श्री सरस्वती चालीसा
By पारंपरिक (अज्ञात रचयिता)१९वीं–२०वीं शताब्दीखड़ी बोली
मूल पाठ
दोहा
जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनन्त।
रामसागर के पाप को, मातु तू ही हन्त॥
चौपाई
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्व विद्या प्रकाशी॥१॥
जय जय जय वीणा-कर-धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥२॥
रूप चतुर्भुज धारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥३॥
जग में पाप-बुद्धि जब होती। तबहि धर्म की फीकी ज्योति॥४॥
तबहि मातु ले निज अवतारा। पाप हीन करती महि तारा॥५॥
बाल्मीकि जी थे हत्यारा। तव प्रसाद जानै संसारा॥६॥
रामचरित जो रचेन बनाई। आदि कवि की पदवी पाई॥७॥
कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥८॥
तुलसी सूर आदि विद्वाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥९॥
तिनकी मति विकसित हे माता। तुम जन-मन की हो दात्ता॥१०॥
राम प्रताप जो रच्यो रामायण। मेरे मन में भयो उद्योग॥११॥
मोहि जिताय हे माता उतारी। तेरे चरण में लूँ निहारी॥१२॥
मोहि सद्बुद्धि देहु महरानी। मम विद्या में हो वृद्धि सानी॥१३॥
विद्या-दात्री वीणा-धारिणि। हंस-वाहिनी भव-भय-हारिणि॥१४॥
ब्रह्मा की पुत्री और पत्नी। सरस्वती की कीर्ति है अग्नि॥१५॥
श्वेत वस्त्र पहिने हे माता। श्वेत कमल आसन सुहाता॥१६॥
श्वेत हंस तुम्हरी सवारी। श्वेत-शुभ्र-शुचि-वसन-धारी॥१७॥
पुस्तक हाथ में सजती न्यारी। ज्ञान-संहिता की हो धारी॥१८॥
वीणा से जो स्वर निकालो। सब के मन को मोह तू डालो॥१९॥
ध्यान करत जो भक्त तुम्हारा। ता पर तू करती उद्धारा॥२०॥
विद्यार्थी जो तुम्हें ध्यावै। ता को विद्या वर मिल जावै॥२१॥
संगीत-कला जिन में होती। ता पर मातु तेरी ज्योति॥२२॥
लेखक-कवि-वक्ता हो जाते। तुम्हरी कृपा से जो प्रसन्न माते॥२३॥
मूक भये जो तुम्हें ध्यावै। वाणी से वह वाक्-पटु पावै॥२४॥
बुद्धि-हीन जो शरण में आता। पावै ज्ञान बिना पटु बाता॥२५॥
बसंत पंचमी तेरा वारा। पुष्प-धूप-दीप उभारा॥२६॥
पीत वस्त्र पहिने सब प्राणी। श्रद्धा से करते स्तुति वाणी॥२७॥
सरसों के पीले फूल चढ़ाते। मनवांछित फल तब पाते॥२८॥
बच्चे अक्षर-ज्ञान करत हैं। तेरे सम्मुख माथ धरत हैं॥२९॥
विद्या आरम्भ इसी दिन होवे। बच्चे पट्टी पर अक्षर लिख होवे॥३०॥
जो नर पूजै तुम्हें श्रद्धा सों। हो जावै बुद्धिवान सरलहों॥३१॥
विद्या-धन तब बढ़ता जाता। यश-प्रतिष्ठा घर में आता॥३२॥
मंद-मति को तीव्र-मति देती। दीन-हीन को कीर्ति देती॥३३॥
मूक-वधिर सब वाणी पाते। अंध-अपढ़ भी ज्योति पाते॥३४॥
तुम बिन वेद-शास्त्र न जाने। तुम बिन विद्वान् कोउ न माने॥३५॥
तुम बिन गायन कैसे होय। तुम बिन कविता कौन रचे रोय॥३६॥
तुम बिन भाषा कैसे फूले। तुम बिन ज्ञान-कुसुम न खिले॥३७॥
जय जय जय हे शारदा माता। तुम बिन कुछ भी कहीं न पाता॥३८॥
जो यह चालीसा नित गावै। बुद्धि बढ़े विद्या वह पावै॥३९॥
बसंत पंचमी पाठ करावै। पाँच शुक्रवार सुख-सम्पत्ति लावै॥४०॥
दोहा
कहत ‘राम-सागर’ पद, बन्दौं विनती मानि।
