उठकर शिक्षा दी। मानसिक पाठ सदैव अनुमत है। बाबा की दृष्टि में ‘श्रद्धा’ ही सर्वोपरि है।
शिरडी जाना क्या आवश्यक है?
आदर्श है, परंतु आवश्यक नहीं। बाबा कहते — “जो मेरा स्मरण करता है, मैं उसके पास हूँ।” घर पर श्रद्धा से चालीसा पाठ शिरडी-यात्रा के समतुल्य फलदायी।
क्या साईं चालीसा को आरती से पहले पढ़ना चाहिए?
हाँ। पारंपरिक क्रम — पहले चालीसा-पाठ, फिर साईं की चार दैनिक आरतियाँ (काकड़, मध्याह्न, धूप, शेज) में से समय-अनुसार उपयुक्त। शिरडी में चारों आरतियाँ निश्चित समय पर होती हैं।
‘दत्तात्रेय अवतार’ का क्या अर्थ है?
दत्तात्रेय ब्रह्मा-विष्णु-महेश के संयुक्त रूप हैं — त्रिदेव अवतार। साईं को दत्तात्रेय परंपरा का अवतार माना गया, क्योंकि उनमें तीनों गुण थे — ब्रह्मा का सृजन-ज्ञान, विष्णु की पालन-दया, शिव का संहार-सामर्थ्य।