आरती साईं बाबा
By श्री माधव अडकर (पारंपरिक)२०वीं शताब्दी का प्रारंभिक कालमराठी–हिन्दी मिश्रित
मूल पाठ
आरती साईं बाबा, सौख्यदातार जीवा।
चरण रजा-तली द्यावा, दासां विसावा॥
आरती साईं बाबा॥
जाऊनिया कर चरणी, ठेविला माथा।
परिसावी विनंती, माझी पंढरीनाथा।
चिंता निवारी ती दास, तुझे साईंनाथा॥
आरती साईं बाबा॥
विषय कल्पतरू तू, इच्छा-कामधेनू।
मी तव चरणकमळी, राहे रात्रंदिन।
दीन-अनाथ-वत्सल, त्राता तुझा शरण॥
आरती साईं बाबा॥
जय जय साईं नाथा, बाबा साईं नाथा।
श्रद्धा-सबूरी दे ज्ञान, हरि-गुरु एका रूप।
दीन-दयाल भगवन्, तू आदि-स्वरूप॥
आरती साईं बाबा॥
रहम नज़र करो, अब मेरा साईं।
तुम बिन नहिं मुझ को, माँ-बाप-भाई।
मैं अंधा हूँ बंदा, तेरा तू दाता।
मैं हूँ अनाथ नाथ, तू सब का माता॥
आरती साईं बाबा॥
राम कृष्ण और शिव-शक्ति, बस तुम्हीं हो साईं।
सब के मालिक एक, तुम्हीं ने सिखाई।
हिन्दू मुस्लिम सब को, एक रूप में बाँधा।
मस्जिद-मन्दिर एक, तुम्हीं ने जगाया॥
आरती साईं बाबा॥
उदी का है यह तिलक, मस्तक पर लगा दो।
श्रद्धा सबूरी का यह, मन में बसा दो।
‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’ का, वचन निभा दो।
हर भक्त के घर तुम, साईं समा जाओ॥
आरती साईं बाबा॥
जो यह आरती गावे, श्रद्धा से पुकारे।
ता का जीवन सरल, सुख-शान्ति में बहारे।
साईं सच्चरित्र पढ़ कर, मन को तू सँवारे।
रोज़ गुरुवार साईं, दर्शन को पधारे॥
आरती साईं बाबा॥
आरती साईं बाबा, सौख्यदातार जीवा।
चरण रजा-तली द्यावा, दासां विसावा॥
अर्थ
यह आरती मूलतः मराठी में रची गई थी और शिरडी की चार दैनिक आरतियों में से एक है। बाद में हिन्दी-मराठी मिश्रित संस्करण उत्तर भारत में लोकप्रिय हुआ। यहाँ प्रचलित संस्करण है।
टेक — हे साईं बाबा, तुम्हारी आरती करता हूँ — तुम जीवों को सौख्य (सुख) देने वाले हो। अपने चरण-रज की छाया दो; अपने दासों को विश्राम दो।
अंतरा १ — हाथ जोड़कर तुम्हारे चरणों में मस्तक रखता हूँ। हे पंढरीनाथ (विट्ठल-स्वरूप), मेरी विनती सुनो। साईंनाथ, तुम्हारे दास की चिंता निवारण कर दो।
अंतरा २ — तुम कल्पतरु (विषयों के मनवांछित-दाता वृक्ष) हो, इच्छा-पूर्ति की कामधेनु हो। मैं तुम्हारे चरण-कमलों में रात-दिन निवास करूँ। दीन-अनाथों के वत्सल, त्राता — तुम्हारी शरण।
अंतरा ३ — साईंनाथ की जय हो। श्रद्धा-सबूरी का ज्ञान दो। हरि और गुरु — एक ही रूप हो। दीन-दयाल भगवान्, तुम आदि-स्वरूप हो।
अंतरा ४ (हिन्दी अंतरा) — रहम नज़र करो, मेरे साईं। तुम बिन कोई माँ-बाप-भाई नहीं। मैं अंधा बंदा हूँ; तुम दाता हो। मैं अनाथ हूँ, हे नाथ; तुम सबकी माता हो।
अंतरा ५ — राम, कृष्ण, शिव, शक्ति — सब तुम्हीं हो साईं। ‘सबका मालिक एक’ यह तुम्हीं ने सिखाया। हिन्दू-मुस्लिम सब को एक रूप में बाँधा; मस्जिद-मंदिर एक हैं — यह तुम्हीं ने जगाया।
अंतरा ६ — उदी का तिलक मस्तक पर लगाओ। श्रद्धा-सबूरी मन में बसाओ। ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’ का वचन निभाओ। हर भक्त के घर साईं समा जाओ।