मोहि कृपा करि शारदा, बुद्धि बल दे जानि॥
अर्थ
सरस्वती चालीसा माँ शारदा के रूप, गुणों, और कृपाओं का संक्षिप्त वर्णन है — विशेष रूप से विद्या, ज्ञान, संगीत, और कला के प्रसंग में।
प्रारंभ के दोहे में कहते हैं — माता-पिता के चरण-रज को सिर पर धारण कर, मैं माँ सरस्वती को नमन करता हूँ, जो बुद्धि और बल देने वाली हैं।
चौपाई १-५ — माँ सरस्वती सकल बुद्धि-बल की राशि हैं, सब विद्याओं का प्रकाश। वीणा-कर-धारी, हंस-सवारी, चतुर्भुज, सब विश्व में प्रसिद्ध। जब जग में पाप-बुद्धि बढ़ती है, तब वे अवतार लेकर धर्म का पुनः प्रकाश करती हैं।
चौपाई ६-११ — बाल्मीकि जी डाकू थे — माँ की कृपा से ‘आदि कवि’ बने, रामायण के रचयिता। कालिदास, तुलसीदास, सूरदास — सभी विद्वानों की मति माँ ने ही विकसित की।
चौपाई १४-१८ — माँ का रूप — विद्या-दात्री, वीणा-धारिणी, हंस-वाहिनी, श्वेत वस्त्र, श्वेत कमल आसन, हाथ में पुस्तक।
चौपाई २१-२५ — विद्यार्थियों के लिए विशेष कृपा। संगीत-कला, लेखक, कवि, वक्ता — सब उनकी कृपा से बनते हैं। मूक भी वाक्-पटु बन जाते हैं।
चौपाई २६-३० — बसंत पंचमी का संदर्भ — माँ का प्रिय वार। पीले वस्त्र, सरसों के फूल, बच्चों का अक्षर-आरम्भ (विद्यारंभ संस्कार)।
चौपाई ३८-४० — फलश्रुति — जो नित्य चालीसा पढ़े, बुद्धि-विद्या बढ़े। पाँच शुक्रवार सुख-समृद्धि।
इतिहास
सरस्वती चालीसा १९वीं-२०वीं शताब्दी की रचना है। हनुमान चालीसा की लोकप्रियता के पश्चात् अनेक देवी-देवताओं के लिए ‘४० चौपाइयों वाले चालीसा’ की परंपरा बनी। सरस्वती चालीसा भी इसी काल की रचना है — रचयिता संभवतः पं. रामसागर (अंतिम दोहे में नाम-संकेत), परंतु सटीक प्रमाण उपलब्ध नहीं।
शास्त्रीय आधार — सरस्वती की पूजा वैदिक काल से है। वे ब्रह्मा की शक्ति, ज्ञान-स्वरूपिणी, ‘वाक् देवी’ हैं। ऋग्वेद की ‘वाग्वै ब्रह्म’ (वाणी ही ब्रह्म है) उनकी ही महिमा है। पुराण-काल में वे ब्रह्मा की पुत्री एवं पत्नी दोनों रूपों में स्थापित हुईं।
बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) माँ का प्रमुख पर्व है। इसी दिन उत्तर भारत के अनेक स्थानों में बच्चों का विद्यारम्भ संस्कार होता है — पहले अक्षर का लेखन। बंगाल में सरस्वती पूजा अत्यंत भव्य रूप से होती है।
पाठ विधि
कब करें
- दैनिक प्रातः — स्नान के पश्चात; विशेषकर विद्यार्थियों के लिए
- बसंत पंचमी — माँ का प्रमुख पर्व
- परीक्षा-काल से पहले एवं दौरान
- विद्यारंभ संस्कार के समय
- हर पूर्णिमा एवं गुरुवार
कैसे करें
- स्नान के पश्चात पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करें।
- पूजा-स्थल पर माँ सरस्वती की प्रतिमा/चित्र। यदि सम्भव हो तो पुस्तक, वीणा, या लेखन-सामग्री भी रखें।
- पीले पुष्प (विशेषकर सरसों, गेंदा, चमेली) अर्पित करें।
- धूप-दीप प्रज्वलन।
- केसर युक्त खीर, बूँदी, या मीठा चावल का भोग।
- गणपति-स्मरण के पश्चात सरस्वती मंत्र: ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ का ११ बार जप।
