सरस्वती वंदना — या कुन्देन्दु तुषार हार धवला
By पारंपरिक (परम्परा से उद्धृत)प्राचीन (पुराण-काल)संस्कृत
मूल पाठ
या कुन्देन्दु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता।
या वीणा वर दण्ड मण्डित करा, या श्वेत पद्मासना॥
या ब्रह्माच्युत शंकर प्रभृतिभिः, देवैः सदा वन्दिता।
सा माम् पातु सरस्वती भगवती, निःशेष जाड्यापहा॥
अर्थ
यह संस्कृत वंदना एक ही श्लोक की है — परंतु इसमें माँ सरस्वती का सम्पूर्ण स्वरूप, गुण, और कृपा-शक्ति निहित है। यह विद्या-आरंभ, अध्ययन-प्रारंभ, और किसी भी शैक्षणिक कार्य के पूर्व पढ़ी जाने वाली सर्वोच्च वंदना है।
पंक्ति-वार अर्थ:
‘या कुन्देन्दु तुषार हार धवला’ — जो कुन्द (एक श्वेत पुष्प) के समान, इन्दु (चंद्रमा) के समान, तुषार (हिम) के समान, और हार (मोती की माला) के समान धवल (श्वेत) है।
‘या शुभ्र वस्त्रावृता’ — जो शुभ्र (शुद्ध श्वेत) वस्त्र से ढकी हुई है।
‘या वीणा वर दण्ड मण्डित करा’ — जिसके हाथ वीणा के श्रेष्ठ दण्ड (वीणा-यष्टि) से सुशोभित हैं।
‘या श्वेत पद्मासना’ — जो श्वेत पद्म (कमल) पर आसीन है।
‘या ब्रह्माच्युत शंकर प्रभृतिभिः, देवैः सदा वन्दिता’ — जो ब्रह्मा, अच्युत (विष्णु), शंकर (शिव) आदि देवताओं द्वारा सदा वन्दित (पूजित) हैं।
‘सा माम् पातु सरस्वती भगवती’ — वही माँ सरस्वती भगवती मेरी रक्षा करें।
‘निःशेष जाड्यापहा’ — जो सम्पूर्ण रूप से जाड्य (जड़ता, मन्दता, अज्ञान) को दूर करने वाली हैं।
पूरे श्लोक का सार — “जो श्वेत पुष्प, चंद्रमा, हिम, और मोती-माला के समान धवल हैं; जो श्वेत वस्त्र पहने हैं; जिनके हाथ वीणा के श्रेष्ठ दण्ड से सुशोभित हैं; जो श्वेत कमल पर आसीन हैं; जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवता सदा वन्दना करते हैं — वे माँ सरस्वती भगवती, जो जड़ता को सम्पूर्ण रूप से दूर कर देती हैं — मेरी रक्षा करें।”
इतिहास
‘या कुन्देन्दु’ वंदना के सटीक रचयिता का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह पुराण-काल की रचना मानी जाती है, और परंपरा से प्रसिद्ध है। कुछ परंपराएँ इसे अगस्त्य ऋषि से, कुछ विष्णु पुराण से जोड़ती हैं — परंतु पाण्डुलिपि-प्रमाण निर्णायक नहीं है।
जो भी हो, यह श्लोक भारत की सम्पूर्ण विद्या-परंपरा का प्रवेश-मंत्र बन चुका है। आज:
- विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की प्रत्येक प्रार्थना सभा में इसका गायन
- पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर इसका मुद्रण (विशेषकर संस्कृत एवं हिन्दी पुस्तकों में)
- विद्यारंभ संस्कार एवं अक्षराभ्यास के समय अनिवार्य
- परीक्षा-पूर्व विद्यार्थियों द्वारा पाठ
- प्रवचन/कथा के आरंभ में मंगलाचरण के रूप में
- नवरात्रि एवं बसंत पंचमी के सरस्वती पूजन में
— सर्वत्र इस श्लोक का पाठ होता है।
छंद — यह शार्दूलविक्रीडित छंद में है, जो संस्कृत के सबसे प्रसिद्ध एवं भव्य छंदों में से एक है। प्रत्येक चरण में १९ अक्षर हैं, जिनकी लय में स्वाभाविक भव्यता है। यही कारण है कि श्लोक मात्र पढ़ने पर ही ‘मंगल’ का अनुभव होता है।
पाठ विधि
कब करें
- दैनिक प्रातः अध्ययन प्रारंभ से पूर्व
- विद्यालय/विश्वविद्यालय की प्रार्थना सभा में
- परीक्षा-कक्ष में बैठने से पूर्व (मन ही मन)
- पुस्तक खोलने से पूर्व — विशेषकर ग्रंथों के अध्ययन में
- बसंत पंचमी, विद्यारंभ संस्कार, नवरात्रि के सप्तमी-दिन
कैसे करें
- एकाग्र मन से बैठें। हाथ जोड़कर सरस्वती-स्मरण।
- एक से ११ बार शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
- प्रत्येक पाठ के साथ माँ की श्वेत-स्वरूप की कल्पना करें — श्वेत वस्त्र, श्वेत कमल, श्वेत हंस।
