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ॐ जय सरस्वती माता

By पारंपरिक (अज्ञात रचयिता)१९वीं–२०वीं शताब्दीखड़ी बोली

5 min readLast reviewed May 2, 2026

मूल पाठ

ॐ जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
ॐ जय सरस्वती माता॥

चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥
ॐ जय सरस्वती माता॥

बायें कर में वीणा, दायें कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥
ॐ जय सरस्वती माता॥

देवी शरण जो आये, उनका उद्धार किया।
पैठि मंथरा दासी, रावण संहार किया॥
ॐ जय सरस्वती माता॥

विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान अंधेरा, हे मातु अपहरो॥
ॐ जय सरस्वती माता॥

धूप दीप फल मेवा, मां स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥
ॐ जय सरस्वती माता॥

मां सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥
ॐ जय सरस्वती माता॥

ॐ जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

अर्थ

यह आरती माँ सरस्वती के स्वरूप, गुण, और कृपा का संक्षिप्त वर्णन है। संरचना सरल है — छह अंतरे, और प्रत्येक के अंत में टेक ‘ॐ जय सरस्वती माता’ की पुनरावृत्ति।

टेक — हे माँ सरस्वती, जय हो! सद्गुणों के वैभव से शोभित, तीनों लोकों में विख्याता।

अंतरा १ — चन्द्र-समान मुख वाली, पद्म पर आसीन, मंगल-कारी कांति वाली। शुभ हंस तुम्हारी सवारी; अतुल तेज तुम धारण करती हो।

अंतरा २ — बाएँ हाथ में वीणा, दाएँ हाथ में माला। सिर पर मणि-मुकुट, गले में मोतियों की माला।

अंतरा ३ — जो भी देवी की शरण में आए, उनका उद्धार किया। मंथरा (दासी) के माध्यम से रावण के विनाश का बीज भी आपने ही बोया (राम-जन्म एवं वनवास के माध्यम से)।

अंतरा ४ — हे विद्या-ज्ञान प्रदायिनी, ज्ञान का प्रकाश भर दो। हे माता, मोह और अज्ञान का अंधकार दूर करो।

अंतरा ५ — धूप, दीप, फल, मेवा — हे माँ, स्वीकार करो। ज्ञान-चक्षु दो माता; जगत् का निस्तार करो।

अंतरा ६ (फलश्रुति) — माँ सरस्वती की यह आरती जो भी जन गाए — हितकारी, सुखकारी; ज्ञान और भक्ति दोनों पाए।

इतिहास

‘ॐ जय सरस्वती माता’ की रचना पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी की प्रसिद्ध ‘ॐ जय जगदीश हरे’ की धुन पर बसी है। यह उत्तर भारत की सर्वाधिक लोकप्रिय आरती-धुन है, जिसपर अनेक देवी-देवताओं की आरतियाँ रची गईं — सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, गणेश, हनुमान।

यह आरती आज:

  • बसंत पंचमी के सरस्वती पूजन में अनिवार्य
  • विद्यारंभ संस्कार के अंत में
  • विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की वार्षिक सरस्वती पूजा में
  • परीक्षा-काल से पूर्व विद्यार्थी-गृहों में
  • दशहरा (विजयादशमी) के विद्या-पूजन में

— सर्वत्र गाई जाती है। बंगाल में सरस्वती पूजा (बसंत पंचमी) के पंडालों में हजारों कण्ठों से एक साथ इसका गायन एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है।

आरती गायन विधि

कब करें

  • बसंत पंचमी — मुख्य पूजन के समापन पर
  • विद्यारंभ संस्कार — अक्षर-लेखन के पश्चात
  • दशहरा — आयुध-पूजन एवं विद्या-पूजन के साथ
  • दैनिक संध्या आरती — परिवार सहित
  • परीक्षा से पूर्व विशेष सरस्वती पूजन