- चालीसा का स्पष्ट उच्चारण से पाठ — एक बार दैनिक, अथवा तीन बार बसंत पंचमी पर।
- अंत में ‘जय सरस्वती माता’ आरती।
- बच्चों के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद।
बसंत पंचमी विशेष
- घर के सब सदस्य पीले वस्त्र धारण करें।
- द्वार पर हल्दी का तिलक।
- सरसों के फूल माँ को अर्पण।
- बच्चों से ‘श्री गणेशाय नमः’ अथवा ‘ॐ ऐं नमः’ लिखवाएँ।
- पुस्तक, वीणा, हारमोनियम, कलम आदि का पूजन।
विद्यार्थी के लिए विशेष विधि
- प्रातः ४:०० से ६:०० के मध्य (ब्रह्म-मुहूर्त) में पाठ
- पाठ से पूर्व त्राटक (ज्योति पर एकाग्र दृष्टि) ५ मिनट
- पाठ के पश्चात २१ बार सरस्वती मंत्र का जप
- पुस्तक का स्पर्श-वंदन
महत्व
- विद्या-संगीत-कला के लिए सर्वोच्च देवी का स्तोत्र।
- मंद-बुद्धि का परिहार — कई चौपाइयों में स्पष्ट संकेत।
- विद्यारंभ संस्कार का अंग — जीवन के पहले अक्षर-लेखन के साथ।
- परीक्षा-काल का संरक्षक — विद्यार्थियों के लिए विशेष फलदायी।
- सरल खड़ी बोली — किसी भी आयु-वर्ग के लिए सुलभ।
सामान्य प्रश्न
क्या सरस्वती चालीसा केवल विद्यार्थियों के लिए है?
विद्यार्थियों के लिए विशेष फलदायी अवश्य है, परंतु सीमित नहीं। लेखक, कवि, गायक, वक्ता, अध्यापक, शोधकर्ता, कलाकार — सबको माँ की कृपा चाहिए। कोई भी ‘ज्ञान-कर्म’ सरस्वती के बिना अधूरा है।
क्या विद्यार्थी रजस्वला अवस्था में पाठ कर सकती हैं?
मानसिक पाठ सदैव अनुमत है। शास्त्रीय परंपरा में स्पर्श-पूजा एवं सस्वर पाठ का परिहार है, परंतु आधुनिक अधिकांश आचार्य मानसिक स्मरण को निर्विवाद मानते हैं। परीक्षा-काल हो तो अवश्य मानसिक रूप से पाठ करें।
बसंत पंचमी पर पीला रंग क्यों?
बसंत ऋतु में सरसों के फूल चारों ओर खिलते हैं — जिनका रंग पीला है। यह ऋतु-परिवर्तन का संकेत है। साथ ही, पीला रंग ज्ञान, बुद्धि, और शुभता का प्रतीक है — माँ सरस्वती से जुड़ा।
क्या सरस्वती की पूजा में फूल अर्पण करते समय कोई विशेष मंत्र है?
‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ — यह माँ का मूल बीज-मंत्र है। फूल चढ़ाते समय इसी का उच्चारण करें। एकाक्षर-मंत्र ‘ऐं’ भी पर्याप्त है।
क्या सरस्वती की पूजा में नैवेद्य में मांस-अंडे आदि वर्जित हैं?
बिल्कुल। माँ सरस्वती को सात्त्विक भोजन ही अर्पित करना चाहिए। केसर-खीर, बूँदी, मीठे चावल, मेवे, फल — सर्वोत्तम। मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन-प्याज पूर्णतया वर्जित।
विद्यारंभ संस्कार कब और कैसे होता है?
पारंपरिक रूप से बच्चे की २.५ से ५ वर्ष की आयु में बसंत पंचमी पर। पंडित अथवा गुरुजन बच्चे का हाथ पकड़कर पट्टी पर ‘श्री गणेशाय नमः’ अथवा अक्षर-वर्ण लिखवाते हैं। इसके पूर्व सरस्वती चालीसा पाठ अनिवार्य।
क्या इस चालीसा का पाठ संगीत में किया जा सकता है?
हाँ। राग भैरवी, यमन, या बिलावल में सरस्वती चालीसा अत्यंत मधुर लगती है। माँ संगीत-स्वरूपा हैं — संगीत के साथ पाठ माँ को विशेष प्रिय है।