अंतरा ७ — जो यह आरती श्रद्धा से गाता है — उसका जीवन सरल, सुख-शान्ति से भर जाता है। साईं सच्चरित्र पढ़ कर मन को सँवारे। हर गुरुवार साईं-दर्शन को आए।
इतिहास
मूल मराठी आरती ‘आरती साईं बाबा’ की रचना श्री माधव अडकर ने की थी (२०वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में)। यह शिरडी की चार दैनिक आरतियों में से एक है, जो शिरडी मंदिर में सुबह से रात तक निश्चित समय पर गाई जाती हैं:
| समय | आरती का नाम | आशय |
|---|---|---|
| ४:३० AM | काकड़ आरती | जागरण आरती |
| १२:०० PM | मध्याह्न आरती | दोपहर की पूजा |
| सूर्यास्त | धूप आरती | संध्या आरती |
| रात्रि १०:३० PM | शेज आरती | शयन आरती |
यहाँ प्रस्तुत ‘आरती साईं बाबा, सौख्यदातार जीवा’ मुख्य रूप से मध्याह्न एवं धूप आरती का अंग है।
बाद में उत्तर भारत के साईं भक्तों ने इसमें हिन्दी अंतरे जोड़े — विशेषकर ‘रहम नज़र करो’ (जो साईं के मूल इस्लामी-शैली के बंदगी-प्रार्थना का स्मरण कराता है) और ‘राम-कृष्ण और शिव-शक्ति’ (जो साईं के सर्व-धर्म-समभाव-संदेश को रेखांकित करता है)।
आज यह आरती:
- विश्व भर के साईं मंदिरों में दैनिक गायन
- गुरुवार को विशेष रूप से बड़ी संख्या में भक्तगण
- साईं सच्चरित्र पारायण के समापन पर
- साईं नवरात्रि के नौ दिनों में दो बार दैनिक
— सर्वत्र गाई जाती है।
गायन विधि
कब करें
- दैनिक प्रातः एवं संध्या आरती के समय
- गुरुवार — विशेष श्रद्धा से
- साईं नवरात्रि — दैनिक दो बार
- साईं पुण्यतिथि (१५ अक्टूबर / विजयादशमी)
- साईं सच्चरित्र पारायण के समापन पर
- यात्रा से पूर्व बाबा का आशीर्वाद माँगते हुए
कैसे करें
- पूजन के अंत में आरती गाई जाती है — चालीसा-पाठ अथवा सच्चरित्र-पाठ के पश्चात।
- थाली में पाँच बातियों का तेल का दीप (साईं तेल-दीप के विशेष भक्त), धूप, पुष्प, चंदन, उदी।
- दीप प्रज्वलन के साथ आरती आरंभ।
- आरती गाते हुए दीपक को क्लॉकवाइज़ घुमाते हुए सात बार चक्र पूर्ण करें।
- घंटी, ताली, अथवा शंख से ताल मिलाएँ।
- परिवार सब एक स्वर में गाएँ।
- आरती के पश्चात उदी का तिलक सब के माथे पर।
- पुष्पांजलि एवं तीन प्रदक्षिणा।
- साईं प्रसाद — गुड़-चना, मिष्ठान्न, अथवा खिचड़ी — का वितरण।
वाद्य संगति
पारंपरिक रूप से हारमोनियम, तबला, मंजीरा, ढोलक, और शंख के साथ। शिरडी मंदिर की आरतियों में पारंपरिक मराठी भजन-शैली का प्रयोग होता है — आज भी सुबह ४:३० बजे की काकड़ आरती सुनना अनुपम अनुभव।
महत्व
- शिरडी मंदिर की मानक आरती — चार दैनिक आरतियों का मूल अंग।
- मराठी-हिन्दी मिश्रण — मूल मराठी + उत्तर-भारतीय हिन्दी अंतरे = सर्व-भारतीय रूप।
- ‘सबका मालिक एक’ का गायन — साईं की केन्द्रीय शिक्षा का दैनिक स्मरण।
- ‘श्रद्धा-सबूरी’ का बोध — आरती में स्पष्ट रूप से अंकित।
- ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’ का आश्वासन — साईं के अंतिम वचन का दैनिक स्मरण।
सामान्य प्रश्न
क्या यह आरती और ‘काकड़ आरती’ एक हैं?
