गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्
By श्री बिल्वमंगल ठाकुर (लीला शुक)13वीं–14वीं शताब्दीसंस्कृत
मूल पाठ
करारविन्देन पदारविन्दं
मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं
बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥१॥
अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां
दुःशासनेनाहृतवस्त्रकेशा।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा
गोविन्द दामोदर माधवेति॥२॥
श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे
भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ
गोविन्द दामोदर माधवेति॥३॥
विक्रेतुकामा किल गोपकन्या
मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद्
गोविन्द दामोदर माधवेति॥४॥
उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च
सङ्घट्टयन्ती मुसलेन गोपी।
सुमधुरं गायति गीतमेकं
गोविन्द दामोदर माधवेति॥५॥
काल्या ह्रदस्थः सकलाहिनाथे
स्वगात्रनिःश्वासदशेन्द्रियाणि।
रुद्ध्वा क्षणं पश्यत यन्निशामं
गोविन्द दामोदर माधवेति॥६॥
मुकुन्द कृष्णानन्त गोविन्देति
पद्मनाभेति शिवस्य कण्ठे।
गायन्त्यमानानि प्रतिक्षणं तं
गोविन्द दामोदर माधवेति॥७॥
विहाय कर्माणि दहावहानि
देहावसाने भयदं गुरूणाम्।
अनेकजन्मान्तरसञ्चितानि
गोविन्द दामोदर माधवेति॥८॥
प्राणप्रयाणप्रभवे विमूढो
वाक्स्तम्भनेऽप्यन्यभरेण भीतः।
पीडोपसर्गव्यथितोऽपि गायेद्
गोविन्द दामोदर माधवेति॥९॥
जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं
सत्यं हितं त्वां परमं वदामि।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि
गोविन्द दामोदर माधवेति॥१०॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै
गोविन्द दामोदर माधवेति॥११॥
श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूर्ते
श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशत्रो।
जगन्निवास प्रणतार्तिबन्धो
गोविन्द दामोदर माधवेति॥१२॥
अर्थ
यह स्तोत्र एक अद्वितीय भाव लिए हुए है — कि जीवन के प्रत्येक क्षण में, सुख-दुख, संकट-कुशल, चेतन-अचेतन सभी अवस्थाओं में ‘गोविन्द दामोदर माधव’ का नाम-जप ही एकमात्र गति है।
छंद १ — कमल जैसे हाथ से कमल जैसा चरण मुख में रखकर, बरगद के पत्ते के दोने में सोते हुए बाल मुकुन्द का मैं मन से स्मरण करता हूँ। यह प्रलयकालीन वटपत्रशायी कृष्ण की प्रसिद्ध छवि है।
छंद २ — कौरवों और पाण्डवों की सभा में, जब दुःशासन ने वस्त्र और केश खींचे, तब अनन्य-नाथा द्रौपदी (कृष्णा) ने पुकारा — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ और कृष्ण ने वस्त्रहरण से रक्षा की।
छंद ३ — हे श्रीकृष्ण, हे विष्णु, हे मधु-कैटभ संहारक, हे भक्तदयालु, हे मुरारी — मुझे रक्षा करो, हे केशव, हे लोकनाथ — गोविन्द! दामोदर! माधव!
छंद ४ — एक गोपकन्या जो दही बेचने निकली थी, मुरारी के चरणों में चित्त लगाए हुए, मोहवश ‘दही लो’ कहने के स्थान पर पुकार उठी — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद ५ — ओखली में चावल कूटती हुई गोपी, मूसल चलाते हुए मधुर स्वर में एक ही गीत गाती है — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद ६ — कालिय नाग के ह्रद में अपने अंगों, श्वासों और दश इन्द्रियों को रोककर, कृष्ण ने जिस कालरात्रि का सामना किया — उसका दर्शन करो — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद ७ — मुकुन्द! कृष्ण! अनन्त! गोविन्द! पद्मनाभ! — ये नाम शिव के कंठ में प्रतिक्षण गाए जाते हैं — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद ८ — दाह देने वाले कर्म, मरण समय का भय, गुरुओं की चिंता, अनेक जन्मों के संचित पाप — सब को त्यागकर पुकारो — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद ९ — प्राण निकलते समय की मूढ़ता में, वाणी रुक जाने पर भय में, पीड़ा-व्याधि से व्यथित होने पर भी — गाओ — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद १० — हे रसज्ञ जिह्वा! तुम्हें मधुरता प्रिय है, मैं तुमसे सत्य और हितकर बात कहता हूँ — मधुरतम अक्षरों का उच्चारण करो — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद ११ — काया से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से, आत्मा से, अथवा प्रकृति के स्वभाव से जो भी कर्म मैं करता हूँ, वह सब परम परमात्मा के अर्पण है — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
छंद १२ — श्रीनाथ! विश्वेश्वर! विश्वमूर्ति! देवकीनन्दन! दैत्यशत्रु! जगन्निवास! प्रणतों के दुख का बंधन काटने वाले! — ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
इतिहास
गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् की रचना श्री बिल्वमंगल ठाकुर ने की है, जिन्हें लीला शुक भी कहा जाता है। वे १३वीं–१४वीं शताब्दी के दक्षिण भारतीय कृष्ण-भक्त संत थे, जिन्होंने अपने जीवन का अंतिम भाग वृन्दावन में बिताया।
बिल्वमंगल की प्रसिद्ध कथा यह है कि वे चिन्तामणि नामक गणिका के मोह में डूबे थे। एक रात वे यमुना पार करके उसके घर तक पहुँचे — जल पर तैरती लाश को नाव समझ बैठे, और सर्प को रस्सी समझकर खिड़की चढ़ गए। चिन्तामणि के एक वचन — ‘इतनी आसक्ति यदि कृष्ण में होती तो आज तुम मुक्त होते’ — ने उनके जीवन को पलट दिया। उन्होंने अपनी आँखें फोड़ लीं ताकि संसार न दीखे और कृष्ण ही दीखें — और तब से वे ‘लीला शुक’ कहलाए।
उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं — ‘श्री कृष्ण कर्णामृतम्’ (कृष्ण के लीलाओं का काव्यमय वर्णन) और ‘गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्’। दोनों रचनाएँ संस्कृत में हैं, परंतु इनमें भक्ति का स्वर ऐसा है कि चैतन्य महाप्रभु तक इनसे प्रभावित थे — कृष्ण कर्णामृतम् को चैतन्य अपने साथ नीलाचल लाए थे।
गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् की मुख्य विशेषता यह है कि प्रत्येक छंद का अंत ‘गोविन्द दामोदर माधवेति’ से होता है। यह एक नाम-स्तोत्र है — स्तोत्र पाठ करते-करते आप वस्तुतः नाम-जप कर रहे होते हैं।
पाठ विधि
कब करें
- दैनिक प्रातः या संध्या साधना में
- एकादशी, जन्माष्टमी, राधाष्टमी आदि व्रतों पर
- मरणासन्न व्यक्ति के समीप — यह विशेष रूप से अंतकाल में पाठ्य स्तोत्र है
- संकट काल में — रोग, भय, चिंता, परीक्षा आदि के समय
- यात्रा प्रारंभ या किसी कठिन कार्य से पहले
कैसे करें
- शुद्ध स्थान पर श्री कृष्ण की प्रतिमा/चित्र के सम्मुख आसन ग्रहण करें।
- तुलसी पत्र, पुष्प, धूप-दीप अर्पण करें।
- हाथ जोड़कर एक संकल्प लें — चाहे रक्षा का, चाहे शांति का, चाहे केवल भक्ति का।
- छंदों का मधुर उच्चारण करें। प्रत्येक छंद के अंत में ‘गोविन्द दामोदर माधवेति’ पर थोड़ा रुककर भाव पकड़ें।
- पूरे स्तोत्र के बाद कम से कम ११ बार ‘गोविन्द दामोदर माधव’ का नाम-जप करें।
- तुलसी जल ग्रहण कर ध्यान में बैठें।
विशेष विधि — अंतकाल पाठ
जब किसी प्रिय व्यक्ति का अंत समय निकट हो, तो शय्या के पास बैठकर इस स्तोत्र का धीमी आवाज़ में पाठ करना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। नौवाँ छंद — प्राणप्रयाणप्रभवे विमूढो — विशेष रूप से इसी समय के लिए है।
महत्व
- नाम-जप का सशक्त माध्यम — स्तोत्र पाठ करते-करते सहज ही नाम-जप हो जाता है। प्रत्येक छंद का अंत मंत्र है।
- द्रौपदी-स्मरण — दूसरे छंद का सीधा संकेत यह है कि कृष्ण भक्त की पुकार अनसुनी नहीं रहती।
- अंतकाल का संरक्षक — गीता का कथन है ‘अन्ते मतिः सा गतिः’ — अंतकाल जिसका स्मरण होता है, वही गति मिलती है। यह स्तोत्र अंतकाल-स्मरण की कला है।
- सर्व-कर्म-समर्पण — ग्यारहवाँ छंद वही है जो गीता के ‘सर्व-धर्मान्-परित्यज्य’ का स्तोत्र-रूप है।
- सरल संस्कृत — शब्दावली कठिन नहीं है; नियमित पाठ से याद हो जाता है।
सामान्य प्रश्न
क्या यह स्तोत्र केवल मरणासन्न व्यक्ति के लिए है?
नहीं। यह जीवन के हर पड़ाव के लिए है। परंतु अंतकाल में इसका विशेष महत्व बताया गया है। दैनिक पाठ से अंतकाल का स्मरण स्वतः सुलभ हो जाता है।
क्या इसे संगीत के साथ गाया जाता है?
हाँ। ‘गोविन्द दामोदर माधव’ का नाम-संकीर्तन ही प्रसिद्ध गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् कीर्तन है। यह सरल धुन में, ताल मिलाकर, समूह में गाया जाता है। अनेक भक्तगण घंटों इसका कीर्तन करते हैं।
स्तोत्र में कितने छंद हैं?
विभिन्न पांडुलिपियों में संख्या भिन्न है — ६० से ८० तक। यहाँ १२ प्रमुख छंद दिए गए हैं जो सबसे अधिक पाठ्य हैं। पूर्ण पाठ करना हो तो प्रकाशित संस्करण देखें।
द्रौपदी की पुकार वाला छंद कितना सच है?
यह कथा महाभारत के सभा पर्व में है, परंतु वहाँ द्रौपदी ‘गोविन्द! द्वारकावासिन्!’ कहती है। ‘गोविन्द दामोदर माधव’ तीनों नामों का एक साथ प्रयोग बिल्वमंगल का काव्य-गुम्फन है — परंतु भाव वही है।
क्या इसे रोज़ पढ़ने की आवश्यकता है?
आवश्यक नहीं, परंतु लाभप्रद है। यदि समय न हो तो केवल नाम — ‘गोविन्द दामोदर माधव’ — दिन में जब भी संभव हो, मन ही मन दोहराना भी पर्याप्त है।
क्या यह स्तोत्र किसी विशेष सम्प्रदाय का है?
नहीं। बिल्वमंगल किसी एक सम्प्रदाय के नहीं हैं — गौड़ीय वैष्णव, श्रीवैष्णव, पुष्टि मार्ग, और निम्बार्क — सभी परंपराओं में उनका सम्मान है और सभी इस स्तोत्र को पढ़ते हैं।