कैसे करें

  1. पूजन के समापन पर आरती गाई जाती है — चालीसा-पाठ अथवा विद्यारंभ के पश्चात।
  2. थाली में पाँच बातियों का घी का दीपक, धूप, पुष्प, चंदन, और कपूर।
  3. दीपक प्रज्वलन के साथ आरती आरंभ।
  4. आरती गाते हुए दीपक को क्लॉकवाइज घुमाते हुए पाँच से सात बार चक्र पूर्ण करें।
  5. घंटी, ताली, अथवा शंख से ताल मिलाएँ।
  6. विशेषकर बच्चों को टेक — ‘ॐ जय सरस्वती माता’ — दोहराने को कहें।
  7. आरती के अंत में पुष्पांजलि एवं तीन प्रदक्षिणा।
  8. प्रसाद वितरण के साथ समापन।

विद्यालय/संस्थान में सामूहिक गायन

विद्यालयों में सरस्वती पूजा के समय सब छात्र एक स्वर में आरती गाते हैं। शिक्षक/पुजारी दीप पकड़ते हैं; विद्यार्थी ताली से ताल मिलाते हैं। यह दृश्य भारतीय शैक्षणिक संस्कृति का अद्भुत हिस्सा है।

महत्व

  • सर्वाधिक प्रसिद्ध सरस्वती आरती — बसंत पंचमी का अनिवार्य अंग।
  • ‘जगदीश हरे’ की लोकप्रिय धुन में — सबको पहले से ज्ञात।
  • विद्यारंभ संस्कार का समापन-गीत — बच्चों के पहले अक्षर के साथ।
  • विद्यार्थियों के लिए परीक्षा-पूर्व विशेष — मन की शांति एवं माँ की कृपा।
  • सरल भाषा एवं संरचना — किसी भी आयु-वर्ग के लिए सुलभ।

सामान्य प्रश्न

क्या यह आरती और लक्ष्मी-दुर्गा आरतियाँ एक धुन में हैं?

हाँ। पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी की ‘ॐ जय जगदीश हरे’ की धुन उत्तर-भारत की मानक आरती-धुन बन गई। एक बार ‘जगदीश हरे’ सीख लेने पर इसी धुन में सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, गणेश, हनुमान — सबकी आरतियाँ गाई जा सकती हैं।

मंथरा का संदर्भ क्यों?

चौथे अंतरे में मंथरा का उल्लेख रामायण-संदर्भ है। मंथरा कैकेयी की दासी थी, जिसकी बुद्धि-विकृति से राम का वनवास हुआ — और वही वनवास रावण-वध का माध्यम बना। आरती में संकेत है कि माँ सरस्वती (बुद्धि की देवी) ही पूरी कथा की दैवी-योजना के पीछे थीं।

बच्चों को आरती कैसे सिखाएँ?

केवल टेक — ‘ॐ जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता’ — को बार-बार दोहराकर शुरू करें। यही पंक्ति आरती में बार-बार आती है। शेष अंतरे धीरे-धीरे एक-एक करके सिखाएँ।

क्या यह आरती केवल बसंत पंचमी पर ही गाई जाती है?

नहीं। बसंत पंचमी विशेष पर्व है, परंतु यह आरती दैनिक संध्या पूजन, विद्यारंभ संस्कार, दशहरा, परीक्षा-पूर्व पूजन, और विद्यालय की वार्षिक पूजा सभी अवसरों पर गाई जाती है।

क्या किसी विशेष धुन में पारंपरिक रूप से गाई जाती है?

मानक धुन ‘जगदीश हरे’ की है। दक्षिण भारत में कुछ स्थानों पर राग शुद्ध सारंग अथवा राग वसंत में भी गाई जाती है। बंगाल में सरस्वती पूजा के समय कुछ आधुनिक संस्करण भी प्रचलित हैं।

प्रसाद में क्या उपयुक्त है?

सात्त्विक प्रसाद — केसर खीर, बूँदी, मीठे चावल, मेवे, फल, बादाम-काजू। पीले रंग की मिठाइयाँ (बेसन के लड्डू, बूँदी के लड्डू) माँ को विशेष प्रिय हैं। मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन-प्याज पूर्णतया वर्जित।