आदित्य हृदयम्
By अगस्त्य ऋषि (वाल्मीकि रामायण, युद्ध काण्ड)वैदिक–पौराणिक कालसंस्कृत
मूल पाठ
प्रस्तावना (युद्ध काण्ड १०५/१-५)
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवांस्तदा॥
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम्॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्॥
स्तोत्र
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥१॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान्पाति गभस्तिभिः॥२॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥३॥
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥४॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥५॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्ड अंशुमान्॥६॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥७॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥८॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः॥९॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥१०॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥११॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥१२॥
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः॥१३॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥१४॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥१५॥
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥१६॥
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥१७॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥१८॥
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥१९॥
फलश्रुति
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन्पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥२०॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥२१॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥२२॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥२३॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥२४॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥२५॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥२६॥
अर्थ
आदित्य हृदयम् वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड के १०५वें सर्ग से उद्धृत है। यह वह स्तोत्र है जो अगस्त्य ऋषि ने श्री राम को रावण-वध से पूर्व सिखाया था — श्री राम तब युद्ध-परिश्रांत और रावण को सम्मुख देख चिंताग्रस्त थे।
प्रस्तावना (छंद १-५) — अगस्त्य ऋषि देव-गणों के साथ रण-दर्शन के लिए आते हैं। राम को थका हुआ देखकर आदित्य हृदयम् सिखाते हैं — “हे राम, यह सनातन गुह्य रहस्य सुनो जिससे तुम सब शत्रुओं पर विजय पाओगे।”
छंद १ — रश्मियों वाले, उदय होते, देव-असुर दोनों द्वारा नमस्कृत — विवस्वान्, भास्कर, भुवनेश्वर सूर्य की पूजा करो।
छंद २-३ — सूर्य सर्व-देव-आत्मक हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, सोम, वरुण — सब सूर्य-स्वरूप।
छंद ४-१० — सूर्य के अनेक नाम: पितर, वसु, साध्य, अश्विन, मरुत, मनु, वायु, वह्नि, ऋतुकर्ता, आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान्, भानु, हिरण्यरेता, दिवाकर, हरिदश्व, सहस्रार्चिः, सप्तसप्ति, मरीचिमान्, तिमिरोन्मथन, शम्भु, त्वष्टा, मार्तण्ड, अंशुमान्, हिरण्यगर्भ, शिशिर, तपन, भास्कर, रवि।
छंद ११ — पूर्व पर्वत और पश्चिम पर्वत को नमस्कार — सूर्य के उदय और अस्त के स्थान।
छंद १२-१६ — विभिन्न नामों से नमस्कार — जय, जयभद्र, हर्यश्व, सहस्रांशु, आदित्य, उग्र, वीर, सारंग, पद्म-प्रबोधक, मार्तण्ड, ब्रह्मेशानाच्युतेश, सूर्य, भास्वान्, सर्वभक्षक, रौद्र, तमोघ्न, हिमघ्न, शत्रुघ्न।
छंद १७-१९ — सूर्य की लीलाएँ: सृजन, पालन, संहार; अग्निहोत्र का फल; वेदों एवं यज्ञों का परम सार।
छंद २०-२६ (फलश्रुति) — “हे राघव, जो भी पुरुष आपत्ति-संकट-दूर-यात्रा-भय में इसका कीर्तन करता है, वह कभी निराश नहीं होता। एकाग्र होकर इस देव-देव जगत्-पति की पूजा करो — तीन बार जप कर युद्ध में विजयी होओगे। हे महाबाहु, इसी क्षण तुम रावण को मारोगे।” — इस प्रकार कहकर अगस्त्य लौट गए। राम ने अपना शोक छोड़ा, सूर्य को देखकर तीन बार जप किया, धनुष उठाया — और रावण-वध के लिए तत्पर हुए।
इतिहास
आदित्य हृदयम् वाल्मीकि रामायण के सबसे प्रसिद्ध स्तोत्रों में से एक है। युद्ध काण्ड के १०५वें सर्ग में स्थित यह स्तोत्र विशिष्ट रूप से रावण-वध से पहले राम को दिया गया।
अगस्त्य ऋषि सप्तर्षियों में से एक हैं — दक्षिण भारतीय संस्कृति, संस्कृत-तमिल भाषा-संगम, और शत्रुघ्न-तप की परम्परा से जुड़े। महाभारत और रामायण दोनों में उनका उल्लेख है।