मूल काकड़ आरती (शिरडी की प्रातः ४:३० बजे की आरती) अधिक लम्बी है — उसमें माधव अडकर की कई रचनाओं का समावेश है। यह ‘आरती साईं बाबा’ मुख्य रूप से मध्याह्न एवं धूप आरतियों का अंग है। सामान्य घरों में यह सबसे अधिक गाई जाती है।
मराठी न जानने वाले कैसे गाएँ?
प्रारंभिक मराठी अंतरे — ‘जाऊनिया कर चरणी’, ‘विषय कल्पतरू तू’ — सरल हैं। हिन्दी-समझने वाले को थोड़े अभ्यास से समझ आ जाते हैं। ‘पंढरीनाथा’ का अर्थ है — ‘पंढरपुर के नाथ’ (विट्ठल / कृष्ण)। ‘जाऊनिया’ = जाकर। ‘परिसावी’ = सुनिए। आधुनिक हिन्दी अंतरे शुद्ध हिन्दी में हैं।
बच्चों को कैसे सिखाएँ?
टेक — ‘आरती साईं बाबा, सौख्यदातार जीवा’ — को बार-बार दोहराएँ। हिन्दी अंतरा ‘रहम नज़र करो, अब मेरा साईं’ भी बच्चों को आसानी से याद हो जाता है।
क्या इसके साथ अन्य आरतियाँ भी गानी चाहिए?
शिरडी में परंपरा है कि पाँच आरतियाँ एक क्रम में गाई जाती हैं। घर पर समय हो तो: (१) ‘ॐ सद्गुरु साईंनाथाय नमः’ का जप; (२) चालीसा-पाठ; (३) यह आरती; (४) ‘जय गणेश जय गणेश’; (५) ‘ॐ जय जगदीश हरे’। संक्षिप्त विधि में केवल यह आरती पर्याप्त।
उदी का प्रसाद कहाँ मिलता है?
शिरडी जाने पर बाबा की समाधि से उदी प्राप्त होती है — निःशुल्क वितरण। शिरडी न जा सकें तो किसी साईं मंदिर से उदी ले सकते हैं, अथवा घर में दीप जलाने के पश्चात बची हुई राख को ‘घर की उदी’ मानकर श्रद्धा से धारण करें।
स्त्रियाँ रजस्वला अवस्था में आरती गा सकती हैं?
बाबा की दृष्टि में श्रद्धा ही सर्वोपरि थी। मानसिक गायन सदैव अनुमत है। यदि कुछ संकोच हो तो दूर बैठकर मात्र दर्शन और मानसिक स्मरण भी पर्याप्त।
रागशास्त्र में यह आरती किस राग में है?
मूल मराठी संस्करण किसी विशिष्ट राग में बद्ध नहीं — पारंपरिक भक्ति-संगीत शैली में है। हिन्दी संस्करण राग खमाज अथवा राग पीलू में मधुर लगता है। लता मंगेशकर एवं अनूप जलोटा की रिकॉर्डिंग्स लोकप्रिय हैं।