- अंतिम पंक्ति ‘निःशेष जाड्यापहा’ पर विशेष ध्यान दें — यह जड़ता-नाश का संकल्प है।
तीन प्रमुख विधियाँ
विद्यार्थी विधि — अध्ययन के पूर्व ३ बार पाठ; पुस्तक को माथे से लगाकर खोलना।
विद्वान विधि — प्रवचन, लेखन, अनुसंधान-कार्य के पूर्व ११ बार पाठ; अंत में ‘सरस्वत्यै नमः’ का जप।
अनुष्ठान विधि — सरस्वती-यंत्र के सम्मुख १०८ बार पाठ; ४१ दिन का संकल्प।
बच्चों के लिए
बच्चों को यह श्लोक प्रथम सिखाया जाने वाला संस्कृत-मंत्र हो सकता है। उच्चारण के लिए श्लोक को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटें:
- ‘या कुन्देन्दु’ — ‘तुषार हार धवला’ — ‘या शुभ्र वस्त्रावृता’
- ‘या वीणा वर दण्ड’ — ‘मण्डित करा’ — ‘या श्वेत पद्मासना’
बच्चे प्रत्येक भाग को तीन-तीन बार दोहराएँ, फिर पूरा श्लोक एकत्र करें। एक सप्ताह में याद हो जाता है।
महत्व
- संक्षिप्ततम सरस्वती स्तोत्र — एक श्लोक में सम्पूर्ण देवी का चित्रण।
- ‘जाड्यापहा’ — मन्दता-अज्ञान के नाश का सीधा संकल्प।
- त्रिदेव-वन्दिता — ब्रह्मा-विष्णु-शिव तीनों जिनकी वन्दना करते हैं — माँ की सर्वोच्चता का घोषणा।
- शार्दूलविक्रीडित छंद — संस्कृत के सर्वाधिक भव्य छंदों में।
- सर्वत्र-प्रचलित — विद्यालयों, मंचों, पुस्तकों, और घरों में सर्वव्यापी।
सामान्य प्रश्न
क्या यह श्लोक ‘सरस्वती ध्यान मंत्र’ से अलग है?
मूलतः नहीं। यही श्लोक ‘सरस्वती ध्यान मंत्र’, ‘सरस्वती वन्दना’, ‘सरस्वती मंगलाचरण’ — विभिन्न नामों से जाना जाता है। यह सबसे प्रसिद्ध एक-श्लोकी सरस्वती स्तुति है।
क्या इसे केवल विद्यार्थियों के लिए बताया गया है?
नहीं। हर ज्ञान-कर्म के पूर्व इसका पाठ श्रेष्ठ है — चाहे विद्यार्थी हो, विद्वान हो, अध्यापक, लेखक, कवि, गायक, या कोई भी जो वाणी-विद्या-कला से सम्बद्ध है।
क्या इसे विद्यार्थी रजस्वला अवस्था में पढ़ सकती हैं?
मानसिक पाठ सदैव अनुमत है। शास्त्रीय परंपरा में सस्वर पाठ के परिहार का कुछ मत है, परंतु आधुनिक आचार्यों का विशाल बहुमत मानसिक स्मरण को सर्वकाल में फलदायी मानता है। परीक्षा-काल हो तो अवश्य पाठ करें।
क्या इसे पुस्तक के पहले पृष्ठ पर मुद्रित किया जाना चाहिए?
पारंपरिक हिन्दी एवं संस्कृत पुस्तकों में यह ‘मंगलाचरण’ के रूप में पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर मुद्रित होता था। आज कुछ प्रकाशन (विशेषकर गीता प्रेस गोरखपुर) इसे जारी रखे हुए हैं। पाठक पुस्तक खोलते समय इसका पाठ करते थे — यह विद्या-वंदना की प्राचीन परम्परा है।
क्या इसके साथ कोई बीज-मंत्र है?
हाँ। ‘ऐं’ सरस्वती का बीज-मंत्र है। श्लोक से पूर्व अथवा पश्चात् ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ का ११ बार जप विशेष फलदायी।
क्या इसका कोई विशेष राग में संगीतमय रूप है?
हाँ। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का प्रसिद्ध संस्करण राग यमन कल्याण में है। पं. भीमसेन जोशी ने भी इसे गाया है। राग शुद्ध सारंग एवं राग वसन्त में भी प्रसिद्ध संस्करण उपलब्ध हैं।
श्लोक का छंद क्या है?
शार्दूलविक्रीडित — १९ अक्षर प्रति चरण। यह संस्कृत के सबसे भव्य छंदों में से एक है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘शार्दूल (शेर/बाघ) की विक्रीडित (क्रीड़ा-गति)’ — अर्थात् सिंह की चाल जैसी भव्यता।
‘जाड्य’ का सटीक अर्थ क्या है?
‘जाड्य’ का अर्थ केवल ‘अज्ञान’ नहीं — बल्कि जड़ता, मन्दता, मन की कुंठा, स्मृति-दुर्बलता, समझने की धीमी शक्ति आदि सब शामिल हैं। ‘निःशेष जाड्यापहा’ — सम्पूर्ण रूप से जड़ता का नाश। विद्यार्थी के लिए यह सबसे बड़ा वरदान है।