‘आदित्य हृदयम्’ का अर्थ — ‘सूर्य का हृदय’ — अर्थात् सूर्य-तत्त्व का सार। यह नाम सुझाता है कि स्तोत्र में सूर्य की केवल बाह्य रूप-विधि नहीं, बल्कि हृदय (आंतरिक रहस्य) भी निहित है।
केन्द्रीय भाव — स्तोत्र की दृष्टि एकेश्वरवादी है। सूर्य ही सर्व-देवता हैं — ब्रह्मा-विष्णु-शिव सब सूर्य के रूप। यह वैदिक ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ (एक सत्य, विद्वान् अनेक रूप में कहते हैं) का प्रत्यक्ष उदाहरण।
आधुनिक प्रचलन — आदित्य हृदयम् आज:
- सूर्य मंदिरों में दैनिक पाठ
- रथ सप्तमी का अनिवार्य अंग
- छठ पूजा के अंतिम अर्घ्य के समय
- युद्ध, परीक्षा, साक्षात्कार, कठिन कार्य से पूर्व — विजय-कामना से
- रोग-निवारण के विशेष अनुष्ठानों में
— सर्वत्र पाठ्य है। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का प्रसिद्ध संस्करण विश्व-भर में प्रिय है।
पाठ विधि
कब करें
- दैनिक प्रात:काल — सूर्योदय के समय (सर्वोत्तम)
- रविवार — विशेष फलदायी
- रथ सप्तमी, छठ पूजा, मकर संक्रांति — विशेष पर्व
- युद्ध / परीक्षा / साक्षात्कार / कठिन कार्य से पूर्व
- रोग-निवारण के लिए — विशेषकर हृदय-संबंधी, नेत्र-संबंधी, चर्म-रोग
- यात्रा से पूर्व — मार्ग-संरक्षण के लिए
कैसे करें
- ब्रह्म-मुहूर्त (४:०० बजे) उठें; स्नान करें।
- पूर्व दिशा की ओर मुख कर खड़े हों।
- तांबे के लोटे में जल; लाल पुष्प, चावल, रोली डालकर सूर्य को अर्घ्य दें।
- आसन ग्रहण कर गायत्री मंत्र का ११ बार जप।
- आदित्य हृदयम् का पाठ स्पष्ट उच्चारण से।
- तीन बार अथवा एक बार — संकल्प के अनुसार।
- पाठ के पश्चात ‘जयाय जय-भद्राय हर्य-अश्वाय नमो नमः’ का स्मरण।
- कम से कम ५ मिनट का सूर्य-दर्शन अथवा सूर्य-ध्यान।
विशेष विधि — विजय अनुष्ठान
युद्ध, परीक्षा, साक्षात्कार, अथवा किसी विशेष विजय-कामना के लिए:
- ४१ दिनों का संकल्प
- प्रतिदिन सूर्योदय के समय तीन बार पाठ (रामचन्द्र को अगस्त्य ने तीन बार जप का आदेश दिया था)
- एकाहार-व्रत (दिन में एक बार भोजन)
- लाल वस्त्र एवं लाल चंदन का तिलक
- ४१वें दिन — सूर्य-नमस्कार २१ बार + आदित्य हृदयम् का सात बार पाठ + सूर्य-दर्शन
रोग-निवारण विधि
विशेषकर हृदय एवं नेत्र रोगों के लिए:
- तांबे के पात्र में जल — रात भर रखकर प्रात: पीना
- सूर्य-दर्शन के समय आदित्य हृदयम् का पाठ
- लाल चंदन-तिलक
- गुड़ का दान रविवार को
महत्व
- वाल्मीकि रामायण से उद्धृत — सीधे महाकाव्य से प्राप्त; आधिकारिक एवं प्रामाणिक।
- राम-स्वयं-अनुभूत — श्री राम ने स्वयं इसे जपकर रावण-वध किया।
- एकेश्वरवादी दृष्टि — सूर्य ही सर्व-देव-स्वरूप।
- ‘सर्व-शत्रु-विनाशनम्’ — अंतर्बाह्य सब प्रकार के शत्रुओं का नाश।
- ‘आयुर्वर्धनम्’ — आयु-वर्धन का स्पष्ट आश्वासन।
सामान्य प्रश्न
क्या आदित्य हृदयम् केवल युद्ध-समय का है?
मूल संदर्भ युद्ध है, परंतु अगस्त्य के शब्दों में स्पष्ट है — “आपत्तियों, कष्टों, दूर-यात्राओं, भय में” — सब परिस्थितियों में पाठ्य। आज इसे सर्व-संकट-निवारक के रूप में पढ़ा जाता है।
कितने छंद हैं?
मूल वाल्मीकि रामायण में २६ छंद हैं — १८ छंद पूजा-अंश, ८ छंद फलश्रुति/कथा। यहाँ १९ छंदों का स्तोत्र-भाग दिया गया है। पारंपरिक संस्करणों में ३१ छंद की गणना मिलती है (कुछ अतिरिक्त छंदों के साथ)।
तीन बार पाठ क्यों?
अगस्त्य ने राम से कहा — “एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा” — “इसका तीन बार जप करके।” इसलिए तीन बार पाठ का विशेष महत्व। दैनिक एक बार पर्याप्त, परंतु विशेष संकल्प में तीन बार आदर्श।
क्या स्त्रियाँ आदित्य हृदयम् पढ़ सकती हैं?
बिल्कुल। यह संस्कृत-स्तोत्र है, और संस्कृत-स्तोत्रों के पाठ का अधिकार सबको है। रजस्वला अवस्था में मानसिक पाठ अनुमत।
क्या यह स्तोत्र सूर्य के अलावा किसी और देवता का स्मरण कराता है?
स्तोत्र की मुख्य धारणा है — सूर्य ही सर्व-देव-स्वरूप। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, सोम — सब सूर्य के रूप। अतः यह सूर्य-स्तोत्र होते हुए भी सम्पूर्ण देव-वंदना है।
सर्वोत्तम राग में संगीतमय संस्करण?
एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का प्रसिद्ध संस्करण राग शुद्ध सावेरी में। डॉ. के. जे. येसुदास का संस्करण राग सूर्या में। पं. जसराज एवं अनूप जलोटा के भी प्रसिद्ध संस्करण।
राम-कथा से इसका क्या संबंध?
सीधा संबंध — यह स्तोत्र राम को रावण-वध से पहले अगस्त्य ने सिखाया, और राम ने स्वयं इसे जपकर युद्ध जीता। यह राम-नाम का सूर्य-पक्ष है। राम-भक्त भी इसे विशेष श्रद्धा से पढ़ते हैं।